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7.2.08

हमार हरामजद्दई माफ़ किए चलैं.....

जय हो प्रभु,मालिक कह कर यशवंत दादा ने एक अजीब सी स्थिति पैदा कर दी है;भाई लोग अपुन कुछ मालिक-बीलिक नईं है और सच तो ये है कि यशवंत दादा भी मालिक नहीं हैं वो तो बस एक ब्लोग के रचयिता हैं बाकी भड़ास तो आप लोगों की खुन्नस ,खीझ और अनियमितता के प्रति उपजी खिसियाहट से सांसे लेती है ,जब कभी हममें से कोई आकर भड़ास पर जम कर किसी सिस्टम की मइयो-बहन कर जाता है तो लगता है कि बी.पी. बढ़ गया है भड़ास का तो फिर ऐसे में दादा को जरूरत पड़ जाती है एक झोलाछाप डाक्टर की तो वो माला हमारे गले आ गयी है । अब बस ये बात हो गयी है कि हमें साफ़-सफ़ाई का अधिकार दे दिया है कि बेटा जरा देखो तो कि कहीं कोई उगालदान में "पौटी" तो नहीं कर गया और अगर कर गया है तो उसे तुम साफ़ करो ,देखो कि किसने कितना वमन करा है ? कहीं एक तो उल्टी करके गले में अटकी चीज से छुटकारा पा जाए लेकिन दूसरा अच्छा भला आदमी उसे देख कर उल्टी करना न शुरू कर दे । हमने पहले ही कहा था कि हम तो ऐसी सोच रखते हैं कि हम अगर उल्टी भी करें तो वो भी किसी के खाने के काम आ जाए । अब मैं यह नहीं कहूंगा कि दादा ने मेरे कंधो पर एक बड़ा भार डाल दिया है जिसे मुझे वहन करने के लिये आपके आशीर्वाद की जरूरत है क्योंकि मैं जानता हूं वह तो मेरे साथ उसी समय से आ गया है जब आपने भड़ास को स्वीकारा । हमारी उगली हुई चीज में उसी चीज का बहुतायत अंश रहता है जो हमने निगला होता है लेकिन जब निगल नहीं पाते तो या तो गले में अटका कर नीलकंठ बन जाते हैं या उगल देते हैं । भड़ासी पैथोलाजी आपकी उल्टी को एनालाईज करके देखती है कि आपने जो उगला है वह क्या है ? कितना है? और क्यों है? कहीं कुछ भीतर तो नहीं रह गया ?तो हम फिर आप को न्योत देते हैं कि कुछ बचा हो तो फिर गले में उंगली डाल कर निकाल दो वरना अगर अन्दर रह गया तो नुक्सान ही करेगा ,पचेगा नहीं । भड़ासियों ने बहुत जहर उगला है लेकिन देखिए कि वह जहर समाज और राष्ट्र की प्रगति के लिए दवा का काम करता है अगर हम उसे सही तरीके से प्रयोग कर पाए तो जैसे नाग का विष भी औषधि के तौर पर काम आ जाता है । हमे उगलते रहना है लगातार ......
मेरे बारे में दादा ने जो लिखा वह सही है कि वे मुझे ज्यादा नहीं जानते लेकिन क्या होगा मेरा नाम , उम्र, वल्दियत या फिर निवास स्थान जान कर मुझे आप सब खूब अच्छी तरह से जानते हैं मेरी कोई मौलिकता नहीं है मैं हूं आपके भीतर के आक्रोश का एक अलग शरीर मात्र बाकी सब वैसा ही है जो आप सबके भीतर कसमसा रहा है ,चटपटा रहा है । इसी कारण मुझे क्या जानना और क्या पहचानना ? लेकिन फिर भी औपचारिकता करनी है तो लीजिए बके देता हूं कि मेरे स्व. पिताजी प्रतापगढ़ (उ.प्र.) के रहने वाले थे और माता जी इलाहाबाद की रहने वाली हैं ,एम.डी.(आयुर्वेद) तक पढ़ा और "आयुर्वेदीय रसौषधियों का परिरक्षण" विषय पर शोध कर पीएच.डी. किया और आगे पोस्ट डाक्टोरल स्टडी करने की इच्छा थी लेकिन अब नहीं है आगे किताबें चाटने की तमन्ना ;(इससे आप उम्र का तो अंदाज लगा ही लेंगे मैं खुद नहीं बताउंगा क्योंकि मै तो वो सांड हूं जो सींग कटा कर बछड़ों में शामिल है ) , अब क्या ऊंचाई और रंग भी बताऊं क्या ? मुंबानगरी में पहले शिक्षा अटकाए थी अब रोटियां नही जाने देतीं तो सोच लिया है कि यहीं त्रिशूल गाड़े रहते हैं जब तक कोई धूनी में आकर पानी न डाल दे । कविताएं लिखने की सनक भी है जो कि तुकबंदी से अधिक कुछ नहीं होती हैं लेकिन आप को सार्थक लगे तो ये बात अलग है ,पेन्टिंग भी करता हूं (यार लोग, वाल-पेन्टिंग के अलावा भी पेन्टिंग होती है ; न समझ में आए तो एम.एफ़.हुसैन की पेन्टिंग देख लेना समझ जाओगे ) । पत्रकारिता मेरे क्रोमोसोम्स में है तो लगे पड़ा हूं दिल्ली के एक अख़बार का नई मुम्बई ब्यूरो चीफ़ हूं । जय श्री राम कहने से मेरे ऊपर भाजपाई होने का लेबल लग गया तो बता दूं कि भाजपाई नहीं बल्कि चारपाई होना पसंद करूंगा जिस पर मरीज स्वास्थ्य लाभ ले सकें और स्वस्थ जन सो कर सपने देख सकें । दर असल मैं मानता हूं कि मैं एक बायोलोजिकल प्रोग्राम हूं जिसका मेरे पिताजी ने स्टार्ट करने का यह पासवर्ड डाल दिया था लेकिन इसे तो मैनेज किया जा सकता है , समाज सेवा नहीं करता बल्कि जो करता हूं "स्वान्तः सुखाय " करता हूं ,आजकल एक बहन अनीता "हिजड़ों का समाज मे स्थान " विषय पर रिसर्च कर रही है तो उसे मदद कर रहा हूं । शादी करने की हिम्मत नहीं हुई अब तो एक्सपायर डेट के हो गये हैं तो लोगों से कह देते है कि कलाम साहब हमारे रोल माडल हैं । बक बक बक बक..........
अब बस एक बात मीरा जी से कि हम पंच परमेश्वर हैं भड़ास पर तो आप ये कैसे मान बैठीं कि पांच लोग होने चाहिए ? अरे ये तो आप यशवंत दादा से पूछ लेना कि उनका मतलब था punch यानि घूंसा छाप परमेश्वर ;बहन ,हम लोग भड़ास के मंच पर हैं मत भूलिये ,ही ही ही........
मेरी परिभाषा के अनुसार भड़ास शब्द कदाचित भद्र+आस से पैदा हुआ है यानि भद्र जन जो आस रखते हैं उसे भड़ास कहा जाना चाहिए इसलिए भड़ासियो की आस को निराश नहीं करना चाहिए ,तो फिर सारे भाई-भौजाई,बहन-बहनोई लोग लगे रहो........

1 comment:

राजीव तनेजा said...

डा०रूपेश श्रीवास्तव जी आपका स्वागत है...