Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

23.2.08

लीजिए आपके पवित्र पाँव पकड़ लिए हम : लेकिन एक शर्त है...

''इ होरी के टेम में सच्ची गोरी किया रे ..दबार-दबार के मारा ,पछाड़-पछाड़ के किया...बुरी तरह किया रे'''चुप..बुरबक ...इ भोरे-भोर भचभच ..भच भच ...हौन्क्नी मैगते हाएंफ रहलें हैं....ओने दे रह लाऊ है ..खड़े-खड़ेनई lछौ रे पतित...निर्लज्जा॥''

मोर्निंग टेम ..फेरेश टेम..बेड टी ...डेली वाकिंग ...मोर्निंग वाकिंग....अपुन भीडू लोग दौरींग बोलता ..गांड फारिंग रनिंगकहता इस क्रिया को... वो गार्डेन में...अप्पन बालू पर....फस कल्लास ..मूड चक दे इंडिया.....बाथ..सिन्थोल...भीडू लोग..कैरकी माएट..... सब फेरेश..हम फेरेश...वो फेरेश...तू ..फेरेश...पंछी फेरेश.....सब फेरेश.... फेरेश.... फेरेश ......जब इ सब ...इत्ता फेरेश ...त मोर्निंग टेम में किससे मरवा के आ रिया है ...जो गरिआए जा रहा है मेरे को.....?

पत्ता चल्ला..वो अपना वेल विषर है...इंटरनेट पर किसी ने गांड में उंगली कर दी होगी...सो इधर भुत नाथ से हुडीआहीलेने आ पहुंचा है..तो सोचा चलें आते हैं हम भी ..सो..बस...ही..ही..ही आ गए...धाम पर...

तुम चट्टानों से कितनी बार बोलूं..कैसे बोलूं..क्यों बोलूं...और कहाँ बोलूं...कब तक बोलूं...तुम अवेध किलों के लिए अपन को ध्वनि विस्तारक लाना पडेगा तो सुन तू काएं ..कीच कै कु करता है इतना...अप्पन भडुआ है...इति भडुआ..अति भडुआ..अंत भडुआ..निति भडुआ..नियति भडुआ..वो तो अपना डिक्सनारी.भी आ गया है..दद्दा संस्करण पिछले दिनों....चाल भडुआ..चरित्र भडुआ...तो काहे को होरी के टेम में मोहर्रम मना रिया है बापू लोग॥?

तू सर लोग..काहे को श्राद्ध मना रिया है तू सर्र्र .....गूढ़मोर्निंग सर...गूढ़ मोर्निंग...हाय..नाइस बेबी...फूल टाईट...संग तेरे फूल नाईट...एगेन मोर्निंग ''ब्रेकिंग न्यूज़ '' ''क्यूट बाईट''......अब्बे टाईट ..पंगा लिया तो सुन बे सर जी ,सभ्यता के गुरु जी ....मास्टर साहब....परनाम ...गे रधिया..चाय बनवे...ऐलखुन...hएन मास्सई साहेब...हैं...हैं..टीचर फुल ....बाप दालान पर...मास्टर साहेब ढलान पर .......टयूसन चालू..''हाँ अकबर ने किस धरम को शुरू किया था...राधे....'' स्साले तेरे जैसे लोगों ने नहीं दिया रहने धरम को ड्रम पुन्य को पुन्य ....पाप को पाप....कितने अकबर..बीरबल..टैगोर..दिनकर..कितनों की पुजाई कर चुके हो तुम...तुम्हारी परम्परा... पूजनीय सभ्यता का सील तोड़ कर रख दिए हो तुम लोग...बक चुद्दी करता है...गुरु देव का शान्ति निकेतन....दिनकर की सिमरिया,चकिया...तेरा छोकरा तेरे परम्पराओं की पैदाइश...सभ्यता का टॉप ....छोडा ......मन बमका घुस गया शांति निकेतन...धंक्रा मैगते ....हूइल गया...तमंचा बाएँ और...छोकरी दाहिने...लाभ..तेरा टेरेनिंग...दाग दी ....माँर लिया गांड तेरी सभ्यता की....लगा दी आग शान्ति में...स्साला ...खिछ-खिछ का वाएरस फैला रहा तेरा परम्परा ,तेरा आदर्श.....स्साल्ले...साहित्य ..रे दैया सेवा..धरोहर...गुरुदेव....मंच पर आँख से मूत के दिखाता है साला लोग.....और तेरी पैदाइश उड़ा ले जाती है तेरी धरोहर........''

