Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

28.11.07

रात नौ बजेः आमने-सामने पुण्य प्रसून और आशुतोष...

रात नौ बजते ही टीवी चैनलों पर धुरंधर प्रकट हो जाते हैं। समय पर पुण्य प्रसून वाजपेयी, आईबीएन पर आशुतोष....और भी ढेरों नाम हैं लेकिन कल मैं इन दोनों चैनलों को एक एक कर देखता रहा। आईबीएन की लीड खबर थी वाराणसी में पत्रकारों की बसपा विधायक और पुलिस द्वारा पिटाई को केंद्र में लेते हुए माया राज में गुंडा राज की गंगा बहना। समय पर तस्लीमा को फोकस में रखा गया था और उनकी किताबों के वे अंश भी दिखाए गए जिसे लेकर मुस्लिम इतना नफरत करते हैं।
एक दर्शक और एक पूर्व पत्रकार होने के नाते मैंने दोनों चैनलों को एनालाइज किया तो लगा कि आईबीएन ने अपनी लीड खबर को सनसनीखेज तरीके से छोटे स्क्रीन पर उतारा लेकिन थोड़े ही देर बाद इसमें आया झोल और झामा दिखने लगा।

बनारस से विक्रांत दुबे लाइव देते देते, बोलते बोलते, अपनी बात पूरी किये बगैर ही एकदम से जागरण के न्यूज एडीटर की तरफ मुड़ पड़े। लगा, जैसे उन्हें स्टूडियो से डांटा गया हो, खुद ही बोलते रहोगे या बगल में जो मूर्तियां स्थापित की हैं, उनके भी मुंह खुलवाओगे। न्यूज एडीटर साहब ने तो थोड़ी बात की लेकिन इसके बाद विक्रांत जब दूसरे सज्जन से बात करने की कोशिश कर रहे थे तभी कट हो गया और आशुतोष परदे पर अवतरित।

मजा नहीं आया। खबर बढ़िया थी, एंगिल जोरदार था, शुरुआती बातें ठीक से गढ़ी गईं लेकिन इसके विस्तार में जाते ही मामला गड़बड़ा गया। लग गया, कुछ खास हाथ में नहीं है। चलो, विजुअल जोरदार न थे तो कम से कम पैकेज ही बढ़िया रखते। अव्वल तो एक खबर के आधार पर पूरे सिस्टम को गरियाना गलत है। अगर गरिया भी रहे हैं तो पूरी तैयारी करनी चाहिए थी। पूरी पैकेजिंग करनी चाहिए थी। दिमाग खर्चना चाहिए था। मतलब इसी बहाने दिखाते की मायाराज में अब तक इस तरह कितने कारनामे हुए जिसमें सत्ता पक्ष ने पत्रकारों या आम जनता का उत्पीड़न किया। इसमें कानपुर की घटना को भी शामिल किया जा सकता था जिसमें बसपा नेता ने आईनेक्स्ट के एक पत्रकार की पिटाई की थी और पूरा लंबा बवाल चला था। इसी तरह उस घटना को भी शामिल कर सकते थे जिसमें वो बसपा सांसद ने बुलडोजर चलवा दिया था पड़ोसी की जमीन या मकान पर। संभवतः आजमगढ़ या जौनपुर की घटना थी, इसके बाद बहन जी ने उनकी न सिर्फ क्लास ली बल्कि गिरफ्तार भी करवा लिया और पार्टी से निकाल दिया। इस घटना के बहाने दिखाया जा सकता था कि माया में शुरुवात में जज्बा था लेकिन अब वे भी सत्ता के रंग ढंग में रंग गई हैं और सत्ता की भाषा बोलने और जीने लगी है। दिमाग लगाने से ढेर सारे घटनाक्रम मिल सकते थे। और, हर पुराने घटनाक्रम के फालोअप को दिखा सकते थे, वहां के रिपोर्टरों को लाइव खड़ा रख सकते थे, दो-दो लाइन बोलने के लिए। लगता कि हां पूरी फौज फांटा है, चैनल पूरे तेवर में है, माया को छोड़ेगा नहीं। लेकिन ऐसा कुछ न हुआ। खैर, अंत में कह सकता हूं कि आईबीएन की लीड खबर एक जोरदार बम की तरह हवा में लहराने के बाद पहले से फटे पटाखे की तरह फुस्स हो गया।

