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14.12.07

एक फ्रेशर पत्रकार के एक्सपीरियेंस्ड बनने की दास्तान

((यह सच्ची कहानी है। कमजोर दिल वाले संवेदनशील लोग न पढ़ें। पत्रकार जरूर पढ़ें, क्योंकि आफिस के अंदरूनी शाब्दिक लातम-जूतम से ढीठ व दहपट हो चुके होते हैं। बेसिकली, एक फ्रेशर को कितनी दिक्कतें झेलनी होती हैं, यह इस सच्ची कथा का केंद्र है लेकिन इसी बहाने पत्रकारिता के एक खास ट्रेंड को पकड़ा गया है जो इस चौथे स्तंभ को चारों खाने चित करने के लिए काफी मजबूत स्थिति में आ चुका है। डाक्यूमेंट्री सरीखी यह कहानी थोड़ी लंबी जरूर है, इसे कई किश्तों में पढ़ाया जा सकता था लेकिन पाठकों की सहूलियत की खातिर एक ही बार में दे रहा हूं। चाहें तो धीमे-धीमे करके कई दिनों में पढ़ें लेकिन इतना दावा है कि एक बार पढ़ेंगे तो बिना पूरा किये हटेंगे नहीं। खैर, अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने की मेरी पुरानी आदत रही है और कई साथी आत्ममुग्धता का शिकार होने का आरोप लगाते रहे हैं। सबकी जय जय। --यशवंत))

पार्ट एक
विपिन ने नोएडा के एक संस्थान से मास कम्युनिकेशन और जर्नलिज्म का कोर्स किया। पत्रकार बनने के लिए मैदान में उतरा। वही तरीका अपनाया जो इस देश के आम छात्र अपनाते हैं। आम छात्र माने जिसका बाप संपादक न हो, जिसका भाई सीनियर जर्नलिस्ट न हो, जिसके परिवार या कुनबे में कोई बड़ा अफसर या प्रभावशाली व्यक्ति न हो। तो पत्रकारिता का यह शिशु आंखों में एक सफल पत्रकार बनने का सपना लिये मैदान में कूदा।

विपिन ने संपादकों और बड़े पत्रकारों के मोबाइल नंबर तभी से इकट्ठा करना शुरू कर दिया था जबसे उसने पत्रकारिता का कोर्स शुरू किया था। टीवी और प्रिंट की दुनिया में होने वाली हर हलचल या उड़ने वाली अफवाह से खुद को बड़ा ही इमोशनली अटैच करके रखता था। सुन रखा था, पत्रकार जन्मना होता है, डिग्री-डिप्लोमा से नहीं, उसे अंदर-बाहर सबकी खबर रखनी चाहिए। किस अखबार में किस जगह पर कौन व्यक्ति नौकरी देने की हालत में है, किस टीवी को कौन सा नामी गिरामी व्यक्ति हेड कर रहा है और उसका अतीत क्या रहा है, सबकी केस हिस्ट्री तैयार कर रखी थी। नौकरी दे सकने वाले हर अखबार व टीवी के सिरमौरों की छवि अपने आंखों में कैद कर रखी थी।

विपिन रात में सोता तो सपने देखता। सीधे प्रणय राय उससे कहीं टकरा गये। उन्होंने देखते ही कहा- अरे, तुम तो वही हो जिसे अब तक हिंदी पत्रकारिता को तलाश थी। तुरंत चलो मेरे साथ। ज्वाइन करो एनडीटीवी। सपने में ही विपिन खुद पर मुग्ध हो गया। खुद से कह उठा--देखा, देश में अभी जिनुइन लोगों के लिए बहुत मौके बचे हैं। उसके अंदर का पत्रकार आखिर एक जौहरी द्वारा पहचान ही लिया गया। ईश्वर के घर में देर है, अंधेर नहीं। विपिन ने एनडीटीवी ज्वाइन कर लिया। रोज प्रणय राय मीटिंग लेने आते। नये आइडाइज पर बात चलती तो विपिन जो कुछ कहता, उस पर वो मोहित हो जाते। विपिन टीवी पर प्राइम टाइम में आने लगा। टीवी पर अपने बेटे को देख मां खुशी से झू्म उठीं। आखिर, बेटे ने नाम रोशन कर ही दिया खानदान का। मोहल्ले, गांव, गली के लोग विपिन को काफी सम्मान देने लगे। गाड़ी और बंगला के बाद आखिर वो लड़की भी मिल ही गई जिसे वर्षों से वह तलाश रहा था। वो टीवी चैनल में ही थी, विपिन के स्टाइल और दिमाग पर रीझ गई थी। उसी ने एक दिन प्रपोज कर दिया- आई लव यू विपू, विल यू मैरी मी? विपिन लड़कियों की तरह शरमा गया। सीन एकदम से चेंज हो गया, हिंदी फिल्मों की माफिक। लड़की के साथ हरे भरे बगीचे में विपू गाना गाने लगा। लड़की रीप्ले स्टाइल में बाहें फैलाये दौ़ड़े आ रही है, विपिन भी कुलांचे लगाता बढ़ रहा है....दोनों करीब आते हैं और एक दूसरे को बाहों में भींच लेते हैं। मंजिल मिल गई। सब कुछ मिल गया। नौकरी, पैसा, यश, ग्लैमर, पापुलरिटी और ऐश्वर्या राय सरीखी सुंदर, सेक्सी और दिमागदार लड़की। अब जीने को क्या चाहिए......।

