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21.10.07

जाहिलों के नये गाँव (नगर) से

बड़ा आसान है आसानी से जीना
हमारे, आपकी खातिर
लेकिन जाने क्या है वो
जो कहती रहती है...
बेटा, तड़प ताकि तुझे
दर्द का एहसास हो

जाने क्यों बना हुवा हूँ बेचैन भारत
पर जाने कौन कहता है...
तेरे ही गाँव में पड़ोस में रहता हूँ
दक्षिण टोला में
देखता है न, मेरा घर
जाने कितने दिनों में, चढ़ती है
हांडी....

लेकिन ये क्या चूतियापा है
मैं तो छोड़ आया सब
बहुत पहले
जब गाँव में चली थी गोली
पानी को लेकर
और मेरी जान जाने को आई थी
तब बाबा ने सिखाया था
जाहिलों की है ये बस्ती
निकल जा तू यहाँ से
पढ़ लिखकर....

लेकिन बाबा,
मैं तो जाहिलों के गाँव से निकलकर
अब चला आया हूँ जाहिलों के नगर
जो अपनी सभ्यता में हगने मूतने को भी
मानते हैं किसी की जान से ऊपर
वो तो पानी की बात थी
यहाँ तो पानी वानी की कोई बात नहीं
सब बेपानी के जिंदा लाश टाइप लोग
कहते हैं मर जावो, पानी वालों
जन्मे ही थे इसीलिए....

पर आपने जब भेज ही दिया था
पानी की जंग से परेशान होकर
तो फिर लड़ लेते हैं एक और
हारी हुयी जंग
बर्मा के बुध्धिष्ठों की तरह
बेपानी वालों से

ताकि ठीक से आता रहे
आपके मेरे गाँव में पानी जहाँ से आप
दुखी होकर मरे थे
और मैं
डर के भागा था
जान बचाने
और जिंदगी बनाने

लेकिन फिर पहुंच गया हूँ जाहिलों के बीच
जंग लड़ने
लेकिन......
जाने अब कौन बचायेगा, भगायेगा.....
जाहिलों के नये गाँव (नगर) से
--यशवंत

1 comment:

आशीष said...

कोई जरुर आएगा बचाने के लिए