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11.12.07

मन, ब्लागर और पत्रकार पर कविताई.....कोई हरामी द ग्रेट कमीना है तो कोई सागरो-मीना है

अपन का मन, अपन के ब्लागर भाई और अपन के पत्रकार बंधु...तीन बड़े टापिकों को एक ही पोस्ट में समेटा है। श्रोताओं और पढ़ाकुओं से दाद चाहूंगा। दिल खुश हो तो ताली बजायें, नाराज हो तो भड़ासियों को दिल खोलकर गरियायें। वैसे, भी दिल्ली में मौसम बेहद सर्द है। गालियों से कुछ तो गरमी आयेगी। उम्मीद है आप लोगों को पसंद आयेगा.....

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अपन का मन..
इलाहाबद गया और लौटा। एक हफ्ते बीता। नेट और ब्लाग से दूर रहा। लोगों से घुला मिला। कुछ नया ताजा टाइप का काम किया, कुछ नौकरी की खातिर, कुछ अपन की खुशी की खातिर। दिल्ली लौटा तो फिर वही रास्ते, वही नौकरी, वही ब्लाग, वही घर, वही मैं....। बहुत जल्दी उबने लगता हूं किसी भी चीज से। थोड़ा घूमफिर कर आया था तो मन ताजा था। लेकिन दो दिन बीतते बीतते ही लगने लगा, फिर फंस गये। दिक्कत नौकरी की नहीं, पैसे की नहीं, प्रतिष्ठा और जान-पहचान की नहीं, मन की है। और ये जो मन होता है बहुत ही शैतान और बेचैन बच्चे की तरह होता है। सबका नहीं होता, कुछ कुछ लोगों का होता है। मेरा भी है। ये जो मन है ना, कभी बहुत ढीठ हो जाता है तो कभी बहुत दयालु। कभी एंग्री यंगमैन माफिक वाइल्ड हो जाता है तो कभी प्रेमिका के पैर चूमते प्रेमी जैसा पागल। कभी बाबा के साथ धूनी रमाते हुए राधे राधे सा आध्यात्मिक हो जाता है तो कभी घर, परिवार और बच्चों के साथ हंसता-खिलखिलाता बेहद सांसारिक। 34 पार होने के बावजूद भी किसी सुंदर लड़की को देख कर किसी किशोर सा धकधक करते दिल में तब्दील हो जाता है मन तो कभी बिकती मछलियों को देख मछुवारे की तरह तुरंत बना-पका कर खा लेने को जिद्दी। कभी प्रवचन देने तो कभी सुनने को कहता है मन। कभी किसी को लतियाने तो किसी को चूमने को कहता है मन। कभी तकनीक का मास्टर बनने को रोमांचित होता है, तो कभी थिएटर और संगीत की दुनिया में हाथ आजमाने के लिए लंबा आलाप लिये आगे बढ़ लेता है। कभी इं(अं?)टरप्रेन्योर बनने को लंगोटी बांधकर मार्केट और बिजनेस में उतरता है तो कभी समाज सुधारक बन हर आम को हर संभव आगे बढ़ाने को जिद ठानता है मन। कभी कवि की तरह कविता कहता, लिखता रहता है मन तो कभी शिकारी की तरह शिकार पर झपट्टा मारने को रणनीति बुनता रहता है मन। कभी सुध बुध खोकर औघड़ हुआ रहता है मन तो कभी सचेत, सतर्क होकर दुनियावी मायाओं से एक एक कर निपटता रहता है मन। मन मन मन....। वाह रे मन। हाय रे मन। बेचारा मन। मार्वलस मन। शैतान मन। अबोध मन। बच्चा मन। बुड्ढा मन। विकृत मन। कुंठित मन। कितने रूप हैं तेरे मन....। बाबा रे, इस मन को मारो, बड़ा मतवाला, बड़ा पगला है मन।
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अपन के ब्लागर भाई
कभी ब्लाग और ब्लागरों से घृणा करता है मन, कभी इन्हें फालतू और बेकार समझता है मन। कभी इनकी बातों में दम देखता है मन, कभी इनके दोगलेपन पर हंसता है मन। कभी इनकी जिनुइऩनेस को सराहता है मन। कभी इनके नशे को लताड़ता है मन। कभी इनको अपना अतीत मानता है मन, कभी इनको अपना वर्तमान जानता है मन। ये ब्लाग और ये ब्लागर। इनकी दुनिया, अबोध दुनिया, सच्ची दुनिया, छोटी दुनिया, पाखंडी दुनिया, अपनी दुनिया, ओरीजनल दुनिया..। छल छलावा है तो दिखता है। जो सच है तो वो बेहद नंगेपन के साथ सच है। जो ढंकते हैं वो ढंकते हुए दिखते हैं। जो फंसते हैं वो फंसते हुए कहते हैं कि हां, फंसने के लिए जान बूझकर फंसा हूं। इनसे दूर करो भाई, इनके पास ले चलो भाई। ये बुद्धिजीवियों की दुनिया है भाई....ये नौकरी करते हुए बुद्धजीवियों की दुनिया है। सब खुद को निश्चिंत करके देश की अनिश्चितता पर आंसू बहा रहे हैं, समाज की हालत पर गा रहे हैं, मौसम पर बतिया रहे हैं, किचेन की रेसिपी बना रहे हैं, एक दूसरे की लंगोटी उघाड़ रहे हैं....