लेकिन ये सब तो सपना था। आंख खुली तो थोड़ा निराश हुआ लेकिन सपने में इतना सब कुछ पाजिटिव देख उत्साह तो आ ही गयी। कोर्स कंप्लीट होते ही सीधे एनडीटीवी के दफ्तर गया। प्रणय राय से मिलने की बात कही। पर अंदर ही नहीं घुस पाया, गार्डों ने समझा-टरका दिया, एप्वाइंटमेंट वगैरह न होने की बात कहकर। जी न्यूज, आईबीएन, आज तक, स्टार न्यूज और बाद में टोटल, एसवन, लाइव इंडिया....। परिंदे ने कोई ठिकाना नहीं छोड़ा। हर जगह एक ही सवाल, फ्रेशर हो तुम। अभी कोई अनुभव नहीं है। अभी यहां कोई जरूरत नहीं है। कई बार तो मुच्छड़ सेक्युरिटी गार्डों ने खुद उसका रिज्यूम लिया, सूंघा, देखा, नापा-जोखा और वक्तव्य दे दिया- फ्रेशर हो तुम। विपिन मन ही मन सोचता--अबे, सूप तो सूप बोले, चलनी भी बोले जिसमें छप्पन छेद। भोसड़ी वाले, ये सब भी खुद को प्रणय राय से कम नहीं समझते।

विपिन अब सपने की दुनिया से हकीकत के मैदान में था। एक फ्रेशर का रीयल स्ट्रल शुरू हो चुका था। टीवी से निराश होने के बाद सेकेंड प्रियारिटी पर रखे अपने मंजिल....अखबारों के दफ्तरों की गड़ेश परिक्रमा शुरू कर दी। हर उन संपादकों, इंचार्जों और ब्यूरो प्रमुखों से मिलने और फोनियाने की कोशिश में लगा जिनका भोकाल है। अव्वल तो उसे इंटरटेन ही बहुत कम लोग करते, जो थोड़े इमोशनल नकाब वाले लोग उससे बात करते, ज्यादातर यही जवाब देते, फ्रेशर हो तुम। अभी जरूरत नहीं है फ्रेशरों की। यहां जरूरत तो है लेकिन एक्सपीरियेंस्ड लोगों की।


विपिन टूटने लगा। सबको फोन मिला चुका था। जिन-जिन लोगों ने फोन उठाया, उनसे उसने विनम्रता की सारी हदें पार करते हुए अभिवादन के साथ बात की। लेकिन उस छोर पर हां, हूं करने वाले हर शख्स ने अंत में ना, नू करके फोन काट दिया। हर आफिस के चक्कर मारे। हर बड़े शख्स से मिलने के लिए अप्वाइंटमेंट लिये। लेकिन हाय, नौकरी कहीं हाथ न आई। सिर्फ रात के सपने में ही पकड़ में आती। बाद में वह थोड़ा और चतुराई से मिलने की कोशिश करने लगा।

एक दिन उसे विश्वस्त सूत्रों के जरिये पता चला कि फलाने चैनल के फलाने हेड फलां रेस्टोरेंट में खाना खाने गए हुए हैं। उसने उनसे अतीत में मिलने की कई बार कोशिश की थी लेकिन सेक्युरिटी गार्डों ने उसे कभी अंदर जाने नहीं दिया था। वह सूत्र पर भरोसा करते हुए सूचना पर खेल जाने का निर्णय कर गया। वह रेस्टोरेंट पहुंच गया। धीरे-धीरे सरकते हुए चैनल हेड के टेबल के पास पहुंच गया। वो किसी से बातचीत में मशगूल थे। उसने साहस करके अपना परिचय दिया, जमाने भर की सारी विनम्रता झोंकते हुए...
गुड आफ्टरनून सर, मैं विपिन हूं, आपका बहुत बड़ा फैन, बचपन से आपको टीवी पर देखता आया हूं, आपसे मिलने की तमन्ना थी लेकिन मिल नहीं पा रहा था, क्या आप दो मिनट बात करने का मौका दे सकते हैं?
चैनल हेड ने समझ तो लिया, टिड्डा दल का सदस्य है, नौकरी मांगेगा, लेकिन विपिन ने इंट्रों में ही जो तेल झोंक दिया था, उसने थोड़ी देर के लिए असर दिखाया, चैनल हेड को हां कहना पड़ा।
विपिन बोला- सर, मैंने मास काम और जर्नलिज्म का कोर्स कंप्लीट किया है, आपके साथ काम करने का मौका चाहता हूं। आपको निराश नहीं करूंगा। संस्थान की शोहरत और साख को बुलंदियों तक पहुंचाने की कोशिश करूंगा। बस, सर प्लीज, मुझे एक मौका दे दीजिए।

