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21.2.08

आखिरकार कोलकाता की सांस्कृतिक वर्चस्व तिकड़ी के भारत विजय का सपना कामयाब होते दिख रहा है।

भड़ासी भाइयों साहित्य अकादमी की मारने के लिए एक ऐसे साहित्यकार को ठेका दिया गया है जो सबसे मुखर हिंदी विरोधी रहा है। एक समय इसने बाकायदा एलान किया था कि हिंदी बोलने वालों को खदेड़ दिया जाना चाहिए। राज ठाकरे या सुनीलगंगोपाध्याय जैसे साम्प्रदायिक मानसिकता वाले लोगों को यह तरजीह क्यों दी जा रही है? यह सवाल बड़ा है। मेरे मित्र पलाश विश्वास ने इन्हीं सवालों को उठाते हुए अपने विचार मुझे मेल किए हैं। जो मैं ज्यों का त्यों आपको परोस रहा हूं। इसे विस्तार से http://nandigramunited.blogspot.com/ पर भी पढ़ सकते हैं।
फिलहाल यहां पढ़ें---------
आपका भड़ासी भाई--डा. मान्धाता सिंह


• आखिरकार कोलकाता की सांस्कृतिक वर्चस्व तिकड़ी के भारत विजय का सपना कामयाब होते दिख रहा है।
बंगाली ब्रह्मण मार्क्सवादी राष्ट्रीटता के शीर्ष आइकन सुनील गंगोपाध्याय अब साहित्य अकादमी के अध्यक्ष बन गये हैं।

आखिरकार कोलकाता की सांस्कृतिक वर्चस्व तिकड़ी के भारत विजय का सपना कामयाब होते दिख रहा है। सुनील गंगोपाध्याय अब साहित्य अकादमी के अध्यक्ष बन गये हैं। बैसे भी बंगाली ब्रह्मण मार्क्सवादी राष्ट्रीटता के शीर्ष आइकन हैं सुनील। पिछली दफा महाश्वेता देवी को पटखनी देकर संघ परिवार के उम्मीदवार गोपीचंद नारंग को जिताने में उन्होंने गुलजार, कमलेश्वर, गिरिराज किशोर जैसों के साथ गठजोड़ किया था। एवज में वे अकादमी के उपाध्यक्ष बन गये। तबसे योजनाबद्ध ढंग से नारंग को पलीता लगाते हुए वे अपने हक में समीकरण साधते रहे। नारंग खद गद छोड़ने के मूड में कतई नहीं थे। पर वे उखड़ने की हालत में आ गये तो मजबूरन उन्होंने गांगुली को आगे कर दिया। मुकाबले में थे वासुदेवन नायर। जिन्होंने पिछली दफा महाश्वेता दी के हक में नाम वापस ले लिया था। उनके चुनाव संचालक बने के सच्चिदानंदन। पर महाश्वेता खेमा नारंग को रोकने के बाद गांगुली को नायर पर तरजीह दी। आखिर सुनीति कुमार चट्टोपाध्याय के बाद सुनील साहित्य अकादमी पर काबिज दूसरे महारथी है। यह करिश्मा तो सांसद और प्रबल कांग्रेसी, नेहरु के प्रिय ताराशंकर बंदोपाध्याय तक नहीं कर पाए। महाश्वेता दी बांग्ला ब्राह्मण राष्ट्रीयता के अश्वमेध घोड़े का लगाम थामकर कैसे युद्धघोषणा करते। उनके सिपाहसलार राजेंद्र यादव, केदारनाथ सिंह, कमलाप्रसाद, कृपाशंकर चौबे और दूसरे तमाम रथी महारथी देखते रह गये। सुनील की योजना पूरी हो गयी।

कोलकाता पुस्तक मेले को मैदान लौटाने की मुहिम छेड़कर बंगाल में सत्तारूढ़ मार्क्सवादी मरीचझांपी नंदीग्राम नरसंहारों का पाप धोने की पहल करने के फिराक में सुनील को पहले ही मैदान में उतार चुकी है। नंदीग्राम सिंगुर हरिपुर परमाणु परियोजना रीटेल चेन राशन विद्रोह चाय बागानों में मृत्यु जुलूस आदि मुद्दो पर खामोश सुनील, सौमित्र चटर्जी, सुबोध सरकार मल्लिका सेनगुप्त वगैरह हाईकोर्ट के रोक के बावजूद बुद्धदेव और मेयर विकास रंजनन के साथ कोलकाता की बागी सिविल सोसाइटी को बंगसंस्कृति की दुहाई देकर सत्तापक्ष मे लामबंद करने में जुट गये। प्रकाशन और पुस्तकों पर एकाधिकार बनाए रखने की कोशिश में आनंदबाजार प्रकाशन सरकारी मुहिम के खिलाफ बतर्ज डब्लू डब्लू एफ सक्रियहो गया अपने तेरह लाखी अखबार और स्टार आनंद के जरिये तो ऐसा विभ्रम फैला जैसे की बांग्ला भाषा और राष्रीयता के जीवन मरण का संकट खड़ा हो गया हो। नवनीता देव सेन आहिस्ते से मुख्यमंत्री के बगल में बैठ गयी।

