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30.10.07

लो, फिर नोकरी करने लगा......

एक महीने तक बेरोजगारी का दुख-सुख झेलने के बाद काम पे लग गया। एक मोबाइल कम्युनिकेशन कंपनी में मीडिया और बिजनेस हेड के बतौर। आईटीओ पर आफिस है। फिर चल पड़ी है गाड़ी। दोस्तों-मित्रों का साथ काम आया। भरोसा और तसल्ली देने के साथ हर तरह के सुख-दुख में कंधे से कंधा मिलाकर चलने की उनकी इच्छा से मैं अभिभूत रहा। चलिए, लगा, दिल्ली में सिर्फ बेदिल वाले ही नहीं रहते। दिल वाले हैं तभी तो दिल्ली है। कहा था ना, रहिमन दुख हो भला जो थोड़े दिन होय.....वाकई इस बार के दुख (या सुख) ने मुझे फिर से मनुष्यों को समझने की दृष्ठि दी है। जो आपके ज्यादा अरीब-करीब दिखते हैं, मौका पड़ने पर वही सबसे पहले मूतते हुए भागते नजर आते हैं। काम आते हैं वो लोग जो आपको लगता नहीं कि आपके नजदीक हैं लेकिन वो दिल से आपके नजदीक होते हैं, आपकी हरकतों में भले न शामिल होते हों।
खैर, ये बेरोजगारी पुराण यहीं बंद। काफी यंग एंग्री मैन टाइप काम कर लिया जिंदगी में। काम कम, चूतियापा ज्यादा। दोस्त ज्यादा बने, जिंदगी ज्यादा जी, पद ज्यादा बढ़ाया, तनख्वाह भी बढ़ती रही, शहर बदलता रहा...हां, लेकिन बैंक बैंलेंस नहीं बना। सहजता के साथ जिंदगी का सुख लेता रहा। दुखों को चुनौती मानता रहा। मुश्किलों के वक्त अंदर से खुद को मजबूत करता रहा। इनसे फायदा मिला। खूब मिला। संघर्षों के रास्ते लगातार आगे बढ़ते रहने से अनुभवों की जो पूंजी जुटी है, वो अंदर से काफी मजबूती प्रदान करती रहती है। संभवतः जिंदगी को इतने बिंदास और इतने नजदीक जाकर देखने और जीने का मौका बहुत कम ही मिल पाता है। अब इन सबसे मन भर गया लगता है। पता नहीं क्यों, शांति और सुकून की दरकार ज्यादा महसूस हो रही है।
दोस्तों और मित्रों ने मुझे काफी समझाया बुझाया है। डा. मांधाता सिंह ने एक प्यारा सा पत्र भेजकर मुझे आगाह किया है कि यशवंत भाई, लाल रंग से रिश्ता तोड़ लो। मेरे खयाल से लाल रंग से उनका आशय दारू से ही है। मुझे अच्छा लगा कि कोई आदमी इतनी खरी खरी कहने की हिम्मत रखता है। मैं मांधाता जी को शुक्रिया देने के साथ भरोसा दिलाता हूं कि दरअसल मेरा भी मन लाल रंग से भर चुका है और उसको लेकर अब कोई उत्तेजना बची नहीं। लाल रंग ने जिंदगी और करियर में काफी कुछ दिया है तो काफी कुछ नाश भी कराया है। मैंने काफी हद तक इससे तौबा कर ली है। बाकी लंगोटबांध कसम तो नहीं खाया है क्योंकि मेरा अनुभव रहा है कि कसम खाओ तो साली टूटती जरूर है।

मैं उन सभी दोस्तों और मित्रों को दिल से साधुवाद देना चाहूंगा जिन्होंने मेरे साथ खड़े होकर मुश्किल वक्त में मेरा साथ दिया और हौसला बढ़ाया।

फिर मिलेंगे।
यशवंत सिंह

11 comments:

आशीष महर्षि..उम्र के २४वें पड़ाव पर said...

जिंदगी शायद इसी का नाम है...बस चलते जाना है...आप जैसे साथी को पाकर मैं धन्य हो गया,,,,

काकेश said...

बधाई नये पद की और शुभकामनाऎं.

Sanjeet Tripathi said...

शुभकामनाएं बंधु!!

ALOK PURANIK said...

बधाई च शुभकामनाएं

ravi said...

congratulations. nai naukari mein naye josh se lag jao dost.

Rajesh Roshan said...

maine aapka phone 3 din try kiya kaha hain aap????

piyush said...

congrats sir. asha hai ab bhadas par berojgari ka dard nahin dikhega.

दिनेश श्रीनेत said...

jab yeh sab kuch chal raha tha main apni family lane 10 din ki chhutti par lucknow gaya tha. khair achchhi baat yeh hai ki sab kuchh phir samanya ho gaya.
Dinesh Shrinet

manish_mishra_eco@rediffmail.com said...

congratulations

manish said...

congratulations
manish mishra

leo08.aug@gmail.com said...

if everything in life was rational nothing could happen.
Fyodor Dostoevsky ka ye statement hamesha mujhe yaad dilata hai ki kuch bhi sahi ya galat nahi hota. analysis ya conclusion nikalna nithallo ya historian ka kam hai. aap ko kisi bat ke liye regret karne ki jarurat nahi. live life with youe own terms.
best of luck.
manish mishra