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29.3.08

भड़ास से प्यार करने वाले बांहे फैला कर गले लगाने दौड़े चले आये....

दो दिन से यशवंत दादा के साथ थे कभी एक दूसरे को चिकोटी लेते कभी किसी को लतिया देते तो भाई इतना जरूरी काम है तो व्यस्ततता तो रहेगी ही। साथ में शक्तिस्वरूपा भड़ास माताश्री मुनव्वर आपा और हमारी महाप्रतापी परम तेजस्विनी बहनजी मनीषा दीदी भी रहीं तो बीच बीच में हम दोनो के कान भी उमेठ दिये जाते हैं कि बातों से ही पेट भरना है क्या? ये खा लो वो खा लो सब कुछ खा लो। सच तो यह है कि अभी कुछ लिख पाने का मन ही नहीं हो रहा है क्योंकि भावप्लवन रुके तब तो शाब्दिक अभिव्यक्ति हो लेकिन अभी तो प्रवाह ही नहीं थम रहा है यहां तक कि मेरी सबसे प्यारी छुट्टन गुड्डो बहना को उसके मेल का जवाब तक नहीं दे पाया मुझको पता है कि वो नाराज़ नहीं होगी भइया की मनोस्थिति को समझ रही होगी (अरे मेरे प्यारों, छुट्टन या गुड्डो तो बस उम्र से है सोच और स्नेह में तो मेरी मां जैसी है ; नहीं समझे न ?हे भगवान जब आप अक्ल बांट रहे थे क्या भड़ासी तब भी किसी से झगड़ा कर रहे थे और जब सब बांट दिया तब आपसे भी झगड़ा करने पहुंच गये कि जरा रुक नहीं सकते थे बस एक जन्म की ही तो बात थी आ जाते हम लोग अक्ल लेने पर तुम्हे तो हर काम में जल्दी रहती है, खैर इस बार ऐसे ही काम चला लेंगे लेकिन जो दूसरों के हिस्से के दिल यहां बेकार पड़े हैं कूड़ेदान में कम से कम वो तो दे ही दो वरना लोग कहेंगे कि साले भड़ासियों को भगवान ने भी खाली हाथ लौटाया। कब अक्ल आयेगी नहीं पता पर जरा सा घुटने से ही अनुमान लगाओगे तो समझ जाओगे कि मैं रक्षंदा आपा की बात कर रहा हूं )।
जरा सा एक पल का विराम दीजिये ,दादाश्री खुद ही पोस्ट करेंगे कि क्या- क्या फाड़ा और क्या जोड़ा है। उनके आते ही एक अनौपचारिक ब्लागर-मीट हो गई । भड़ास से प्यार करने वाले बांहे फैला कर गले लगाने दौड़े चले आये। सबने उलटियां करीं और यशवंत दादा उनके मुंह में उंगली डाल-डाल कर गले में ,दिल में अटका मसाला निकालते रहे और हम खामोशी से सबकी उल्टियों के सैम्पल एकत्र करते रहे। एनालिसिस की रिपोर्ट दिल्ली भेजी जाएगी और फिर आपको बताया जाएगा कि किसको क्या हैं और किसको क्या नहीं है। यकीन मानिये इन सारे लोगों में कोई मुझे मेरे चाचा जैसा लगा, कोई ताऊजी जैसा और कोई म्रे बड़े भाई जैसा; कोई परायापन नहीं अगर आपस में एक दूसरे पर चिल्ला भी रहें हैं तो बीच-बीच में कहते जा रहें हैं कि अबे चाय पी वरना ठंडी हो जाएगी। ऐसा अद्भुत सा रहा सब कि उसकी सत्यता पर यकीन ही नहीं हो रहा कि एक ओर जहां दुनियादारी में इतनी उठापटक और कुत्ताघसीटी है वहीं दूसरी ओर ऐसा भी है कि वो लोग जिन्होंने कभी एक दूसरे को प्रत्यक्ष देखा तक नहीं है वे आपस में एक दूसरे से इतना प्यार कर सकते हैं। मैं दिल से यह बात स्वीकारता हूं कि यह सब भड़ास की ही महिमा और माया है और इस भड़ास जगत के रचयिता ब्रह्माजी हैं यशवंत दादा। समझ में नहीं आ रहा कि लिखूं क्या और कैसे इसलिये अगली खुराक कल दूंगा तबतक आप इस गोली को चूसिये।
जय जय भड़ास

2 comments:

आशीष said...

डॉक्‍टर साहेब
यशवंत जी से नहीं मिल पाने का वाकई मुझे अफसोस है और इसके लिए मैं उनसे और आप सभी लोगों से क्षमा चाहूंगा। आफिस के व्‍यस्‍त समय में से उनके लिए समय ही नहीं निकाल पाया

आशीष

रजनीश के झा said...

Arre dada to dada hain jahan bhi jayenge bachchon ko anand kand karwayenge hi.
ha ha ha ha ha
kyoun dada kaisee kahi.