ये तो बिलकुल अपने गांव जैसा है भाई....चालाक की चलाकी समझ में आती है भाई। नए लोगों को चढ़ाते हैं भाई, फंसे हुए को पुचकारते हैं भाई, दुख में इकट्ठा हो जाते हैं भाई, दुश्मन पर मिलकर चढ़ाई करते हैं भाई। ये ब्लागरों की दुनिया है भाई, इनसे बचाओ भाई। हर कोई डब्लू डब्लू डब्लू लगाये है, आनलाइन आते ही लिंक भेज पढ़वाए है। सब अपने अपने लिख के मगन है, डालडा को कहते देसी घी और फिर मगन हैं। कोई बच्चा है, कोई बूढ़ा है, कोई सियासी है कोई रंगा सियार है। कोई माता हैं कोई गुरुमाता हैं, कोई व्याख्या हैं, कोई गाता-बजाता हैं। कोई खाई पीई अघाई कविताई है कोई कुछ छिपाकर कुछ और ही दिखाई है। कोई चघड़ है, कोई रगड़ है। कोई सिक्कड़ है, कोई फक्कड़ है। कई गलियां हैं, कई मोहल्ले हैं, कई कस्बे हैं, कई विनम्र हैं, कई आसमान हैं, कई तितलियां हैं, कई भड़भड़िया हैं, कई चुपचपिया हैं, कोई गलबहियां है, कोई कमेंटिया है, कोई महंत है कोई संत है। कोई अफसर है कोई दफ्तर में है। कोई व्यंगियाते हैं कई लंघियाते हैं, कई चमड़िया उघाड़ते हैं कई चमड़िया बचाते हैं। कोई गाना बजाते हैं कोई फिलिम दिखाते हैं। कोई गला फाड़ चिल्लाते हैं कोई चिल्ला चिल्लाकर बेहोश हो जाते हैं। ये ब्लाग की दुनिया है भाई, ये बेचारों की दुनिया है भाई, ये बहादुरों की दुनिया है भाई, ये घिघियाये हुए लोगों की दुनिया है भाई। ये चवन्नी में खुश हैं, कोई आसमान में भी खुश है। कोई नुक्ताचीनी में लीन है, कोई बहादुरी में मस्त है। कोई साफ बोलने से बदनाम है, कोई झूठ बोलकर महान है।
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अपन के पत्रकार बंधु
ये पत्रकारों का चक्कर है। कोई घनचक्कर है, कोई रफूचक्कर है। कोई तेलमालिश वाला है, कोई बौद्धिक दिवालिया के बावजूद लाला का खास साला है। कोई मतवाला है, कोई पगला दिलवाला है। कोई सठियाया चतुर चिरकुट है। कोई दरुयाया विकट उजबक है। कोई लंठ है, कोई सेंट परसेंट है। कोई इंटेलेक्चुअल है लेकिन जबरदस्त टांग खिचव्वल है। ये जर्नलिस्ट हैं भाई, ये चोचलिस्ट हैं भाई, ये प्रोफेशनलिस्ट हैं भाई, ये अबूझ पहेली हैं भाई। कोई बाहर से सुंदर है अंदर से बंदर है। कोई लंगूर है, जी भर खाता तंदूर है। कोई पंडित है कोई तेली है। कोई ठाकुर हैं कई विकट पहेली हैं। कोई टीवी है कोई प्रिंट है। कोई संट है कोई टिंट है। कोई दिमाग वाला भी पैदल है कोई पैदल वाला भी दिमागदार है। कई लड़की तो लड़का हैं, कई लड़के तो चटकदार हैं। कोई नौकरी से परेशान है, कोई नौकरी छोड़ने को बेकरार हैं। कोई कम पैसे से दुखी है, कोई ज्यादा पाके हर खुशी से दुखी है। कोई दिल से दुखी है कोई जन्मना दुखी है। किसी की आत्मा दुखी है, किसी की पर्सनाल्टी दुखी है। ये पत्रकारों का चक्कर है भाई, इनमें आपस में है जबरदस्त लड़ाई। तारीफ करे तो समझो भेद है, बुराई करे तो समझो मनभेद है। मतभेद तो सरेआम है, अंदर से दुख-दुख, बाहर बड़े तामझाम हैं। कोई पीएम है तो कोई सीएम है, कोई डग्गा है तो कोई डग्गामार है। कोई दल्ला है तो कोई निठल्ला है। कोई साला है तो कोई ठेलावाला है। कोई पंचर है तो कोई हंटर है। कोई बेनाम है तो कोई महान है। ये पत्रकारों की दुनिया है भाई। कोई हरामी द ग्रेट कमीना है तो कोई सागरो-मीना है। कोई तितली है तो कोई फुलजरी है। कोई लड़ी है तो कोई अभी खड़ी है। कोई नाड़ी है कोई पनवाड़ी है, कोई बातूनी है कोई चुप्पा है, कोई घिघियाया है कोई अभी बियाया है। कोई नहाया है कोई कमाया है, कोई उगाहता है कोई बहाता है। कोई चोर है कोई उचक्का है कोई पक्का है कोई कच्चा है। ये पत्रकारों की दुनिया है भाई। कोई अंग्रेज है तो कोई बिना वेश है, कोई गांव और देहाती है तो कोई गजब लगता शहर बसाती है। ये पत्रकारों की दुनिया है भाई....।
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जय भड़ास
यशवंत

