Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

30.1.08

कमीने तो हर डाल पर बैठे हैं गालिब........

आदरणीय विनीत कुमारजी, लेख न छपने पर और वाजिब जवाब न मिलने पर आपका गुस्सा जायज है। अगर पत्रकारिता की आज की दुनिया के ही जीव हैं आप तो तो मेरे ख्याल यह आप को भी बखूबी पता होगा कि हर अखबार में वही छपता है जो उसके नियामक चाहते हैं न कि लिखनेवाले। भड़ासी भाई दुकान जरूर जनता के लिए खुली है मगर दुकानदार जो बेचना चाहेगा वहीं बिकेगा। खरीदार की मर्जी तब देखी जाती है जब उसमें व्यावसायिक हित शामिल हो। बहरहाल मैं आपको कोई नसीहत नहीं देना चाहता मगर अपील जरूर है कि वहीं लिखें जहां छपने की संभावना हो। वैसे इसी तरह एक शिकायत एक ब्लागर भाई ने नई दुनिया के संदर्भ में की थी मगर आप की तरह भड़ककर नहीं। उन्होंने सिर्फ यह कहा था कि पता नहीं उन्हें अब क्यों नहीं छापते नईदुनिया वाले।
जनसत्ता बाजार में वैसा बिकाऊ माल नहीं रहा तो इसका मतलब यह नहीं कि इतना तुच्छ हो गया है कि आप उसपर हंस सकें। जनसत्ता का होने के नाते मुझे आपकी यह उपहास वाली टिप्पणी उसी तरह नागवार लगी जैसे न छपने और जनसत्ता के दो टूक जवाब से आपको लगी। अगर कोई आपको नहीं छापता तो इसमें लड़ने वाली बात क्या है। हर किसी के अपने दायरे हैं। जनसत्ता मेरी नजर में कल भी अच्छा अखबार था और आज भी है।
एक शिकायत यशवंतजी से भी है। आपने दुबारा भड़ास शुरू करने पर कहा था कि हम अपने ही तंत्र या व्यवस्था पर टिप्पणी करने से परहेज रखेंगे। इसकी vajaha भी साफ है कि जल में रहकर मगर से बैर कितना जायज होगा। अब उसके बाद से यह मामला आया है जिसपर भड़ास निकालने के लिए शब्दबाण का सार्वजनिक इस्तेमाल सीधे भड़ास ब्लाग पर किया गया। जबकि डा. रूपेश को आप ही समझा चुके हैं कि ङम किस हद तक आग उगलें। जनसत्ता में रहते हुए रिस्क लेकर इस मुद्दे पर भड़ास इस लिए निकाल रहा हूं क्यों मुझे लगता है कि फिर से भड़ास किसी व्यर्थ के बहस में न उलझ जाए। हमारे कहने, बोलने, लिखने को मान्यता हासिल रहे इसके लिए जरूरी है कि कुछ मानदंडों के दायरे में भड़ास को रखा जाए। मंच को सार्वजनिक आपने बनाया है और उसी अधिकार से भड़ासी होने के नाते आपसे यह उम्मीद है कि भड़ास को सिर्फ अपनी अमर्यादित खीझ उतारने का मंच बनने से आप रोकेंगे।
नहीं भूलना चाहिए कि हम बुद्धिजीवी हैं और बुद्धिजीवी के नाराज होने का तरीका भी ऐसा होना चाहिए कि उससे भी लोगों को सीख मिले। कुछ अधिक मुखर हो जाने के लिए भड़ासी भाइयों से क्षमा चाहूंगा मगर कामना यही है कि भड़ास एक मर्यादित मंच बना रहे। कोई नहीं छापकर आपको विचलित नहीं कर सकता। इस आग को सीने में दबाके रखिए , इसके पीछे हमारा कारवां भी है।

जय भड़ास
डा.मान्धाता सिंह

4 comments:

विनीत कुमार said...

