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23.11.07

बिगड़े जायके को संगीत से ठीक करें......प्रीत की लत मोहे...

एक दिन कार की बैटरी पूरी तरह डिस्चार्ज हो गई तो मारुति हेल्पलाइन वालों के बताए टिप्स पर कुछ ज्यादा ही अमल करते हुए अब मैं कार की बैटरी बिलकुल अनावश्यक खर्च नहीं करता। यहां तक कि एफएम पर भी पाबंदी लगा दी है, मतलब म्यूजिक आन नहीं करता। वैसे, गाड़ी चलाते वक्त म्यूजिक सुनने से कंसनट्रेशन भंग होता है, दिल्ली पुलिस मानती है और चालान भी कर देती है। यह सही भी लगता है क्योंकि जिस कदर ट्रैफिक है उसमें तो हर पल चौकन्ना रहना ही पड़ेगा वरना ले ली जान या फिर दे दी जान, फटाक से। ऐसे में जब गाना वाना सब बंद हो तो 45 मिनट का घर से आफिस और आफिस से घर वाला सफर कटे कैसे। तो भईजान, अपना कंठ खोला, गला खंखार के साफ किया और लगे कार में चिल्लाने। प्रीत की लत मोहे ऐसी लागी, हो गई मैं मतवारी.....जोर से चिल्लाकर न गायेंगे तो कैलाश खेर बुरा मान जायेंगे। जब भी यह गाना गाता हूं तो संजय त्रिपाठी कानपुर आईनेक्स्ट वाले की याद आ जाती है। क्या गाता है बंदा, इस्टाइल में, गला खोलकर, दिल जोड़कर। तो आज यही गाना गाते-गाते आया लेकिन जैसा कि हर बार होता है, गाना आधा अधूरा ही गा पाता हूं क्योंकि लाइनें याद नहीं होतीं। हर बार संजय को फोन करना पड़ता है, संजय क्या है इसके आगे। लेकिन इस बार सोचा, चलो आफिस पहुंचकर सर्च करता हूं, और वाकई बात बन गई। एक शाम तेरे नाम ब्लाग पर ढेर सारे खूबसूरत गीत देखने को मिले। मन ललच गया, सोचा अपने भड़ासियों को भी पढ़ा ही देते हैं। अंकित माथुर ने मुंह का जायका बिगाड़ रखा है तो इसे ठीक कौन करेगा। तो फिर लीजिए, पढ़िए और गुनगुनाइए......मेरठ से मुंबई तक की सफल यात्रा करने वाले समकालीन महान सूफी गायक कैलाश खेर की पेशकश....



प्रीत की लत मोहे ऐसी लागी
हो गई मैं मतवारी
बलि बलि जाऊँ अपने पिया को
कि मैं जाऊँ वारी वारी
मोहे सुध बुध ना रही तन मन की
ये तो जाने दुनिया सारी
बेबस और लाचार फिरूँ मैं
हारी मैं दिल हारी..हारी मैं दिल हारी..

तेरे नाम से जी लूँ, तेरे नाम से मर जाऊँ..
तेरे जान के सदके में कुछ ऐसा कर जाऊँ
तूने क्या कर डाला ,मर गई मैं, मिट गई मैं
हो री...हाँ री..हो गई मैं दीवानी दीवानी

इश्क जुनूं जब हद से बढ़ जाए
हँसते-हँसते आशिक सूली चढ़ जाए
इश्क का जादू सर चढ़कर बोले
खूब लगा दो पहरे, रस्ते रब खोले
यही इश्क दी मर्जी है, यही रब दी मर्जी है,
तूने क्या कर डाला ,मर गई मैं, मिट गई मैं
हो री...हाँ री..हो गई मैं दीवानी दीवानी

कि मैं रंग-रंगीली दीवानी
कि मैं अलबेली मैं मस्तानी
गाऊँ बजाऊँ सबको रिझाऊँ
कि मैं दीन धरम से बेगानी
की मैं दीवानी, मैं दीवानी

तेरे नाम से जी लूँ, तेरे नाम से मर जाऊँ..
तेरे जान के सदके में कुछ ऐसा कर जाऊँ
तूने क्या कर डाला ,मर गई मैं, मिट गई मैं
हो री...हाँ री..हो गई मैं दीवानी दीवानी

साभारः एक शाम तेरे नाम

2 comments:

अंकित माथुर said...

यशवंत भाई वाकई गीत में जान है।
नोएडा से सहारनपुर तक के सफ़र के दौरान ये
ही गीत सुनते हुए जाउंगा।
शायद घर पहुंच कर ज़ायका ठीक हो जाये।

Manish said...

Yashwant ji ,Mere blog par dale geet aapko pasand aaye jaan kar khushi huyi. Kailash Kher ki aawaaz mein zameeni mitti ki khushboo hai. Haal hi mein inke behad khoobsurat geet 'de de koyi jaan bhi agar' ke bare mein likha tha

http://ek-shaam-mere-naam.blogspot.com/2007/11/blog-post_01.html

yahan sun sakte hain