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19.3.08

तनि रुकिए,पढिये और जवाव दीजिये

भोर -भोर करीब पाँच बजे तकिया के निचे रखे मोबाइल ने खीजकर जगा दिया ,रात में देर से सोने के कारण जगने का मन नही कर रहा था फ़िर भी टो-टाकर कॉल रिसिभ किया ,उधर से''बे...तू मेरे को चुतिया बुझता है का बे?'' मेरी नींद फुर....इ भोरे भोर ...एकरे कहता है जरल लोग,साला सुबह-सुबह राक्षस भी अपने इष्टदेव का उच्चारण करता है इ मानुष को का गवा है जो चुतिया से शुरू हुआ है आगे कहाँ तक जावेगा तो वो ऐसे शुरू हुए''अभी संजय गांधी जैविक उद्यान में घूम रहे हैं,और तुमको फोन कर रहे हैं,तुम ढेर काबिल मत बनो ,विधायक जी साथे में हैं,तोएं ऐसे नही सुधरेगा कारे,देख तोरा बाप दादा जितना गाय गोरु लोग है न तू उतना फर फर मत कर .. ढेर बाबा मत बन...मारते गोली गर्दा छोरा देंगे तोरा...समझा...इसलिए चुपचाप अपने फैमिली के साथ मौज कर ....और बेसी मनोहरा के कोर्ट कचहरी नही दिखाओ....नही त देख लेना हम सुख्खा धमकी नही दे रहे हैं हम॥''

जी एक अपरिचित आवाज,कुछ जाना पहचाना आवाज ...धमकाने का अंदाज अछा लगा,विधायक जी के साथ होने का दंभ भरते उस शख्स और उसका यह राग मेरे और मेरे जैसे उपेक्षितों से इस कदर जुदा है जिसे चाह कर भी भुला नही पा रहा हुं और अब भडास का साथ मिलने से ऐसा लगता है की कभी भुलाने की कोशिश भी नही करूंगा। महोदय के साथ हुए वार्तालाप के बाद बिस्तर पर बैठ कर विचित्र मनोदशा में न तो पंछिओं के कलरव को कानों ने सूना और न ही सुबह की खूबसूरती आंखों को रिझा पाने में सफल हुई......सामने ओसारे पर बुढे बाबा जीवन के अन्तिम पड़ाव पर खांसते,थूकते,हकमते,हर वक्त हमारी चिंता में तल्लीन डांटते ,डपटते,डरते,थिथकते,खुश होते,छलकते,महकते,सीखते,सिखाते,जीते,बताते उनके लिए कुछ नही कर पाने की टीस,बगल में लत्ता जैसी सारी में लिपटी बूढी दादी को हरिया में घट्टा मिलाते ,सामने पिताजी को लेरु के गोहाल में गोबर उठाते ,माँ को आँगन बुहारते ,बहन को राख से बर्तन मांजते देख ,छोटे भाई को सामने साइकिल पोंछते देख आँख आंसुओं के भार को थम नही सका ...आज की सुबह ने रुला दिया था मुझे...फ़िर भी देह को कसा ,दोनों हथेलिओं से आंखों को मिन्जकर आंसू को सुखाना चाहा,ताकि परिवार वालों को मेरी पीडा का एहसास नही हो सके।

इन अंतर्द्वांदों को को मैंने तब से जिया है जब से आपके समाज में आपकी तरह मैंने भी कुछ करना चाहा ,जीना चाहा ,कुछ सीखना चाहा ,कुछ पाना चाहा लेकिन आपके द्वारा निर्मित पगदंदिओं पर चलकर मुझे ही क्यों ऐसे लाखों उपेक्षितों ने इस पीडा को अपनी नियति मान कर रोक ली है अपनी हँसी,अपनी खुशी,अपना हक़,अपने अधिकार.....अपनी प्रेम,अपनी जिन्दगी। जी और यह धमकी उसी रुकी हुई जिन्दगी का प्रतिबिम्ब लगता है मुझे,क्यूंकि आपके समाज ने मुझे मेरे विरोध करने ,प्रतिरोध करने की क्षमता के कारण ,समाज की असामाजिक प्रवृतीओं पर अंकुश लगाने की मुहीम में शामिल होने के कारण,युवाओं को एकजुट कर अपने अधिकार के लिए लड़ने के कारण यह धमकी मिली है मुझे और यह आज नयी बात थोरे ही है....कोई फोन पर धमकाता है.कोई सामने आकर करेजा दिखाता है,होई षड्यंत्रों के दायरे में लेना चाहता है सिर्फ़ एक कारण की मैं अपनी आवाज बंद कर दूँ,मैंने जो अत्याचार और अनाचार देखे हैं उसे देख कर उसका गुणगान करूँ ,जिस पीडा को झेला है उसे संगीत की मधुरता कहूँ तो ये खुश। तो सुन बे....भौन्सरी वालों...स्सालों...मेरे लिए भी लाइफ एक बार...तेरे लिए भी लाइफ एक बार ...अब देखते हैं इस एक बार के दौर में तुम जीतते हो या मैं हारता हुं,लेकिन दोग्लों याद रखना पाँच वरस के बच्चे को काट कर,छील कर मर्दानगी दिखाने वालों ..तुम्हारी बिरादरी जित कर भी हारेगी और हम हार कर भी जीतेंगे।