इतना कहते हुए विपिन ने बायोडाटा आगे बढ़ा दिया।

चैनल हेड ने देखा, थो़ड़ी देर निगाह रिज्यूम पर उपर नीचे दौड़ाने के बाद बोले- देखो, तुम फ्रेशर हो, अभी फ्रेशर्स को रिक्रूट नहीं कर रहे हैं। जब जरूरत होगी तो तुम्हें काल करेंगे। ठीक है ना। ओके।
इतना कहते ही उन्होंने हाथ आगे बढ़ाया। विपिन ने हाथ उनसे मिलाया। इशारा काफी था, बेटा निकल लो। खाने-पीने-हगने-मूतने की जगहों पर भी इन टिड्डा दल सदस्य, संवाद सूत्र-मलमूत्र टाइप के लोगों ने जीना हराम कर दिया है। मन ही मन चैनल हेड उसे गरियाते रहे। चेहरे पर कंप्यूटरी स्माइली बिखेरते रहे। और विपिन, वह वहां से फिर से झुककर थैंक्स करने के बाद पीछे लौटने लगा। जैसे, राजा के दरबार से आम लोग बिना मु़ड़े सिर झुकाए पीछे हटते जाते थे।

पाठकों की सहूलियत की खातिर किस्से को लंबा न करते हुए, विपिन को संपादकों, प्रभारियों, ब्यूरो प्रमुखों, चैनल हेडों ने जो जवाब दिये थे, वो सार-संक्षेप और एक नजर में दिए जा रहे हैं.....कुछ खबरें रिपीट सी लगेंगी लेकिन यह मानवीय गलती हो जाया करती है......
अभी तुम फ्रेशर हो, और ऐसों की अभी यहां जरूरत नहीं है।
एक्सपीरियेंस्ड चाहिए, बाद में मिलना।
टच में बने रहना, कुछ होगा तो जरूर बतायेंगे।
अब सिखाने और अनुभव देने का दौर कहां रहा दोस्त। रेडीमेड खरीदने का दौर है। कहीं सीख लो। फिर आना।
रिज्यूम छोड़ दो, समय पर काल किया जायेगा।
टेस्ट दे दो, बाद में बता दिया जायेगा।
हम टीवी के ही एक्सपीरियेंस्ड लोगों को लेते हैं।
फ्रेशर रखने की परंपरा यहां नहीं है।
रिज्यू्म मेल कर देना, देखा जायेगा।
यहां अभी कोई जगह नहीं है।
बिना अप्वाइंटमेंट लिये कैसे चले आए, रिज्यू्म रख दो, देखेंगे।
खबर बनाने और लिखने का अनुभव कहीं ले लो, फिर आना।
ट्रांसलेशन कर दो, फिर देखेंगे।
आदि आदि।

विपिन ने बहुत स्ट्रगल किया। कई बार रोया। बेहद फ्रस्टेट हुआ। सारे संपादकों और चैनल हेडों को अकेले में खूब गरियाता। कई बार पंखे की ओर देखते हुए आत्महत्या के बारे में प्लान करता। कई बार फ्रेशर शब्द से नफरत होती। लेकिन उसने स्ट्रगल जारी रखा। चेहरे की कांति खत्म होने लगी। शरीर कमजोर होने लगा।

अब इतना डिटेल में जायेंगे नहीं। बड़ी खबरों को अब कोई पाठक नहीं पढ़ता इसलिए कापी बढ़िया रखने की कोशिश करते हुए सीधे छह माह बाद के विपिन के पास पहुंचते हैं।

पार्ट दो
जी, विपिन आजकल एक छोटे से अखबार में ट्रेनी है और क्राइम रिपोर्टिंग करता है। यह अखबार एक बिल्डर ने अपने प्रापर्टी के धंधे को चमकाने के लिए और धंधे के काले स्याह को सफेद करने के लिए, अफसरों पर दबाव बनवाने के लिए, नेताओं-मंत्रियों से मीटिंग फिक्स करवाने के लिए लांच किया था। एनसीआर के इस अखबार में जो संपादक हैं वो अपने रिपोर्टरों के पैसे से दारू पीते हैं। पीने के बाद उन्हें पत्रकारिता के टिप्स देते हैं। अखबार और टीवी में बड़े-बड़े पदों पर बैठे लोगों से अपने याराना संपर्कों को गिनाते हैं, उनके साथ जिये पलों के झूठे-सच्चे किस्से सुनाते हैं और आखिर में नशे की अभिन्न अवस्था में लोकधुन के गीत गाते हुए अपनी माटी को याद करते हैं। ये बताते हुए कि अगर तुम्हें पत्रकारिता में आगे बढ़ना है तो मेरे जैसे महान व्यक्ति के अनुभवों को जरूर सुनना चाहिए, दारू पीना चाहिए और इसी पीने के दौरान खबर के नए-नए बिंब पर सोचना और मथना चाहिए।