''जी सर..चाय''..बस चाय...हाय...तू बहोत नाइस .....आई को लभ हो गया तुझ से... मास्टर बोल रहा है.....अब लड़की..टी वी पर तेरा परम्परा टैप पोरोग्राम ...इरिअल..सिरिअल ....सस्पेंस....देख-पढ़ के टंच...ऐस्सा...सर....जी सर आप मुझे अच्छे लगने लगे...आई..आल्सो..लभ यू सर....अब वो मास्टर दिन में तीन बार बल्हों गली का परिकर्मा चालू...सर जी आप इधर...वो अपने मौसी की चाची की बेटी का नाती पी एच डी ......लडकी खिड़की से हुल्लुक-बुल्लुक चालू...''मन मीत आयो रे-मोरा गीत आयो रे''.....बाप आफिस में.....मातारी nayaa hathiyaar khojne पड़ोस में .....बेटी..सर जी मिल के गांड मार रहे हैं...तेरी आदरणीय परम्परा को.....एगेन मोर्निंग ..पेपर आउट ...''गुरु संग शिष्या फरार''......गुरु कौन रे....अन्तरिक्ष का बुत्रुक...........तेरे से पूछता मैं....वो रधिया सुक्कर ग्रह से इधर आईला क्या रे....क्या रिजल्ट दिया तेरी सभ्यता...तेरी संस्कृति....बोडिंग इस्कूल का बकरा तेरा छोकरा एन सेबंटी टू में तेरी सभ्यता...तेरी तहजीब डाउन लोड ....करता है....रात में..दिन में...हगने घड़ी...मूतने घड़ी...गांड मारते रहता है तेरे ट्रेदिसन की चुदाई करता रहता है.....डब्लू डब्लू पिंक वर्ल्ड डॉट कोम.....दूध्वाली डॉट कोम....देवी देवताओं के चित्र एस एम् एस कर के भेजता है ..अपनी पुजारिनो को...इधर भी आया था...पटना में जुली मटुकनाथ ...ये किधर से आया एकाएक टपक कर आ गया भीडू....

बाप...बाप्पा...पप्पा जी...बाबु जी...हेल्लो डैड ....मदर ...सेरोगेट मदर...माँ...मैं...मईयो...'''स्सल्ला...जुआन खस्सी हो गया है..दिन भर रोटी तोड़ता है....कमीना'' बेटा गया धीप....निकाली कुल्हाड़ी..तेरे आदरणीय भोंपू टेरेदिसन को काट डाला...जी नही भरा...मईयो दुआरी पर ''गे..गे..बुधिया पोलोथिन...बीस टका..तेरा पुत्तर''फिफ्टी थौजेंट ..मामा पिलिज...क्वेस्चन ऑफ़ माई रेपुतेसन....मोम?नो मणी...न इधर...न उधर...उधर कुल्हाड़ी.इधर तुम्हारा लंगूर हाथ में पिस्तौल ....दी एक फाएर....खल्लास...स्सल्ला...तेरा फैथ..तेरा बिलिफ...''

इधरaa kar बोलता भडासी लोग...गाली...कोढ़ से भभाकाने वाला दुर्गन्ध.........रे गुडा के घाव.....तनी नाक लगाओ...आओ ....एन्ने आओ....हर घर ..हर दीवार पर नाक रगड़.....देख अपनी सभ्यता संस्कृति के फूलों की डाली पर लगे रंग..विरंगे..रंडी से श्रृंगार किए फूलों के दुर्गन्ध ने कर दिया है नाक बंद....

ये गाली..भीडू लोग,कुकुर मुत्ते की क्रांति कथा है..और इ लोग जैसे हड़प्पा बना रहे हैं... मॉडर्न मोहन्जोदारो ....पितारिया फेरेम से मालदह हिब्ते हैं ....चेयर का गद्दा बोला अपन से तुम भीडू लोगों की कथा .....अपुन कोई कट पीसशो नही कर रिया मैं..तुने जो सभ्यता की डाली पर फूल उगाया है न ....परम्पराओं के उर्वर भूमि में जो फसल लह्लाहाए हैं न.....उनकी करतूतों को सामने लाता मैं.....तेरे अग्गे ताल ठोंक कर तेरी सभ्यता दिखाता हुं तों झांट झाड़क रहा तेरी ...........१९४७ से बक्चुद्दी किए जा रहे हो...आज स्सल्ला ये ब्लॉग इधर आया तों इस पर भी मुंह फाड़े जा रहे हो...जैसे अपुन अंग्रेजी पाद रहा है इधर...तेरे को दिखा रिया है इधर....त आओ न खेलें रंडा-रंडी का खेल....तेरी परम्परा से सिखा है यह खेल...तेरी सभ्यता अप्पन को टयूशन पढाती है ..ऐसे...जैसे बाप चालीस का बेटी बीस की कच गर ...देख भडुए दिखाता हुं तेरे परम्पराओं की लोगों का जलता सच्चा सच.....

