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18.1.08

जल में रहकर मगर से बैर?

इन दिनों भड़ास पर ढेर सारी ऐसी पोस्ट आ रही हैं, जिसमें खुलेआम मीडिया हाउसों का नाम लेकर उनकी कमियों को गिनाया दिखाया जा रहा है। मैं खुद संशय में हूं कि क्या इस तरह की पोस्ट भड़ास पर आनी चाहिए? दरअसल, भड़ास हिंदी मीडियाकर्मियों का सबसे बड़ा और सबसे मशहूर मंच है। सभी हिंदी मीडियाकर्मी किसी न किसी मीडिया हाउस की मैग्जीन, अखबार, टैबलायड या चैनल में काम कर रहे हैं। ऐसे में क्या यह उचित होगा कि हम उन मीडिया हाउसों को सीधे टारगेट बनायें? अगर कोई बेहद बड़ी बात हो तो समझ में भी आता है लेकिन अगर किसी अखबार में डेटलाइन गलत छप जाए, प्रिंटलाइन गलत प्रकाशित हो जाये, फोटो कैप्शन कुछ और व फोटो कुछ और छप जाए, खबर रिपीट हो जाए, झूठी खबर चल जाए....तो इन सबको मुद्दा बनाना चाहिए?

मुझे कोई दिक्कत नहीं है। पर मैं अपने हिंदी मीडियाकर्मी साथियों के लिए दिक्कत नहीं पैदा करना चाहता। जितने भी मीडिया घराने हैं, उनसे संबद्ध पत्रकार भड़ास से जुड़े हुए हैं। कल को कोई खास मीडिया घराना अपने पत्रकारों पर इस बात के लिए परेशान करने लगे कि वो भड़ास से जुड़े हुए हैं और भड़ास में उस मीडिया हाउस की कमियां उजागर की जाती हैं, तो दिक्कत उन पत्रकार बंधु के लिए पैदा हो जायेगी।

दूसरे, जहां तक मेरा एक्सपीरियेंस है, आप अखबार या टीवी में काम करते समय लाख सावधानी बरतिये, चूक हो ही जाती है और चूक होना मानवीय स्वभाव का हिस्सा है। अगर आप मनुष्य हैं और काम कर रहे हैं तो सौ में एक फीसदी गलती रह ही जाती है। इसलिए इन कमियों को बड़ा मुद्दा बनाया जाना उस संबंधित मीडियाकर्मी के कैरियर से खिलवाड़ करने जैसा हो जायेगा।

तीसरे, भड़ास का जो मंच है, वो दूसरों की कमियां उजागर करने की बजाय अपने मन और दिल में झांकने के लिए है। अपने व्यक्तित्व की गांठें खोलने के लिए है। हम दूसरों में तो हजार कमियां निकाल सकते हैं, पर क्या खुद की कमियों को सबके सामने लाने की हिम्मत कर पाते हैं। भड़ास ऐसे ही साहसी लोगों के लिए है जो छोटी मोटी कमियों व दूसरों की गलतियों पर ध्यान देने की बजाय अपनी सच्चाई, कुंठा, अनुभव, संस्मरण, कविता, कहानी, विश्लेषण को सबके सामने लाते हैं।

तो बंधुओं, जल में रहकर मगर से बैर करने की आदत न डालिये। भड़ास को दूसरों की छोटी-मोटी गलतियों को उजागर करने का मंच न बनाइए। यह भड़ास है और भड़ास निकालिये। भड़ास से क्रांति की भी अपेक्षा न करिये। अगर हम बाजार के इस दौर में बाजार की शर्तों के साथ जी खा रह हैं तो हम आमूल-चूल बदलाव नहीं कर सकते, यह तय मानिए। हां, हम संगठित रहकर अपने अनुकूल माहौल बना सकते हैं। अपनी बात हर जगह पहुंचा सकते हैं।

मैं इस मुद्दे पर अभी साफ साफ तय नहीं कर पाया हूं। आप लोग अपने विचार दें तो बहस थोड़ी आगे बढ़े।

जय भड़ास
यशवंत सिंह

3 comments:

Anonymous said...

यशवन्त जी आप ने सही सोचा इन्सान गलतीया करता रहता हे! ओर इस का यह भी मतलब नही की किसी की थोडी सी गलती को बडाचडा कर उस को नीचा दिखाया जाये! एसा कोई भी मोका ना दे की कोई भी एरागेरा भडास मच पर उगली करे ओर कहे
की अपनी टीरपी के लिये भडास एसा लिखता हे

Dr.Rupesh Shrivastava said...

दादा,मैं हठधर्मी कदापि नहीं हूं किन्तु सच तो यह है कि पत्रकारिता पूंजीवाद के प्रभाव में जिस प्रकार सकपकायी सी दिखती है क्या आप उसे नकार सकते हैं ? जब २३ अगस्त १९२३ को पहली बार मेरे एक पत्रकार पूर्वज स्व.मुंशी नवजादिक लाल श्रीवास्तव ,सूर्यकान्त त्रिपाठी "निराला",बाबू शिवपूजन सहाय और प्रेस मालिक महादेव प्रसाद जी ने एक पत्र निकाला जिसका नाम "मतवाला" था तब भी यही परिस्थितियां थीं इसीलिये मुंशी जी ’भूतनाथ तेल’ की कंपनी मे मैनेजरी करते थे ,वे जानते थे कि कब खाने के लाले पड़ जायेंगे नहीं पता । आपकी तबियत कुछ नरम है क्या जो ऐसा लिख रहे हैं ,ऐसा मत करिये वरना भड़ास का नाम फटास हो जाएगा। जिसमें दम होगा वह जुड़ेगा वरना निकल लेगा और क्रांति क्यों न होगी ? जो अपनी कमियां नहीं देख सकते उनकी भड़ास तो भौं-भौं ही होगी ।

laa, hamau aa gaylee... said...

yashwant sir, jai badhaas. main aapse sahmat hoon.akhbaar to galtiyoun ka saahitya hi kaha jata hai, aur galti to insaan se hi hoti hai. jo koi mahanubhav ne bhadhaas per galti bataakar galti ki hai kya unke sansthaan me galti nahi hoti. mera anurodh hai bhadhaas per sirf bhadaas nikale galti nahi.