विपिन चमत्कृत था। संपादक जी के ज्ञान और कनेक्शन का लोहा मानते हुए एक पक्के शिष्य की तरह जी सर, जी सर करता। वह शुरू में ज्यादा बोलने के लिए डांट खा चुका था और एक अच्छे शिष्य के लक्षणों को ज्ञात कर चुका था। वह सिर्फ संपादक जी की इच्छाओं का खयाल रखता, इस हद तक कि अगर वो कहें कि खोलकर झुक जाओ तो वह यह भी कर देता। यहां श्रद्धा और आस्था का मामला था, दिमाग का इस्तेमाल करना पाप था। दो पैग बाद संपादक जी बोलते, जरा सिगरेट देना। नहीं है क्या? कोई बात नहीं, ये पैसे लो, जरा लेते आओ। अरे सर, पैसे है, आपका ही है। विपिन भागकर जाता और लाता। मसाला है? नहीं है, जरा लेते आओ।

पीने के दौरान सिगरेट और चिकन न हो तो पीने का मजा ही क्या। बीच-बीच में गुटखा कंसनट्रेट कर देता है। विपिन ढाई हजार रुपये पाता है। इतना वो अपनी बाइक में तेल भराने में फूंक देता है। तो संपादक को दारू कहां से पिलाता है? वो जो पैसे घर से आते हैं, उससे।

विपिन को संपादक ने गुरु मंत्र दे दिया था। देखो, लाला की दुकान है, ज्यादा आदर्श के चक्कर में पड़ोगे तो भूखे मरोगे और जिंदगी भर ट्रेनी बने रहोगे। थाने और पुलिस से काम कराओ। पैसे कमाओ। स्टिंग करो। दबाव बनाओ। पैसे न मिले तो अखबार में छापो। ज्यादा बढ़िया और दमदार स्टिंग हो तो टीवी वालों को बेच देंगे। मतलब, संपादक जी ने पत्रकारिता से परे की उस अज्ञात दुनिया के सारे भेद खोल दिये और सारे टिप्स दे दिये, जिसके बारे में विपिन को बिलकुल अंदाजा नहीं था। लेकिन वह इसे वाकई जानना चाहता था। उसे दिल्ली से हारकर नहीं लौटना था। उसे सफल होना था। वह नहीं चाहता था कि वह इस छोटे अखबार से भी बाहर हो जाए। उसे पता था, लोगों ने समझा रखा था, सभी बड़े पत्रकार छोटे जगहों पर ही गांड़ घिसकर और मराकर आगे बढ़े हैं। उसे अब भी उम्मीद थी कि एक दिन प्रणय राय जरूर कहीं टकरायेंगे और उसके छोटे अखबार में फ्रंट पेज पर छपी इलाके के थानेदार के खिलाफ वाली खबर की तारीफ करते हुए अपने चैनल में ज्वाइन कराने ले जाएंगे।

विपिन ने जब दारू पीना सीखना शुरू किया तो शुरू में कई दिनों तक उल्टियां हुईं। उल्टियां करते विपिन को देख संपादक बाकी पत्रकार चेलों को रोकते हुए कहते, उलटने दो उसे, जो कुछ गले में, पेट में फंसा है। ये वो कचरा है, ये वो भड़ास है, जिसे उसने अपने परिवार और समाज के संस्कारों के चलते जमा किया हुआ था। ये अब तक ठीक थे लेकिन आगे के लिए श्राप हैं। नए संस्कार सीखने होगे। बिना इसे पुराने संस्कार और भड़ास को उगले यह पत्रकारिता के नये संस्कारोंस आदर्शों को अपना ही नहीं पायेगा। और सभी ट्रेनी पत्रकार अपने ट्रेनी दारूबाजी के शुरुआती दिनों में इस तरह उलटते हैं। दरअसल बाडी अपने को इस नये दौर के साथ एडजस्ट करती है..... ये सब कहते-सुनाते हुए संपादक जी को अपने पुराने दिन याद आ जाते हैं जब वो खुद एक संपादक के ट्रेनी हुआ करते थे और जब वो उल्टियां करते तो वो संपादक भी यही डायलाग मारा करते थे। और बाद में उनके नक्शे कदम पर चलते हुए, उनके अनुभवों का फायदा उठाते हुए पत्रकारिता में काफी आगे गये। लेकिन इसके आगे की सोचते व खयाल आते ही एकदम से चेहरे पर चिंता की लकीरें खिंच गईं। तनाव में आने लगे।