तुम्हारे समाज ने ही पाल पोश कर बड़ा किया,संस्कार दिया और आज इस वैश्विक मंच पर उसी समाज को लतिया रहे हैं,जुतिया रहे हैं,तुम्हारा नाम घिना रहे हैं ,तुम्हारी कलाई खोल रहे हैं,तुम्हे नंगा कर रहे हैं .....तुम्हारा भी वेल्कंम है....तुम भी अपनी बात रखना लेकिन मेरी इन बातों के बाद।

जी भाई बहिन लोग....इसी गाँव में टयूसन पढाकर जिन्दगी शुरू किया था मैंने,घर-घर जा जा कर मैट्रिक,इंटर के छात्र-छात्राओं को पढाना शुरू किया,धीरे-धीरे आस पास के गाँव के लोग मेरे शिक्षण शैली से प्रभावित होकर अपने बच्चों को मेरे पास भेजने लगे,मैं भी पुरी निष्ठा से शिक्षण कार्य करता रहा,रोज करीब सौ विद्यार्थियों को पढाने वाला मैं गरीब छात्रों को निःशुल्क पढाने लगा....अपने दरवाजे पर बेंच कुर्सी बोर्ड लगा कर शुरू किया अपना कैरिअर ..सामाजिक चेतना जगाने और युवाओं को एक जुट कर परिवर्तन का अलख जगाने लगा...दिन भर छात्रों के बिच देश काल समय पर चर्चा करना उसे कार्य रूप दिए जाने पर विमर्श...सचमुच आज भी वह दिन भुलाए नही भूलता है। तो इसी गाँव में एक छोर पर पाँच-दस घर मल्लिक (डोम) का परिवार था ,उसी परिवार में एक लड़का था अमरजीत अभी बी एम् पी में नौकरी कर रहा हैं वह उन दिनों दशम में था तो एक दिन उसकी चाची जो मेरे घर में सूप,सुप्ती दे जाती थी उस लड़के को लेकर मेरे पास लेकर आई.वह मुझसे पाँच कदम दूर अपने भतीजे को सटाए उसे पढाने की याचना करने लगी,मुझे काफ़ी खुशी हुई,मैंने उस लड़के को अपने पास बुलाया ...वह मेरे दरवाजे पर चढ़ने में घबरा रहा था,वह हरबरा रहा था ,आपके द्वारा निर्मित किए सामाजिक सोच ने उसे मेरे दहलीज पर खडा होने से भी रोक रहा था,अपने अधिकार को प्राप्त करने में आप की परम्परा बेडी बन कर जकड रही थी उसे ,मैंने उसके हाथ को थामा और क्लास में ले आया। वह लड़का रोज अपने समय पर पहुँच जाता,ध्यान मग्न हो कर पढ़ाई करता ,गंभीर होकर मनन करता, की अचानक एक दिन सामने सड़क पर हो रहे शोर गुल ने मेरा ध्यान खींचा,सड़क पर मेरे कुछ स्व-जातीय हरामी किस्म के लोग मेरे बाबा को धौंस दे रहे थे की तोरा अब जाती से बाड़ (निष्काषित) देंगे....डोमा के दुआर पर बैठाता है....सब धरम नाश कर दिया तोहार पोता। आम तौर पर गाँव में जो होता है दस बीस लोग घेर कर चटखारे लेने लगे....वह डोम कहा जाने वाला लड़का मेरे पास आया और बोला सर जी मेरे कारण ही न आपको और आपके परिवार की यह बेइज्जती हुई है,मैं अब नही आऊँगा।


बता बे....बुधिजिवियो कहे जाने वाले क्या जबाब दूँ इस बच्चे को ,,किस पवित्र परम्परा और सभ्यता की दुहाई देकर उसके प्रश्नों का उत्तर दूँ मैं.....लेकिन मैंने उसे ये कहा की विरोप्ध करेंगे हम,प्रतिरोध कर के अपना वजूद दिखा,शिक्षित बन ,ताल ठोंक कर दिखा दे ताकत । और फ़िर मैं पगला घंटा की तरह आस पास के डोम,चमार,दुसाध जिसे ये उपेक्षित कह कर खारिजं करते थे उन छात्र छात्राओं को बुला बुला कर निःशुल्क अपने घर पर पढाने के लिए आमंत्रित किया ,साले वे कुत्ते लोग भौंकते रहे,हम अपनी धुन में लगे रहे...वक्त बदला फ़िर मैं एक समाचार पत्र के रिपोर्टर के रूप में पत्रकारिता भी करता रहा और पढाने का जो सिलसिला चला वह आज भी चल रहा है। बदलाव का वह दौर परवान पर था ही की इसी गाँव के एक मजदुर मनोहर पंडित के छः बरस के मासूम की न्रिशंश हत्या हो गयी,जिसकी तह से जुड़ी हुई है यह धमकी।