उधर, समय पर पुण्य प्रसून वाजपेयी ने तस्लीमा के बहाने एक ऐसी स्टोरी दिखाई जिसके साथ ज्यादातर महिलाओं, आम जन और बुद्धिजीवियों का सहज जुड़ाव व जानने की उत्सुकता जुड़ी है। आज के समय में तस्लीमा एक बड़ी चीज हैं, एक रहस्य हैं, एक विद्रोह हैं, एक आग हैं, एक तेवर हैं, एक कथा हैं, एक एक्स्ट्रीम हैं, एक विजन हैं, एक बड़े तबके की आवाज हैं, राष्ट्रीय के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय टीआरपी की सब्जेक्ट हैं। तस्लीमा के जीवन, उनके लिखे और उनके सोचे की इतनी परतें हैं कि इस पर एक हजार तरह की स्टोरी बनाई जा सकती है, बशर्ते विजन हो और उसे दिखा पाने की क्षमता व साहस हो। पुण्य प्रसून ने एक कोशिश भर की इसलिए उनकी सराहना की जानी चाहिए। हालांकि इसके पहले आईबीएन ने भी कई बुलेटिन में तस्लीमा को लेकर ठीक ठाक कापी वाली न्यूज स्टोरी दिखाई है। कल भी तस्लीमा पे स्टोरी थी लेकिन मैंने उसे देखा नहीं क्योंकि यहां मैं उन खबरों से बात कर रहा हूं जिनसे बुलेटिन खोला गया। मतलब लीड खबरें।

पुण्य प्रसून ने दिखाया कि तस्लीमा अनुरोध कर रही हैं सियासतदानों से, मेरे साथ राजनीति न करो.....साथ ही दिखाया ....तस्लीमा लिखित उपन्यास के कथित विवादित अंश जिस पर मुल्ला लोग भड़के थे-हैं, एक मौलाना से लाइव बातचीत और सामने खड़ा कर दिया तेवरदार राजेंद्र यादव को, लड़ो और उगलो। मौलाना इस कदर बलबलाते रहे कि आखिर उन्हें बोलते हुए ही छोड़ना पड़ा। कुल मिलाकर मुझे यह ज्यादा बड़े फलक पर और गंभीर जनप्रिय न्यूज स्टोरी लगी जिसमें सस्पेंस भी था। तस्लीमा हैं कहां?

इधर, समय में जो समस्या आवाज और विजुअल के मेल न खाने की थी, जुबां पर कुछ और आवाज आ रही कुछ...वो दूर होती दिख रही है, इससे समय में थोड़ी रुचि बढ़ी है दर्शकों की। पहले तो सिर्फ इसी आधार पर समय नहीं देखते थे कि आवाज और होंठ में कोई मेल नहीं समझ में आ रहा था।

हां, आईबीएन पर डंके की चोट पर दहाड़ने से पहले जो प्रोग्राम चल रहा था वो वाकई जोरदार था। माधुरी से इंटरव्यू और उनके डांस के लाइव व रिकार्डेड अंश....मजा आ गया इसे देखकर। मेरी चलती तो इसी को डंके की चोट में भी दिखा देता....जब फटे पटाखे ही दिखाने हैं तो अच्छा है ताजगी भरी माधुरी की दूसरी पारी ही दिखाओ अन्यथा कोई ठीकठाक खबर ले आओ, अच्छे खासे फैक्ट्स और पैकेज के साथ।

मैं कल के नौ बजे के शो में समय और पुण्य प्रसून को 10 में 7 अंक देता हूं और आईबीएन व आशुतोष के शो को 10 में से 5 अंक।

हां, बीच-बीच में एनडीटीवी भी देख रहा था लेकिन उस पर रुक नहीं पा रहा था। वही ठंडी ठंडी एंकर, ठंडी ठंडी बातें। गुजरात चुनाव पर विशेष शो दिखाया जा रहा था लेकिन गुजरात के लोगों से बातचीत को देर तक सुन पाना अझेल हो रहा था।

ऐसा नहीं है कि भड़ास टीवी न्यूज चैनलों की रेगुलर समीक्षा करने जा रहा है। चूंकि पूरे दिन आफिस के बाद रात में घर पहुंचता हूं तो लगता है चलो, आधे घंटे टीवी-टीवी, चैनल-चैनल खेलें तो कई दिनों से सिनेमा और गाने देखने के बाद कल न्यूज चैनलों पर नजर गड़ाए रहा। उपरोक्त सब कुछ मेरी निजी राय व नजरिया है।

हां, इसी दौरान याद आ रहा है कि एक पत्रिका है जिसे एनडीटीवी की पूर्व एंकर राजश्री निकालती हैं, व्यूज आन न्यूज। उसमें जिस तरह टीवी और प्रिंड मीडिया के अच्छे-बुरे की खबर ली जाती है उसे हर पत्रकार को पढ़ना चाहिए। मैंने तो दो-तीन अंक ही देखे हैं लेकिन मुझे लगा, इस तरह की एक मैग्जीन या आनलाइन साइट की गुंजाइश है, तब जबकि हर रोज कई नए पत्रकार पैदा हो रहे हों और प्रिंट व टीवी में हर रोज नया मीडिया प्लान पैदा हो रहा हो।

फिलहाल इतना ही
जय भड़ास
यशवंत

7 comments:

स्वप्रेम तिवारी said...

बहुत अच्छे ,समय के उठाए जा रहे मुद्दे निःसंदेह काबिलेतारीफ है ,इसी क्रम में खबरों ki खबर है , आशा है आगे भी समीक्षाएं पेश करते रहेंगे

Lalit Pandey said...