12 comments:

महेंद्र मिश्रा said...

सारी परिभाषाए तो आपने एक ही जगह समेट दी बहुत बढ़िया

राजीव जैन Rajeev Jain said...

इतनी उपमाएं, इतने तुकबंदी
मजा आ गया सर

Sanjeet Tripathi said...

क्या बात है!! यह हुई मन की भड़ास।
बहुत बढ़िया!!

meera said...

अच्छा , हमें मालूम चल गया है कि आप इलाहबाद से लौट आए हैं। आप तो आप ही हैं आते ही धमाधम , दे तुकबंदी पे तुकबंदी । सात दिन का सारा गुबार एक ही दिन में निकाल दिए । हर काम का मजा धीमे-धीमे लेना चाहिए । वो कहते हैं ना सहज पके सो मीठा होए।

Pramod Singh said...

हें हें हें.. का बोल रहे हैं..

सचिन लुधियानवी said...

इलाहाबाद से आए थे तो सोचे थे कुछ तरल, कुछ ठंडा, कुछ अपना सा कुछ सपना सा. जो आंखों में बसे, जो जुबान से झरे, जो सींच जाए जीवन को, जो खींच जाए दुखन को. दुनिया के पास हो दुनिया के दूर हो. दिल्ली की ठंडक का जिसमें असर न हो. संगम के मेल का जिसमें मजा हो. कुछ भी अलहदा न हो. ............... विला विला विला... हूल कटा पटा सटृटम पानी घटृटम हो....... ऐसा लिखोगे.
लेकिन यह क्या तुम्हारे मन में तो अब तक वही घुसा हुआ है. इतने दिन चुप रहे कि हमारी संगत सुधार देगी. हमे प्रवचन देते हो. खुद नहीं सीखते मन में घुस जाओ कुछ मोती सा पा जाओ. अरे गुरु अब तो सुधर जाओ........
न सुधरे तो अभी बताते हैं आपकी परेशानी का रामबाण इलाज? जानते हैं निजी देंगे पुडिया तो लोगे नहीं. सबके सामने ही लोगे तो ठीक है भडासियों की अध्यक्षता में होगा आपका इलाज संस्कार, जिसकी बहुत जरूरत है आपको.... तो जय हरि की.....

सचिन लुधियानवी said...
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गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' said...
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गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' said...

अब तो अपन के शब्द इ च शर्मा रहें हैं....१
महाकवि के के रूप मी जस्बंत भैया जो आगे आ रहें है
"भडा़सियों को रख के आगे बना ली दुनिया नई नवेली"
जस्सू जी छाए जवाब बनके कुछेक समझे उन्हें पहेली ..?

यशवंत सिंह said...

सचिन भाई...
आप जैसा मैं नहीं हो सकता, मेरे जैसे आप नहीं हो सकते। मन है, कब क्या रिसीव करे और फिर ट्रांसमिट करे, इसे पक्का पक्का नहीं बताया जा सकता। आप दोस्तों के अंदाज और भड़ास का हमेशा स्वागत रहा है, रहेगा। संगम जाने से मन पवित्र नहीं हो जाता और काजल की कोठली में रहकर भी उजला रहा जा सकता है, ये सब सच्चाइयां आप जानते ही हैं। फिर भी...आपने कमेंटियाया, इसके लिए शुक्रिया....जय भड़ास
यशवंत

नीरज गोस्वामी said...

मन से लिखी मन तक पहुँची मनभावन रचना.....वाह वाह वाह !!! मन प्रशंन हुआ.
नीरज

Neelima said...

हम तो अभी तय नहीं कर पा रहे कि हमें किस केटेगिरी में माना है आपने ! जरा कोने में तो आइए और बता ही डालिए चुपके से !