तसलिमा नसरीन के निर्वासन की पृष्ठभूमि में द्विखंडित पर प्रतिबंध का प्रकरण आता है। उस वक्त सुनील और उनके साथी प्रतिबंध की वकालत कर रहे थे। सुनील बांग्ला न बोलनेवालों के खिलाफ भाषा पुलिस बनाने की पेश कश करते रहे हैं। हिंदीभाषियों को चुटिया पकड़कर बंगाल बाहर करने की बी हुंकार उन्होंने भरी थी। तसलिमा साहित्य को प्रतिबंधित करने की मांग करने वाले सुनील ही बाकायदा देश पत्रिका के संपादक की हैसियत से आनंद पुरस्कार दिलवाकर तसलिमा को आइकन बनाने में सबसे आगे थे। पर आनंद प्रकाशन से नाता तोड़ लेने वाली तसलिमा को सबक सिखाने में सबसे आगे थे सुनील। मजे की बात तो .ह है कि तसलिमा पर मुसलमानों की भावनाओं को छेस पहुंचाने का आरोप लगाने वाले सुनील ने सरस्वती की प्तिमा के व७वृतांत के साथ चुंबन प्रकरण को अपनी आत्मकथा का आकर्षण बनाने में कोई हिचक नहीं दिखायी। मां काली को संधाल मागी और दलितो को अस्पृश्य लिखना तो उनकी कृतियों का वैशिष्ट्य हैं ही।

हमारे हिन्दी समाज के दि्ग्गज सख्त नाराज हुआ करते थे कभी सुनील से। पर उनकी औकात क्या कि माकपाई यवस्था और बंगाली ब्राह्मणवादी ववर्चस्व के विरुद्ध आवाज बुलन्द करें। माड़वाड़ी समाज ने दशकों से कोलकाता में अपना स्वतंत्र वजूद बनाया हुआ है। अस्पताल, मंदिर, शिक्षा प्रतिष्ठान सार्वजनिक सेवाओं में पूरी आत्मनिर्भरता के साथ। बाकी हिन्दी समाज यहां हमेशा दोयम दर्जे का है। साहित्यकार भी हिंदी के प्रतिष्ठित हैं तो मारवाड़ी। प्रभा खेतान, प्रतिभा अग्रवाल, अलका सरावगी, मधु कांकरिया, गीतेश शर्मा। पर मारवाड़ी समाज की यह किलबंदी अब बिखर गयी है। कोलकाता के अजर्थ व्यवस्था और व्यवसाय में अपनी पकड़ बनाये रखने के लिए सत्तारूढ़ दल व मोर्चे से गठबंधन की मजबूरी। माकपाई औद्यौगीकरण, शहरीकरण, निजीकरण, विनिवेश, थोक कारोबार और विदेशी पूंजीनिवेश की बहती गंगा में हाथ धोने के फेर में माड़वाड़ी समाज का पारम्पारिक ताना बाना भी बिखर गया है। मारवाड़ी समर्थन से कोलकाता पश्चिम जैसे लोकसभा सीट समेत पूरे कोलकाता को ममता बनर्जी के प्रभाव क्षेत्र से बेदखल करके वाममोर्चा ने ग्रामीण विकास, भूमि सुधार और मार्क्सवादी विचारधारा को तिलांजलि देकर मूलनिवासयों के चौतरफा सर्वनाश के लिए नंदी ग्राम सिंगुर जैसे कार्यक्रमो को अंजाम देने लगा है। अब सारी सेवाएं कारपोरेटों के हवाले। बुद्ददेव कीसिंजर जोड़ी है। सलेम टाटा जिंदल अंबानी की बहारें हैं। ऐसे मे टूटपूंजिएं मारवाड़ियों की क्या बिसात? बड़ा बाजार में एक के बाद एक अग्निकांड के जरिए मारवाड़ियों को बंगाल की अर्थ व्यवस्था और समाज से बेदखल किया जाने लगा है। तो दूसरी ओर, जूट उद्योग, कपड़ा कारोबार और चायबागानों को श्मशान में तब्दील करके बाकायदा हिंदी भाषियों के पेट का टने मे लगे हैं वामपंथी। कोयला खानों में वैध अवैध खनन में मारे जाते हैं हिंदी भाषी।करीब ५६ हजार कल कारखानों को बंद करके हिंदी भाषी मजूरों को भुखमरी की कगार पर पहुंचा दिया गया है। भिखारी पासवान का अता पता नहीं चला। पर हिंदी साहित्यकार माकपाई समर्थन में प्रेमचंद तक को शहरीकरण और औद्योीकरण के प्रवक्ता बतौर पेश करने से बाज नहीं आये। नंदीग्राम सिंगुर के खिलाफ बाकी देश में हिंदीभाषी मुखर ैं, पर बंगाल में कोई नहीं बोलता। बहुत लिखने बोलने वाली प्रभा खेतान अलका सरावगी तक खामोश। सभी हिंदी साहित्यकार जलेस प्रलेस के जरिए माकपा के हक में गिरोहबंद। सड़क पर उतरी सिविल सोसाइटी में एक अकेले अशोक सेसरिया के अलावा कोई उल्लेखनीय चेहरा नहीं दिखा।