भाई साहब,
आपकी बात सौ आने सच है। जो आप कह रहे हैं वह हकीकत के एकदम करीब है।
लेकिन...!
लेकिन...!
लेकिन...!
आपको तो मालूम ही है कि टीवी चैनलों में आजकल जबरदस्त होड़ मची है, अपनी-अपनी खबर बेचने को लेकर। इसलिए तीखी आवाज व नंगे विजुअल का मसाला लगाकर खबर बेचने का चलन है, सो, यहां आपसे गुजारिश है कि किसी की खबर को सीधे-सीधे बेकार न बताएं। उसे अच्छा नहीं लगता मेरे भाई। उसके दिल में नस्तर बन कर चुभती हैं, यह बातें। माना कि आपको किसी की खबर सड़ी-सड़ी सी लगे, तो चुपचाप अगली दुकान यानी चैनल की ओर रुख कर लेना चाहिए।
अब हमने आपकी हलके से कान खींचे, तो आपको अच्छा लगा क्या...?

यशवंत सिंह said...

ललित जी, अच्छा लगा आपका कान खींचना। वैसे, ये कान खींचना नहीं है। ये दोस्त की मीठी चिकोटी काटना है। दरअसल यही सब तो नहीं रह गया है आजकल। हर आदमी इतना बड़ा सा इगो लेकर टहल रहा है। दिल में तो इगो है ही, दोनों हाथ में भी इगो की नंगी तलवार लिए है। कौन कुछ बोले की फच्च से उसके सिर को उड़ा दें।
खबर कोई बेकार नहीं होता न ही किसी खबर को मैंने बेकार बताया। उस खबर पर आप कितनी मेहनत करते हैं, कितना एंगिलबाजी करते हैं, कितने पेंच निकालते हैं, कैसे प्रस्तुत करते हैं, कैसे माइंडस्टार्मिंग विजुअल, कापी और एंगिल को परोसते हैं...यह सब मिलकर एक अच्छी टीवी न्यूज की शक्ल लेती है।
कमेंट के लिए शुक्रिया
यशवंत

Anonymous said...

प्रिय भाई,

दुनिया में सबसे आसान काम है गाल बजाना। किसी की दिन भर की मेहनत पर दो शब्द बोलकर उसका बैंड बजा दो। एनडीटीवी की शालीन एंकर, जो इस देश के निजी चैनलों की सबसे पुरानी एंकर है और जिसे हिंदुस्तानी टीवी की सबसे सोबर एंकर माना जाता है, वो आपको ठंडी-ठंडी लगती है (मित्र, शब्दों का चयन सोचसमझकर होना चाहिये)और समाचार ठंडी-ठंडी बातें। ये बात तो आप भी मानते हैं ना कि समाचारों को तड़का नहीं लगाना चाहिये, लेकिन तड़का नहीं लगेगा तो वो आपको ठंडी बातें नज़र आते हैं। साथी मुझे नहीं पता कि आप किस पेशे में हैं लेकिन किसी के भी काम पर इतनी आसानी से कुछ भी बोल देना ठीक नहीं है।
राजश्री अगर कुछ बोलती हैं तो इसलिये कि उन्होने सब कुछ अपनी आंखों से देखा है और हो सकता है कुछ हद तक झेला भी हो। बुरा मत मानियेगा।

यशवंत सिंह said...

प्रिय अनाम भाई
नाम से आते तो ठीक होता लेकिन तब भी आपका स्वागत है। बात पते की कही है लेकिन मैं टीवी न्यूज चैनलों से कभी जुड़ा नहीं रहा इसलिए मैं उस मीडिया का मात्र एक दर्शक ही हूं, इसी रूप में पोस्ट भी लिखी है। मुझे जो चीजें महसूस हुईं उसे लिखा। एनडीटीवी महान चैनल हो सकता है लेकिन वो पूरा चैनल और उसके ज्यादातर लोग मुझे ठंडे लगते हैं। हो सकता है चैनल का यह साफिस्टिकेशन बाकियों को भाता हो लेकिन कम से कम मुझे नहीं। फिर भी मेरी सोच की सीमायें हैं और आपकी बातें अपनी जगह सही हो सकती हैं। अगली बार नाम से आइएगा। आखिर किससे डर है आपको? डर डर के जीना भी क्या जीना मेरी जान, ....
यशवंत

आशीष said...

समय की स्टोरी वाकई काबिले तारीफ थी..आपने एक बात पर पता नहीं ध्यान दिया या नहीं की मौलना बरकती बार बार इस देश को आपका देश कह कर संबोधित कर रहे थे..यानि यह देश उनका नहीं हैं.. जो की एक खतरनाक संकेत हैं...इन कट्टर पंथियों का पता नहीं क्या होगा..??

houshal said...

yashwant ji aapki baato me dam hai