उस बच्चे की लाश ने मेरे दिमाग में सिर्फ़ एक बात भर दी की इस बच्चे के हत्यारों को तलाश कर उसे सजा जरुर दिलवाएंगे .मगर यही बात उन अभियुक्तों को नागवार गुजर गयी.एक रात तो हद हो गया गाँव के सरस्वती स्थान में बजापते ध्वनि विस्तारक यंत्र लगा कर अभियुक्त लोग चिकार कर बोल रहा है ''रामदेव सिंह का पोता तुम होश में आ जाओ ..नही तो बरबाद कर देंगे''' जी वे लोग मेरा नाम लेकर चुनौती दे रहे थे,मुझे कह रहे थे की तुम मनोहर का साथ मत दो वरना तुम्हारे साथ भी वही होगा जो मनोहर के बच्चा के साथ हुआ है। मैं अपने घर में अपने परिवार वालों के साथ सब सुन रहा था...गाँव वालों ने भी सूना लेकिन किसी ने प्रतिरोध भी नही किया...इस मोड़ पर ख़ुद को बिल्कुल अकेला और असहाय पा रहा था मैं.सुबह स्थानीय थाना को सूचित किया ,कमलेश शर्मा प्रभारी थे कुटिल मुस्कान बिखेरते हुए बोले की चलिए इ सब होते रहता है ,क्या कीजिएगा पत्रकार को ऐसा झेलना होता है।

बिल्कुल सही कहा था उस भडुए ने....अखबारों में भाई लोगों ने छापा,हल्ला,गुल्ला चालू,एस पी,डी एम्,अल्हुआ,सुथ्नी करते-करते छः महीना बीत गया पता चला थाना प्रभारी को मोटा माल मिल गया है,डी एस पी ने पर्यवेक्षण की दिशा ही मोड़ डाली। मनोहर आज भी बाँध पर बैठ कर उस खेत की तरफ़ शून्य में निगाह टिका कर देख रहा है,जिस खेत में उसके बच्चे की लाश मिली थी.उसकी दब्दबाई आंखों में झाँकने की हिम्मत नही हो रही है हमें,ख़ुद को बिल्कुल वेवश और निरीह महसूस कर रहा हुं मैं। और आज फोन पर जो धमकी मिली वह इसी मदद और इमोसन का परिणाम है।
स्सालों....आओ...धमकाओ,बस चले तो गोली मार दो मुझे....मगर हम रुकेंगे नही,थामेंगे नही...हम अपने आस-पास के ऐसे हजारों मनोहर -गणेश की शिनाख्त करेंगे,उन्हें एक मंच देंगे,देश के बच्चे -बच्चे को ऐसे पीड़ित,उपेक्षितों,वंचितों ,लाचारों से रु-बा-रु करेंगे,ब्लॉग के विशाल मंच पर उनको खडा करेंगे और दुनिया को भारत का जलता सच्चा सच टैब तक दिखलाते रहेंगे जब तक न्याय की संभावना नही दिखे ,जब तक कोई आगे आकर यह न कह दे की चुप बुरबक इ हिन्दुस्तान है,इधर ऐसा होना सिम्पल है,पगला कहीं का। और जब उनकी आवाज को इधर रखने आया तो इधर भी पीड़ित की आवाज बनो तो ,उनके हित की बात करो तो,साले धमकी दे रहे हैं,जब उनका सिंहासन डोलने लगा तो भडास को बैन करो.....इ गांड में एसिड दाल रहा है...इ बल्हो हल्ला कर रहा है....एग्रिएतर भी बोलता है की मेरा मार्केट ख़राब हो जाएगा...ब्लैक लिस्टेड कर दिया...तो हे विकसित कथित बुध्धिजिवी प्राणी लोगों.....हम हरामिओं का झांट उखाड़ने वाला माहौल तो अब तक नही दिख रहा है ...लेकिन तुम स्सालों का खम्भा दरक रहा है ...आम अवाम सब बुझ रही है ,सब समझ रही है।
अब ज्यादा धमकी...हमला और ऐसी दोग्लैगिरी का लबादा उतारो नही तो एके फोर्टी सेभन हमको भी बुझने आता है....तू का मारते गोली से हमको बरबाद करेगा ....लेकिन जैसे यशवंत दादा पर पीठ पीछे हमला किया था ना वैसे नही भौन्सरी वालों....जगह,टाइम फिक्स कर फोन कर....वक्त लिखेगा इतिहास की जोर कितना बाजुए कातिल में है।
जय भडास
जय यशवंत
मनीष राज बेगुसराय

5 comments:

कमलेश मदान said...