हेड लाइन ''मानवता को किया शर्मसार ...बाप ने अपनी बीस बरस की बेटी....धत...सहोदर जोड़...एडिटर बुझता है...के साथ किया बलात्कार...ग़दर..तू ख़ुद देख..थाना जाम..तेरे टाईप के लोगों की दुर्गन्ध....बेटी हाजत में....अप्पन भाई लोग...मसाला.....कैमरा चालू...हाय राम..हाय दैया..दुहार्र...जैसे इधर दे रहा है तू ...भाषा गंदी कर डाली तोड़ ड़ाल गाली की डाली....

कहे का तोडें अपनी गाली की डाली ...तू दिन दहाड़े चौक चौराहे नेढिया लगाते घुर रहा है तों अपन को भीडू बुझता है रे तू...अपन जानता है क्या करने का है अपन अन्सिभिल सोसाइटी को ....इंटरनेट की भाषा में चोदना मत सीखा हम भीडू लोगों को....वर्षों से सीखते पढ़ते आ रहे हैं तेरी परम्परा....तेरी सभ्यता का होम टयूसन करते आ रहे हैं हम....डेस्क टॉप से उतर कर इधर आ........फेरेम पॉइंट फैब माइनस...उतार कर ...नेचुरल लाईट से देख......वो ड्रामा तू इधर भी चालू किए है...विमर्श....बहस तेरा मंथन ....तेरे विमर्श की चुदाई हो रही है जमीन पर.....तू काहे आकाश की सैर कर रिया है....बाप बेटी पर...माये बेटा पर...ससुर पतोहू पर......फागुन छाई रे......फेर तुरंत...हे रे शोभना के बेटी के कुम्हरा के बेटा गांड में उन्ग्री कैल कई रे..........

मेरे को बोत मालूम...डीप पता....भैया गाली नही बन सकता अच्छा रास्ता.....तों बनाओ न तू ही गूड वे ....सिभिलियन रास्ता..जिस पर चढ़ कर हम दोग्लों को सुंघा रहे हो .....माहवारी की चार्ली ....मेरे को भी मालूम डाक्टर साहब की तरह मैंने भी लिया स्वीकार ...नही मिलेगी ..मंजिल मुझे....तुझ से कहीं ज्यादा पता अप्पन को.....लेकिन अपन लोग न तेरे परम्परा के वाइरस को कम कर रहा है...चिकर भोकर कर बता रहा है तेरी सच्चाई...तेरा हकीकत....विमर्श बहस नही खोज रिया है हम भीडू लोग.....हम ए भी जी ,साइमन्तेक,नोर्टन की तरह लड़ रहा तेरे वाइरस से.......

जपते रहो....मंतारिया रहे हो अबिनव प्रयोग करते रहो...नित नविन चोदन विधि इजाद करते रहो......अब हम ..थोरा उगालदान में .....ठुक दान में...बस्बिट्टी में तेरे परम्पराओं की दुर्गन्ध से बचने आए हैं..तों इधर भी आ गया ''जाओ जाओ विद्वानों,अब तुम्हे नही पढेंगे''....तों जाओ न ..पधाओ न...अपने सपूतों को टेरेनिंग दो न....उस टाइम ऊपर निचे का खेल....अब इस टाइम कहो....खेलो डार्लिंग''बाप्पा-बेटी का खेल''

चोदन सिखाते हो,विमर्श का आधार खोजते हो...खोजो न इधर विमर्श ,मंथन का आधार ...बिस्तर पर दो मिनट बीबी लेट...चोट्ती से लेकर हर गाली...एच डब्लू सी डब्लू सहित पुरी भडासी शब्द कोष खाली.....

