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3.2.08

कमाल तुम्हें यकीन है।

सुर्ख सुर्ख भूख है,स्याह स्याह जिंदगी,
आजा़द हो चुका मुल्क,कमाल तुम्हें यकीन है।
उम्मीद औ खेत सूख चुके,पानी सिर्फ आँखों मैं है,
बदलेगी फिजा़ गरीब की,कमाल तुम्हें यकीन है।
खानें को रोटी नहीं,रहनें को कोई घर नहीं,
नींद अच्छी आयेगी,कमाल तुम्हें यकीन है।
भूख की बज्म़ में मौत की शमाँ जल रही,
रोशन फिर भी हालात है,कमाल तुम्हें यकीन है।
मुल्क चमन बन चुका,पर फूल सारे झड चुके
खिजा़ खुशनुमाँ सी है,,कमाल तुम्हें यकीन है।
नौजवाँ बेकार हैं,तंगहाली त्यौहार है,
खुश हर शख्स यहाँ, कमाल तुम्हें यकीन है।
फुटपाथों को देख लो,भारत वहीं पल रहा,
घर में तेरे छत नहीं, कमाल तुम्हें यकीन है।

1 comment:

डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...

अनुराग भाई, सोच को थोड़ा सा रचनात्मकता की ओर मोड़िए ताकि मर्सिआ गाने से अलग कुछ हो सके......
जय भड़ास