संपादक जी को वो दिन याद आ गया जब वो एक बड़े राष्ट्रीय अखबार के स्थानीय संपादक हुआ करते थे और ज्यादा माल कमाने की होड़ में जनरल मैनेजर से गुपचुप पंगा ले बैठे। जीएम ज्यादा प्रोफेशनल निकला। इस जीएम ने दो दांव खेले, एक अंदरुनी और दूसरा बाहरी। बाहरी वाला तो संपादक जी को पता चल गया, लेकिन अंदरुनी वाला तब मालूम हुआ जब वे अखबर से बाहर हो गये। पहले बाहरी वाला बताते हैं-हुआ ये कि जीएम ने हर जिले में अपने आफिसियल कम पर्सनल चेलों को गुप्त संदेश भेजकर सरकुलेशन गिरवाने के निरदेश दिए। मालिक ने एजेंटों और जीएम की मीटिंग बुलाई तो सबने एक सुर में कहा कि अखबार में कुछ पढ़ने लायक ही नहीं है, इसीलिए लोग अखबार बंद करा रहे हैं। मतलब, कंटेंट कमजोर होने की गाज सीधे-सीधे संपादक पर गिरी। स्थानीय संपादक ने लाख सफाई दी लेकिन जीएम की बात मानी गई क्योंकि वो हर साल बिजनेस के टारगेट को पूरा करता और मालिक की हर अदा को बखूबी पहचानते हुए उनके मनमाफिक रिस्पांस करता। एक दुर्भाग्यशाली दिन (संपादक जी अक्सर कहते हैं कि अंकज्योतिष, न्यूमरोलाजी के हिसाब से सबसे खराब डिजिट, अंक वही है ही) मालिक ने संपादक को आखिरकार कह ही दिया, महीने भर में कहीं देख लीजिये।

संपादक को बाहर होने के बाद पता चला कि वो जिन रिपोर्टरों को खास समझते हुए उनके साथ दारू पीते थे और धंधे पानी की साझेदारी करते थे वे सब के सब डबल एजेंट निकले। तभी से उन्होंने कसम खा लिया था कि अपना आदमी बनाने में हमेशा सावधानी बरतेंगे। तभी से वे पुराने चघड़ हरामियों की बजाय नए घोड़ों पर दांव लगाते थे जिनका दिल और दिमाग कच्चे घड़े की तरह होता था, जैसा चाहे ढाल दो।

विपिन में उन्हें अपार ऊर्जा दिखी थी। उसे उन्होंने एक नजर में ही भांप लिया। बच्चे को मौका दिया। दो महीने तक सिर्फ खबर और खबर की बात की। उसकी खबरों को प्रमुखता से छापते रहे। विपिन नतमस्तक। उसे गांड़फादर मिल चुका था। एक दिन उसे क्राइम बीट दे दी गई। वो वाकई परफार्म कर रहा था। उसे रोज टिप्स देते। पुलिस वालों को पटाओ, न पटे तो गांड़ फाड़ दो। अपने आप गिर जायेगा। कई बार हुआ उल्टा। अखबार तो राष्ट्रीय स्तर का था नहीं, बिकता-विकता था नहीं, इसलिए पुलिस वालों की गांड़ फटने की बजाय पुलिस वालों ने विपिन की ही फाड़ दी। विपिन संपादक के पास जाकर घटनाक्रम बयान करता तो वे उसे पत्रकारिता के खट्टे-मीठे अनुभवों से ही गुजरकर महान बनने की परंपरा का सनाम उदाहरण व सीख देते। लेकिन संपादक भी खुद को अंदर ही अंदर समझाते। छोटे अखबार का असर नहीं होता। संपादक ने भी खुद को बदला, समय के साथ जैसे हमेशा बदला। पाजिटिव (तेल लगाने वाली) खबरों का दौर है, नए जमाने का जर्नलिज्म यही है। नए ट्रेंड को पकड़ो। वो निगेटिविटी अब नहीं चलती। ये सब बोलते बोलते संपादक जी अंदर ही अंदर खुद को समझाते---फाड़ने में तो किसी दिन खुद की फट जायेगी।

फिर छह महीने आगे कूदते हैं और विपिन की नई स्थिति पर नजर डालते हैं।

पार्ट तीन
विपिन के अनुभवों का छठां महीना था। वो बिलकुल पक्का हो गया है। थाने में जो मामले आते, थानेदार उसे मध्यस्थ बना देता। डील करने और कमाने के सारे तरीके बखूबी समझ चुका था विपिन। संपादक भी बेहद खुश। विपिन अपने हिस्से के पैसे से ही दारू-मुर्गा मैनेज करता। लायल्टी और चेलहाई की नई मिसाल कायम करने लगा विपिन। कई मोबाइल सेट और गिफ्ट दे चुका था संपादक के घरवालों को। जिन कुछ दिनों में विपिन संपादक के घर न जाता, संपादक की पत्नी खुद पूछ लेतीं, अपना विपिन नहीं आ रहा है आजकल। संपादक आफिस में विपिन से अकेले में बताते—अरे भई, तुम्हारी तो मेरी घर तक चर्चा है। तुम्हारी भाभी पूछ रहीं थीं, कई दिनों से नहीं दिखे इसलिए। ये आदर्श स्थिति है। अगर गांड़फादर के होम को सेट कर लिया, इंप्रेस्ड कर दिया तो बस, फ्यूचर उज्जवल है।