डा.मान्धाता सिंहजी,आप ये मानकर क्यों चल रहे हैं कि मेरी भड़ास न छपने के कारण है। आप खुद सोचिए, पहली बार में ही दो पेज जो फैक्स किया गया, वो साफ था, पढ़ने लायक, तीसरे पेज में मेरा पता और अंतिम के कुछ वाक्य। इन दो पेज को पढ़कर ही समझा जा सकता था कि इसे छापा जाए या नहीं। तो फिर दो-दो बार फैक्स करवाने और कूरियर करने की सलाह क्यों दी गई। अच्छा आप खुद बताइए,किसी अखबार से ये सुनने को मिले कि आप अकेले लिखकर क्या कर लेंगे तो सुनना अच्छा लगेगा। ये तो बड़ा ही निगेटिव एप्रोच हुआ न। हमें कहा गया कि आप सात-आठ लोगों को जुटाइए और नामवर सिंह के खिलाफ मोर्चा खोलिए और हम भी आपका साथ देगें। ये सब कहकर बरगलाने की क्या जरुरत थी। पूरे प्रकरण में मुझे बुरा इस बात का लगा कि त्रिपाठीजी हमसे ऐसे बात कर रहे थे जैसे मैं कोई बच्चा हूं। भाई हमें जो समझ में आया लिखा। क्या उनको ऐसा कहना शोभा देता है कि आप अकेले क्या कर लेंगे। अगर पलटकर मैं कहूं कि जो लोग छप रहे हैं वे क्या कर ले रहे हैं तब तो अखबार निकालने और पढ़ने की प्रासंगिकता पर ही सवाल खड़े हो जाएंगे। पाठक की हैसियत से मैंने लिखा और मेरा ये अधिकार बनता था कि मैं उसके बारे में इन्क्वायरी लूं और बड़े ही सुलझे तरीके से सबकुछ जानना चाहा, लेकिन आपके पास दो मिनट बात करने के लिए समय नहीं है और फोन रख दिया और मना कर दिया। इतने पैसे खर्च होने और झेल जाने पर कोई भी झल्ला जाएगा, आपने मेरा अपमान ही तो किया न। मैंने कहीं नहीं कहा कि आप मुझे छापे ही। मैं तो जनसत्ता में स्वस्थ तरीके से, बिना किसी लाग-लपेट के लिखने की शुरुआत करना चाह रहा था।
रही बात कंटेट को लेकर मना करने की, इस पर तो मुझे कोई आपत्ति ही नहीं है कि अस्वीकृत हो गयी। आप समझिए कि जनसत्ता ही एक ऐसी अखबार है जिससे हिन्दी के लोग, फिलहाल मैं रीडर या ग्राहक के स्तर पर नहीं जुड़ता है, भावनात्मक स्तर पर एक शुभचिंतक के रुप में जुड़ता है। जनसत्ता भी इस चीज को बखूबी समझता है।
इस स्तर पर तो जनसत्ता से जुड़े लोगों को पाठक और उसकी प्रतिक्रिया की कद्र करनी ही चाहिए। इसे मैं एक तरह का सप्रेशन मानता हूं और अखबार को इसका अधिकार नहीं है। फिर ब्लॉग पर न लिखता तो जाता कहां। यकीन मानिए बहुत जरुरी है अखबार की कार्यशैली पर फिर से विचार करने की। हम लिखनेवाले भी मौज में आकर नहीं लिख देते। जो बात बड़ी शिद्दत से महसूसहोती है उसी पर लिखते हैं। अखबार में नाम वाली चाहत से बहुत पहले ही उपर उठ चुके।

डा०रूपेश श्रीवास्तव said...

अरे,ई का होइ रहा है भईयऊ ? दुइनो पहलवान तो अगर आमने-सामने होते तो पटका-पटकी कर लेते । "दुबारा भड़ास शुरू करने पर कहा था कि हम अपने ही तंत्र या व्यवस्था पर टिप्पणी करने से परहेज रखेंगे" ,काहे भाई ? अइसन उत्तर तो कौनो घाघ पल्टीसियन ही दै सकत है कि बाबू हम आपन गलती ना तो देखब ना ही सुधारब ।
डा०सिंह हम तो अगिया बैताल हैं तो आग ही उगलेंगे अब हमारे ऊपर किसी मजबूरी का रेगुलेटर तो लगा नहीं है कि हम कितनी आग निकालें कि आप कहें कि भाई जरा कम आग निकालो चाय बनानी है या थोड़ी सी बढ़ा दो मकई का भुट्टा भूनना है ,प्रभुजी हमारे लिये तो हर आयाम में व्याप्त बुराईयां ही ईंधन का काम करती हैं जितना ज्यादा पेट्रोल उतनी ज्यादा आग.......जिस दिन ईंधन खत्म उस दिन आग खत्म । और मानदंड का मतलब ये तो नही है आपकी नजरों में कि साले,कीड़े(चलो इस असभ्य भाषा के लिये अंग्रेजी वाला "सौरी") कहीं के ! मान नहीं तो दंड भुगत । यार आप दोनो भाइयों से प्रार्थना है कि ये हु तु तू व्यक्तिगत रखो वरना लोग कल से अपनी सास और बीबी की बुराई भी भड़ास पर ही निकालेंगे...........
जय भड़ास

आशीष महर्षि said...

विनीत बाबू जनसत्‍ता नामवर सिंह के खिलाफ कैसे छाप सकता है, समझा करें

डा.मान्धाता सिंह said...

भाई विनीत जी कुछ उग्र हो जाने के लिए क्षमा चाहूंगा। मेरी प्रतिक्रिया इस बात के लिए ज्यादा थी कि जनसत्ता नाम सुनकर लोग हंस देते हैं। बाकी जवाब मेरी तरफ से आशीषजी ने इसी लेख की टिप्पणी में दे दिया है। अब रूपेशजी से मुखातिब हूं। हम लड़ नहीं रह रहे हैं बल्कि अपनी गलतफहमियां दूर करने की कोशिश कर रहे हैं। आपका नजरिया अब भी सही है क्यों कि इसी हालात पर यशवंतजी को इसी अंदाज में आपने जवाब दिया था। मेंने यशवंतजी से पूछा था कि आप भड़ास को किस मानदंड पर खरा उतरते देखना चाहते हैं ? बहरहाल अपनी बिरादरी के साथ ही हूं मैं। बहस बंद। जय भड़ास ।
डा. मान्धाता सिंह
कोलकाता