इसे कहते हैं भड़ास! सचमुच आँखें डबडबा गयी मनीष भाई.

आपने सच की जो बखिया उधेड़ी है वो वाकई में काबिले तारीफ़ है,आमतौर पर मैं भड़ास का समर्थन नहीं करता हूँ लेकिन निजी तौर पर आपके लिखे और जिजीविषा और सभी पत्रकारिता से जुड़े लोगों का मन में सम्मान रखता हूँ.

कसम से अगर भड़ास जैसे मंच में आप जैसे लोग हओंगे तो निःसन्देह ये मन्च दुनिया को झकझोर कर रख देगा ,ऐसा मेरा दावा है!

धन्यवाद यशवन्त भाई और उनकी टीम को और सलाम करता हूँ.

कमलेश मदान

रजनीश के झा said...

मनीष भाई, आपके मर्म को कोई समझे या ना समझे मगर वोह समझ सकता है जिसने इस तरह की घटना को करीब से देखा है और उन स्वमेव बुध्धिजीवी को भी, मगर अपने दायित्वों से कोसो दूर ये ही इस तमाम तरह के वातावरण के करता धरता रहें हैं. समाज बदला, लोग बदलें या नहीं मगर युवाओं का नजरिया बदला, समाज के पहरेदार हमेशा से वोह ही रहे हैं जिन्होंने इसे नोचा और खसोटा है. मगर अब नहीं और ये आपने साबित की है. और आप बेहिचक करें, इन चवन्नी चाप चुतियों से कुछ नहीं उखारने वाला है और किसी की नहीं परन्तु अपनी कह सकता हूँ की मेरे लिए आप कभी भी आदेश कर सकते हैं.
जय भड़ास
जय भाडासी

अंकित माथुर said...

आप बीती का शानदार प्रस्तुतीकरण।
आपकी बहादुरी, और दृढ़ निश्चय की जितनी
भी सराहना की जाये कम है।
सच पूछो तो इसमे कहानियों में पढी़ जाने
वाली क्रान्ति की अलख सी नज़र आती है।
आपके लिये एक छोटी सी कविता।

"वीर तुम बढे चलो ।
धीर तुम बढे चलो ।।

हाथ में ध्वजा रहे ,
बाल - दल सजा रहे ,
ध्वज कभी झुके नहीं ,
दल कभी रुके नहीं ।
सामने पहाड़ हो ,
सिंह की दहाड़ हो ,
तुम निडर हटो नहीं,
तुम निडर डटो वहीं।
मेघ गरजते रहें
मेघ बरसते रहें
बिजिलयाँ कड़क उठें
बिजिलयाँ तड़क उठें
मेघ गरजते रहें
मेघ बरसते रहें
वीर तुम बढे चलो
धीर तुम बढे चलो

डा०रूपेश श्रीवास्तव said...

मनीष भाई,देखा आपने कितने सारे लोग समर्थन में हैं अपने,ये देख कर विरोधियों की हवा तंग हो रही है । मुख्य बात तो यह है कि शक्ति संख्या में नहीं बल्कि संगठन में होती है और अब हम लगभग ढाई सौ लोग संगठित हो गये हैं तो ये ताकत विरोधियों को ढाई करोड़ से भी ज्यादा लग रही है ,एक दिन बदलाव की इस अग्नि में सारा कूड़ा कचरा जल जाएगा और एक नयी शुरूआत होगी ये सपना नहीं हकीकत है और इसकी आहुतियां पड़नी शुरू हो गयी हैं । हम फाल्गुनी की पीढ़ी को सुन्दर स्वस्थ और प्रेमपूर्ण समाज देंगे । भड़ास के हवन कुंड में इसी तरह आहुतियां डालते चलेंगे हम सब और हरामी लोगों ने जिस सोच को मुख्यधारा बना दिया है हम उस पर सुस्सू की धार मार कर उससे अलग चलें हैं ।
जय भड़ास
जय यशवंत
जय मनीषराज
जय क ख ग घ
जय च छ ज झ
..........
..........
जय क्ष त्र ज्ञ
जय A B C....Z
पर हर हाल में जय जय भड़ास

हरे प्रकाश उपाध्याय said...

manish raja jo tumko dhmkaye...jo uch-nich sikhaye....holi me uska munh kala ho jaay.....jay...jay....jay