विपिन दारू का आदी हो गया। उसे मजा आने लगा। विसंगतियों और कड़वे अनुभवों से उबर जाता। वह दिन भर बैल की तरह दौड़ता और रिपोर्टिंग करता। हालांकि उसके अंदर-अंदर काफी कुछ चलता भी रहता लेकिन वह फैसलाकुन स्थिति तक पहुंचने से पहले रही दारू पी लेता और पैसे की महिमा की जय जय करने लगता। दिल-दिमाग के द्वंद्व पर फैसला लेने की बजाय उन्हें टालता जाता, भूलता जाता, आगे बढ़ता जाता। उसे याद आ जाते वो सारे बड़े चेहरे जहां वह नौकरी मांगने गया था। वो उन लोगों के पास किसी हालत में फिर नौकरी मांगने नहीं जाना चाहता। पत्रकारिता के सारे सूत्र पकड़ में आ चुके थे। मसलन, अगर पत्रकारिता में पीआर अच्छा नहीं है तो कहीं कुछ नहीं होने वाला। दुबले पतले विपिन का शरीर अब ठीक ठाक हो चुका था। दारू और मुर्गे ने तोंद निकाल दी, चेहरे की हड्डियों पर मांस चढ़ चुका था, शरीर भरने लगा था। वह एक्सपीरियेंस्ड के साथ-साथ आकर्षक भी हो गया था।

वह अब फ्रेशर नहीं, एक्सपेरीयेंस्ड सा था। वह जो दिल में सोचता उसे मुंह तक नहीं लाता और जो मुंह पर लाता वह कतई दिल में नहीं होता। वह सिर्फ और सिर्फ दिमाग की प्लानिंग से जीने लगा। इमोशन और दिल का इस्तेमाल महफिल लूटने, पीआर ठीक करने के लिए ही इस्तेमाल करता। दिमाग के आदेश पर ही दिल व इमोशन को काम करना पड़ता। वाह, एक एक्सपिरियेंस्ड पत्रकार विपिन।

एक और दारू भरी रात।

संपादक के यहां फिर दारू पार्टी थी। उनके एक मित्र भी आये थे जो एक राष्ट्रीय अखबार में रिपोर्टिंग इंचार्ज हुआ करते थे। मित्र क्या, कभी शिष्य थे, अब राष्ट्रीय अखबार में ठीकठाक पद पर हैं तो वे बराबरी का रिश्ता रख सकते थे। इतनी छूट समय के साथ दे दी जाती है। दारू पार्टी का मैनेजिंग डायरेक्टर विपिन ही था। उसे पहले ही हिदायत दे दी थी संपादक जी ने, वो आ रहा है, उससे तुम्हारी बात करूंगा। विपिन उत्साहित था। उसने सब कुछ मैनेज किया। रोज के मुकाबले दोगुने रुपये फूंके। नतीजा भी आया।

उसे राष्ट्रीय अखबार वाले रिपोर्टिंग इंचार्ज ने बताया कि उनके यहां रिपोर्टिंग टीम में जरूरत है और वो जिसे रिकमेंड करेंगे उसे ही रखा जायेगा। विपिन की स्वामिभक्ति और चेलहाई उन्हें भा गई। जात बिरादरी भी मिल रही थी। बस, अंदर ही अंदर उन्होंने फैसला ले लिया। इस हीरे को साथ रखना है। दूर तक साथ देगा, हंड्रेड पाइपर की तरह। पता भी नहीं चलेगा, नशा भी चढे़गा।

नशे की अभिन्न अवस्था में जब संपादक और उनके मित्र अपने अपने घरों की ओर प्रस्थान कर रहे थे तो विपिन संपादक जी की हिदायत के अनुपालन में अपनी बाइक पर बिठाकर उन रिपोर्टिंग इंचार्ज को उनको घर छोड़ने ले गया। रास्ते में उस सज्ज्न ने विपिन से बस इतना कहा, कल आफिस में सुबह 10 बजे आ जाना। अनुभवी विपिन ने बस जवाब दिया, जी सर। उन्हें घर छोड़कर और पैर छूकर वापस लौट आया।
विपिन अगले दिन बताये हुए आफिस गया। पैर छुआ। उसे एक और सज्ज्न के पास ले जाया गया जिनका केबिन थोड़ा और बड़ा था। उसने जाकर उनका भी पैर छुआ। टेस्ट लिया गया। इंटरव्यू का एक राउंड चला। उसके बाद करियरका नापजोख किया गया। आखिर में उसका ओके हो गया।

विपिन अब राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में स्थित एक राष्ट्रीय अखबार में उप संपादक, बोले तो सब एडीटर हो गया है। उसे अब पूरे 12 हजार रुपये मिलने लगे हैं। वह रिपोर्टिंग पूरी गंभीरता से करने लगा है। वह पत्रकारिता के आदर्शों पर उसी तरह बात करता है जैसे बाकी लिखने पढ़ने वाले साहित्यकार और पत्रकारर और संपादक लोग करते हैं लेकिन वह फील्ड में वही करता है जो बाकी समझदारर लोग करते हैं। पैसे, कनेक्शन, बिजनेस, पीआर.....।

