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24.2.08

मसिजीवी को ऐसा लगता है...

((मसिजीवी जी, मैं कभी छुप के वार नही करता और न इस खेल में मेरा यकीं हैं. जिस हिजडे मनीषा ने अपने ब्लॉग लांच की ख़बर भड़ास पे पोस्ट की है, मैं उन्हें नही जानता. जैसे ढेर सारे लोग ब्लॉग मेंबर हैं और मैं उन्हें नही जानता, उसी तरह मनीषा को भी मैं नही जानता. मैं मनीषा से, वो जो भी हैं, जहाँ की भी हैं, अपील करना चाहूँगा की वो अगर वाकई हिजडा हैं और उन्होंने अपना ब्लॉग बनाया है तो वो अपनी पहचान साबित करने के वास्ते प्रमाण पेश करें जिससे मसीजिवी का शक दूर किया जा सके और भड़ास पर लगा संगीन आरोप दूर किया जा सके. ये प्रमाण मोबाइल नम्बर, तस्वीर, निवास का पता आदि हो सकता हैं. जय भड़ास, यशवंत))

मसिजीवी ने ये आरोप भड़ास पे मनीषा हिजडे की पोस्ट पे कमेन्ट के रूप में लिखकर लगाए हैं...
(मूल पोस्ट को आप यहाँ क्लिक करके पढ़ सकते हैं ...."हम हिजड़ों की तो सुनो")


masijeevi has left a new comment on your post "हम हिजड़ों की तो सुनो":

मित्रवर/मित्रगण
भड़ास पर कम टिप्‍पणियॉं करता हूँ इसलिए नहीं कि शुचितावादी हूँ (नारद के शुचिताकाल में ही जब भड़ास बच्‍चा था तब ही इसकी संभावनाओं को इंगित कर पूरी पोस्‍ट लिखी थी) पर कहना होगा कि ये पोस्‍ट बदमजा है- पोस्‍ट के इतिहास से अपरिचय नहीं है, मनीषा की राय भी पढ़ी थी आपकी उससे असहमति हो सकती है इसमें भी कोई दिक्‍कत नहीं है पर असहमति के लिए इस तरीके के इस्‍तेमाल में केवल हिंसा है विचार नहीं है...व्‍यंग्य भी नहीं हे बस मुझे लगता है केवल विद्रूपता है। फिर आप बाकायदा भड़ासी हैं तब क्‍यों मनीषा (जिस भी लैंगिकता के साथ) नई आईडी बनाने की आवश्‍यकता क्‍यों पड़ी। बेनाम होने के अधिकार का हम सम्‍मान करते हैं पर इस तरह अपमानित करने के प्रयास के लिए इसका प्रयोग हो इसके हामी नहीं।

एक सवाल यशवंत से भी, मित्र इस तरह एक नए भड़ासी आईडी को और जोड़ दिया गया..आप दो सौ पचास से इक्‍यावन गिने जाएंगे :)) क्‍या सच की संख्‍या कैसे पता चले ? :))

Posted by masijeevi to भड़ास at 23/2/08 7:26 PM

1 comment:

masijeevi said...

प्रिय यशवंत यदि मेरे कमें से ये लगा कि मैं कह रहा हूँ कि हिज(ड़ा) हाईनेस मनीषा की आईडी आपकी है तो मुझे खेद है। न ही मेरा तर्क है कि इन बेनाम बंधु को सनाम होना पड़ेगा...

पर इतना तय है कि मनीषा की पोस्‍टों के लेखन की प्रतिक्रिया में ये आईडी गढी गई है तथा इसका अनुमोदन मॉडरेटर होने के नाते आपने ही किया होगा (या डा रूपेश ने) और ठीक इसी कारण यह हिंसात्‍मक व विद्रूप है। आशा है आप इस राय सकारात्मक रूप में लेंगे।