और इधर फ़िर आते हो गूड मोर्निंग...जी..मोर्निंग..वो थोड़ा वार्शिप ....अगरबत्ती...ॐ..नमो..नमाए....चंदन...साथ में अरवा चावल...एकदम झक्कास...नाश्ता..सूप..बेरेड...हाय डार्लिंग ...लेट मी गो ..कम ओं...बच्चा बाजू में हिब रहा है....देख रहा है तेरे परम्परा का प्राक्तिकल.....तू चिपू चिपू...चिप चिप...ठोर में ठोर ...आहो रामा...आहो दैया...फ़िर बच्चा की वाही पेलाई.......होरी वाली.....''दे दा कडुआ तेल की होरी आई रे भौजी''



जपो मंतर परम्परा का...सभ्यता का...तुने ख़ुद गांड मारी है बेचारे परम्परा की.......मैं तों बस दिखा रहा था तेरे को .....तेरी करतूत और तुझे मिल गया फ़िर गंभीर विमर्श.....मिल गया एक प्रायोजित मंच......अब सब मिल कर फारो मेरा गांड.....कडुआ तेल लगा kar ....उई...स्सल्ला...इ कडुआ तेल का राज खुल ही गया....कोई बात नही ..अभी से मैं रंडी का चूत तू sab मेरा भतार......एओ मोरे राज्जा.... कहानिया सुना जा...वही अपने निर्माण की कहानी....विमर्श और मंथन की पुरानी कहानी......वही परिणाम की कहानी.....तेरा परिणाम...रिजल्ट...संस्कार फास्ट डिभिजन......univarsiti टॉप रिजल्ट...हिस्ट्री क्रिएसन.....फास्ट टाइम इन वर्ल्ड....टाइम्स मेग्जिन....गौतम अपना बेतवा.....खा गया बाढ़ पीड़ित का हक़....गिल गया..तेरी परम्परा......रंजित दोन...पन्द्रह लाख में मैं बाप बेटी दामाद समेत सब डाक्टर.....फेमस ....रेपुतेसन....मोर्निंग सर...वेरी नाइस मोर्निंग बेबी.....तेरा परम्परा का उपज डाक्टर अमित...गांड में आला खोंस कर फुल केयर...मेडिकल साइंस.....अपने चेयर के पीछे गांधी बब्बा लगा कर...किडनी निकल ली तेरी .....तों पधाओ न बुतारुक को पैसा बनाओ ..गांड मराओ....किडनी बेचो...सॉलिड मुनाफे का धंधा....अपना लौरा ..जिधर मन उधर बजरेंगे...तों बाजारों न थोरी इधर....थोरी उधर...

तू एक एक कर सामने आ...बहस कर .....अपुन भडुआ काफी है तेरे को दिखाने,बताने...तेरी सड़ चुकी सभ्यता का सच हम बताएंगे.....लेकिन एक शर्त है मेरी तेरे से....तुम सब रेप्रेजेन्तेतिभ से ...फुल फमिली सोचना.....तेरे को अच्छा लगता है यह सब...क्या दिया तेरे विमर्श ने......तेरे को लगेगा की यह परिणाम....तेरा रिजल्ट गुडी गुडी है तों भडास के इमान की कसम....अप्पन भीडू लोग कभी नही आएगा तेरे परम्परा...तेरी सभ्यता के दालान पर.......

लेकिन अगर नही तों चल मेरे साथ...मैं देता हुं तुम्हे बक्चुद्दी के लिए ठोस...विमर्श भूमि....जहाँ करते रहना अनवरत बक्चुदाई...वैसे बक्चुदाई मेरा धर्म...बक थोथान मेरी क्रिया.......

जय भडास

जय यशवंत

मनीष राज बेगुसराय

3 comments:

डा०रूपेश श्रीवास्तव said...

मनीष भइया,प्यारा लेखन ,ढेर सारा लेखन
लगे रहिए
जय भड़ास
जय यशवंत
जय मनीषराज
जय क ख ग घ
जय च छ ज झ
..........
..........
जय क्ष त्र ज्ञ
जय A B C....Z
पर हर हाल में जय जय भड़ास

डॉ.सुभाष भदौरिया. said...

मनीषजी
इस तरह की भाषा खयाल बोध आलाप प्रलाप वही कर सकते हैं जिनकी अंतर की खुल गयी हों.बधाई.
मैने प्रारम्भ से कहा है कि भड़ासी भाषा,खयाल कबीराना है योगियों की तरह कबीर की उलटवासियों की तरह समझने की सामर्थ्य चाहिए.
पर भाषा विचार की बीमारी के शिकार लोग नहीं समझते.हमारे दोस्त सुल्तान अहमद की पंक्तियां हैं-
रास्ते जब नये बनाओगे.
कुछ तो कांटे ज़रूर पाओगे.
या-
इसी लिये दिखा रहे थे सुअरों को आईना,
कि शूली भी मिली तो चढ़ जायेंगे खुशी के साथ.
आमीन. ड़ा.सुभाष भदौरिया.

हरे प्रकाश उपाध्याय said...

badhiya pelo ho guru...j