यह तो है हिंदी समाज कोलकाता का। सुनील की मुहिम का क्या खाकर विरोध करता? महाश्वेता देवी जब साहित्य अकादमी के चुनाव मे खड़ी हो गयी तो कोलका ता पुस्तक मेले में वाणी प्रकाशन में सारे हिंदी लिक्खाड़ जमा हो गये। सुनील गंगोपाध्याय ने ऐलान किया कि उनके बारे में अफवाहें उड़ायी जाती रही हैं और वे हिंदीभाषियों के खिलाफ कतई नहीं हैं। सब धन्य धन्य हो गये।

इसी पुस्तक मेले में एक प्रवासी अमेरिकी बंगालियों के प्त्रिका विमोचन समारोह में बाकायदा मंच पर जाकर मैंने सुनील से सवाल किया कि क्या वे महाश्वेता दी को समर्थन देंगे? कृपा शंकर चौबे भी इस मौके पर हाजिर थे। सुनील ने कोई जवाब नहीं दिये। दि्ल्ली में हमारे मित्र गण सुनील की गतिविधियों पर नजर रखे हुए थे। हमें सारी खबर मिल रही थी। पर संदीपन को साहित्य अकाममी दिलवाने में मदद करने वाले शंखो घोष और महाश्वेता देवी को सुनील पर पूरा यकीन था। मैंने दीदी को जब वाकया बताया तो वे भरोसे के सा बोली सुनील, प्रतिभा राय और इंदिरा गोस्वामी हमारे साथ हैं। इतिहास गवाह है कि तीनों ने विश्वासघात किया। तब मैं भााबंधन के संपादकीय में था। पर नवारुण दा वहां भी देशवालों को छापने लगे। मूलनिवासियों और शरणार्थियों की समस्या से दीदी ने पल्ला झाड़ लिया।

कल अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस है। सुनील की भाषा शहीद स्मारक समिति हिंदी वर्चस्व के खिलाफ बोलियों के हक हकूक क लेकर माकपा और वाममोर्चा की पूरी ताकत के साथ राज्यभर में कार्यक्रम और मुहिम चलायेगी।

नंदीग्राम और सिंगुर मामले में जिन दो टीवी चैनलों तारा टीवी और कोलकाता टीवी को सच का पर्दाफाश करने का स्रेय जाता है, वे भी आज सुनील गंगोपाध्याय की उपलब्धियों का बयान करने से नहीं अघा रही थी। पुस्तक मेले को लेकर जिस आनंद बाजार प्रकाशन से सुनील का युद्ध आज भी जारी है, वह भी सुनील की एस जीत का जश्न मना रहा है। माकपाई चैनलों और अखबारों का क्या कहें। हिंदी और अंग्रेजी के पत्रकार, संपादक तो अलिमुद्दीन स्ट्टीट की इजाजत के बगैर पादते भी नहीं।
जय हो सुनील महाराज की।