विपिन का एनर्जी लेवल और बाडी लैंग्वज और भी ज्यादा डायनमिक और एक्सपेरीयेंस्ड दिखने लगी। फील्ड में जो नहीं पटता, उसकी विपिन फाड़ देता। उस खबर को विशेष या ब्रेकिंग न्यूज का लोगो लगाकर प्रकाशित किया जाता। जो पट जाता उसके लिए विशेष तरीके से दिमाग लगाकर भांति भांति की खबरों में उसका वर्जन पेल कर उसे सेलिब्रिटी बना दिया जाता।

विपिन ने बढिया मकान ले लिया है। उसके घरवाले भी आने और रहने लगे हैं। विपिन के यहां अब हर सामान है। उसने कार लेने की प्लानिंग कर ली है। ढेर सारी लड़कियों की तस्वीर लेकर पिता जी भी आये थे, उसने एक लड़की के लिए हां कर दी। उस लड़की के पिता पीसीएस रैंक के अफसर हैं। लड़की थोड़ी काली और मोटी है लेकिन पैसा खूब मिल रहा है और अफसर सकुर। कनेक्शन का नया खेल शुरू होगा। विपिन ने ओके कर दिया। विपिन को पता था, हाथी के खाने और दिखाने के दांत अलग अलग होते हैं।

बस, कहानी खत्म। क्योंकि विपिन अभी इसी स्थिति में है।

दोस्तों, विपिन बदला हुआ नाम है। विपिन मेरा नया-नया मित्र बना है। और, जानते ही हैं, मेरी मित्र मंडली शिव जी की बारात की तरह है और उसमें भांति-भांति के जीवनानुभवों से ओत-प्रोत लोग हैं। सबको मेरा आशीर्वाद होता है। बाबा का आशीर्वाद। भड़ासी बाबा का प्यार और दुलार।

विपिन मुझे औरों से थोड़ा प्यारा इसलिए लगा क्योंकि उसने बोलकर ही सही, अपनी भड़ास मेरे से निकाली। और ये भी कहा, इसे भड़ास पर डाल दीजियेगा, नाम व हालात बदलकर। सो, मैंने डाल दिया।

आदर्शवादी और नैतिकतावादी कहेंगे, कहानी से संदेश क्या दे रहो हो भड़ासी बाबू?

मैं कहूंगा.....ये भड़ास न्यूज चैनलों की तरह ही है, जो बिना खबर के सकारात्मक-नकारात्मक प्रभाव को समझे बिना किसी भी ऐसी तैसी खबर पर खेल जाते हैं, उसी तरह यहां हम भी हर पत्रकार के जीवन के अच्छे-बुरे पक्ष को एक साथ रखेंगे।

चलिए....फिर मिलेंगे....किसी और पत्रकार मित्र की दास्तान के साथ।


जय भड़ास
यशवंत
(अपने सुझावों को आप इस मेल पर या इस मोबाइल पर शेयर कर सकते हैं)
yashwantdelhi@gmail.com
09999330099

14 comments:

आशीष महर्षि said...

यशवंत जी इस पूरी कहानी में मैं अपने आप को तलाशता रहा...मैं अभी तक पहले पार्ट में ही हूँ...लेकिन विपिन करता भी क्या....

sadhu said...

यह एक कड़वी और नंगी सच्चाई है समाज सेवा के नाम पर लोगों को चूतिया बनने का तरीका ही तो पत्रकारिता है

चंद्रभूषण said...

बहुत अच्छा लिखा। इस चीमड़ हरामीपने में क्या कहीं कुछ नमी भी बची रह पाएगी?

Sanjeet Tripathi said...

बहुत अच्छे!!!

शशिकान्‍त अवस्‍थी said...

पत्रकारों के लिये इसमे कुछ भी नया नही है । यशंवत जी प्लीज शालीनता बनाये रखियें ।

neelima sukhija arora said...

पहले लगा इतनी लम्बी कहानी, नहीं पढ़ूंगी पक जाऊंगी। पर फिर लगा पढ़ ही लेती हूं बीच में छोड़ दूंगी। लेकिन एक बार पढ़नी शुरू की तो रूक नहीं पाई। कहानी अच्छी लिखी है अंत तक बांधे रखती है।
पर ये तो सबके जैसी कहानी ही है, कोई विपिन, आशीष, सचिन, राजीव संजीव सभी तो ऐसे ही दौर से गुजर कर आते हैं इसमें अलग क्या है।
प्रशन तो सिर्फ एक है कि पत्रकारिता का शुरुआत और अंत दोनों ही इतने गंदे क्यों हैं ।

Abhishek Satya Vratam said...

bhaiya! kahani bahut achchhi hai. khud to abhi is peshe me nahin hoon lekin chuki sanagat aise hi logon ki hai jo is peshe ki hakeekat se rubaroo hain. kahani me kasaav bahut gajab ka hai.. kab shuru kiya aur kab padh gaya pata hi nahin chala.

राहुल said...