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बंगला के प्रख्यात साहित्यकार सुनील गंगोपाध्याय को बुधवार को साहित्य अकादमी का अध्यक्ष चुन लिया गया जबकि पंजाबी के साहित्यकार एस एस नूर निर्विरोध उपाध्यक्ष चुने गए। साहित्य अकादमी के यहाँ हुए चुनाव में गंगोपाध्याय को 45 मत मिले, जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वन्द्वी एवं निवर्तमान अध्यक्ष वासुदेवन नायर को 40 मत मिले। एक अन्य प्रत्याशी सत्यदेव शास्त्री को मात्र सात वोट मिले।
जनरल कौंसिल की एक घंटे से अधिक समय तक चली बैठक में नए अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव किया गया। अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का कार्यकाल अगले पांच साल के लिए होगा यानि ये दोनों 2012 तक अपने पद पर रहेंगे। सुनील गंगोपाध्याय वर्तमान अध्यक्ष गोपीचंद नारंग का स्थान लेंगे और अभी तक उपाध्यक्ष रहे सुनील गंगोपाध्याय का स्थान एस एस नूर लेंगे। पंजाबी के साहित्यकार एस एस नूर के विरोध में बंगला साहित्यकार इंद्रनाथ चौधरी का नाम था, लेकिन अंतिम समय में उनके नाम वापस ले लेने के कारण नूर को निर्विरोध उपाध्यक्ष चुन लिया गया। गौरतलब है कि साहित्य अकादमी के पहले अध्यक्ष पद को पं. जवाहर लाल नेहरू और उपाध्यक्ष पद को डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने सुशोभित किया था।

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प्रभाष जोशी ने जनसत्ता मे अच्छा सवाल उठाया कि आखिर वाम के राज मे यह नौबत क्यों आयी कि नंदीग्राम के किसान-मजदूर जब केमिकल हब के लिए प्रस्तावित ज़मीन अधिग्रहण का विरोध करने निकले तो डेढ़ हजार माकपा कैडर उस इलाके से भागने को मजबूर हो गए? कांग्रेस या भाजपा शासित किसी प्रदेश मे तो ऐसा नही होता कि किसी प्रस्तावित परियोजना से उजड़ने वालों का विरोध सत्ताधारी दल के कार्यकर्ताओं को उस इलाके से बेदखल ही कर दे? जवाब माकपा कैडर के उन तौर-तरीकों मे है जो वे पूरे पश्चिम बंगाल मे अपना दबदबा बनाए रखने के लिए अपनाते रहे हैं. किसी भी नाम पर आप लोकतांत्रिक विरोध की गुंजाइश ख़त्म करेंगे तो नतीजा वही होगा हिंसात्मक विरोध मे इजाफा.

बहरहाल, नंदीग्राम मुद्दे पर संसदीय बहस ने आम लोगों को जैसे चौराहे पर ला खडा किया है. लेफ्ट फ्रंट की सरकार मे शामिल अन्य दलों ने माकपा को दोषी बताते हुए अपना हाथ झाड़ लिया है, हालांकि सरकार मे वे आज भी शामिल हैं. शायद सामूहिक जिम्मेदारी का सिद्धांत वाम दलों की सरकार पर लागू नही होता. वाम मोर्चे से बाहर माकपा की सबसे तीखी आलोचना भाजपा के नेता कर रहे हैं. मगर न केवल वाम नेता बल्कि कांग्रेस का भी यही मत है की उन्हें आलोचना करने का हक़ नही क्योंकि उनके गुजरात मे गोधरा के बाद जो कुछ हुआ था वह सारी दुनिया देख चुकी है. बात सही है.


--पलाश विश्वास

3 comments:

गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' said...

yahee to ho rahaa hai
koi hindi ka dushman to koi rachnaa chor

डा०रूपेश श्रीवास्तव said...

डॉक्टर साहब, सबसे तो कवि विजेन्द्र अनिल को आदरांजलि जो हम सबके बीच अपनी भोजपुरी कविताओं के द्वारा हमेशा जीवित रहेंगे । दूसरी बात कि सुनील बाबू जो भी कर रहे हैं वह तो मात्र पदलिप्सा की राजनीति का हिस्सा है उसे साहित्य से जोड़ना ही नहीं चाहिए । आपको याद होगा कि हिन्दी का पहला अख़बार कोलकाता से ही निकला था और हिन्दी पत्रकारिता वहां ही फली-फूली है ,ये लोग जस्टिस शारदाचरण की आत्मा को दुःख ही पहुंचा रहे हैं जिन्होंने हिन्दी के लिए एक लिपि विस्तार परिषद की स्थापना करी थी ताकि देवनागरी से देश जोड़ा जा सके और ये लोग उसी को विवाद का मुद्दा बना कर अपने स्वार्थ साधते हैं । सुन्दर लेख है, जगाए रहिए ,साधुवाद स्वीकारिए
जय भड़ास

हरे प्रकाश उपाध्याय said...

bahut achchha lekh hai, dr. sab kee tippni bhi sahi hai