अगर ये शुरुआत है तो वेल्डन !! बकप !! लगे रहो यशवंत भाई. लेकिन अभी इस कहानी मे काफ़ी चीज़ें छूट गई हैं. हो सकता है की आयेज लिखी जाने वाली कहानियों मे नज़र आ जाएँ . बहराल, ये संदेश उनके लिए जिन्हे कहानी मे कुछ भी नया नही लग रहा है.
भाई शशिकांत जी, आप कौन हैं , हक़ीकत मे मुझे नही पता क्योंकि इंडियन इंटरनेट एंड मोबाइल रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार 80 % लोग इंटरनेट पर अपने बारे मे झूठ बोलते हैं. बहराल ये आपको लग सकता है की कहानी मे कुछ भी नया नही है. हो सकता है की आप पत्रकार हों , लेकिन मेरे ख़्याल से भदास को सिर्फ़ पत्रकारों के पढ़ने के लिए नही बनाया गया है. जिसका जो मान करेगा, लिखेगा, आपके पेट मे दर्द होता है तो डॉक्टर को दिखाईए, कुछ गोली शोली लीजिए. काहे लिए इतना परेशान हो रहे हैं.

यशवंत सिंह said...

सभी का शुक्रिया, खासतौर पर कानपुर वाले शशिकांत जी का भी क्योंकि उन्होंने अपने मन की बात सच सच कहने का साहस किया.....। शशि भाई, जरूरी नहीं कि हर चीज हर सभी को अच्छी लगे। दरअसल, जो बातें हम पत्रकार लोग बखूबी जानते हैं, उसे दुनिया के सामने भी आना चाहिए ताकि धीरे धीरे पत्रकारिता में भर्ती और प्रमोशन जैसे काम मेरिट के आधार पर और ट्रांसपैरेंट तरीके से हो सकें न कि दारूबाजी या जाति बिरादरी या चेलहाई के आधार पर। आप से उम्मीद है कि आप पत्रकारों के लिए कुछ नया लिखेंगे ताकि हम सभी उससे अवगत हो सकें। चंदू भाई, आशीष, साधु, नीलिमा, राहुल, संजीत, अभिषेक, शशिकांत...सभी टिप्पणीकारों को धन्यवाद...। उम्मीद है आप लोगों का साथ, प्यार और स्नेह बना रहेगा।
यशवंत

बोधिसत्व said...

विपिन की मुश्किल को मैं थोड़ा समझ सकता हूँ...अच्छी तरह से आपने बयान किया है...विपिन का संघर्ष लगे रहें...

शशिकान्‍त अवस्‍थी said...

यशवंत जी 'एक फ्रेशर पत्रकार के एक्सपीरियेंस्ड बनने की दास्तान'में मैने जो भी लिखा है उसका गलत अर्थ मेरे भाई राहुल द्वारा लगा लिया गया है मेरा कहने का अर्थ यह था कि लगभग 80 प्रतिशत पत्रकारों को यह सब झेलना ही पड़ता है केवल 20 प्रतिशत ही ऐसे भाग्यशाली होते है जिन्‍हे बिना कठिनाई के ही मंजिल मिल जाती है । इसलिये मैने यह लिखा कि इसमें पत्रकारों के लिये कुछ नया नही है क्‍योकि यह सब पार करते हुये ही हम यहां तक पहुंचते है । राहुल भाई जो लोग झूठ का आवरण पहने रहते है दिल में कुछ ऊपर कुछ रखते है । मै अपने को इससे दूर रखने की कोशिश कर रहा ह इसलियें जो कुछ भी प्रोफाईल में डाला है सब सत्‍य ही है । अगर आपका अथवा यशंवत भाई को मेरी टिप्पडी से कुछ कष्ट हुआ है तो उसके लिये मै दोनो से खेद प्रकट करता हु अगर आपका आदेश होगा तो मै अपना मोबाईल न. भी आपको भेज दूंगा आप मुझे जी भरके गरिया लिजियेगा ।

कानपुर से आपका
शशिकान्‍त अवस्‍थी

यशवंत सिंह said...

शशि भाई....आप भी ना, ये सब तो अपने परिवार में चलता ही रहता है। आप का बड़प्पन है जो आप ने माफी मांगी और मोबाइल नंबर आफर कर रहे हैं, ये सादगी बहुत कम लोगों में होती है और यही सादगी भड़ासियों को सबसे अलग बनाती है। मुझे बिलकुल बुरा नहीं लगा है, राहुल भी बच्चा है अपन लोगों का, उसने भी यूं ही लिख दिया होगा....मस्त रहिए....खुश रहिये....अगर किसी बात से आप को तकलीफ हुई हो तो माफ करियेगा....प्लीज...
यशवंत

अंकित माथुर said...

Yashwant Bhai,
I was away since a long time, have not been able to actively participate in any of the posts since last 2 weeks. But this story
of Vipin is tremendous. Marvellous
representation of current scenario
which each aspiring "FRESHER" faces on a day to day basis.
Good work!!

Anonymous said...

sach to hai par poora nahi
asal par aooo dost, haqiqat is kahai se bhi khanhi nangi aur karvi hai
rishi