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30.3.08

ये भड़ास है या चमचों का चबूतरा....संदर्भ: पुण्य प्रसून वाजपेयी की विदाई वाली पोस्ट

((पुण्य प्रसून वाजपेयी के सहारा समय छोड़ने पर भड़ास पर एक पोस्ट लिखी थी....पुण्य प्रसून के सहारा समय छोड़ने के निहितार्थ। इस पोस्ट पर बहुत दिनों बाद किसी बेनामी अनामी महोदय ने अपना मत बड़े गुस्से के साथ प्रकट किया है। मुझे लगा, इस मत को भी भड़ास के पाठकों तक रखना चाहिए ताकि अगर किसी को दूसरा पक्ष भी कहना है तो उसे भले ही बेनामी या अनामी नाम से, सबके सामने रखा जाना चाहिए। इसी कारण इस कमेंट को तो पब्लिश किया ही, इस कमेंट को एक अलग पोस्ट के रूप में भी डाल रहा हूं। उम्मीद है अपने संपादकों को संपूर्णता में समझने के क्रम में अनामी महोदय की यह टिप्पणी थोड़ी मदद करेगी। हालांकि मैं निजी तौर पर इस कमेंट में कही गई बातों से सहमत नहीं हूं पर जब मैं कभी पुण्य प्रसून की टीम का पार्ट नहीं रहा तो मैं यह भी नहीं कह सकता हूं कि ये बातें गलत कही गई हैं। आफिस के अंदर की बातें अगर सूत्र वाक्य में कही जाएं तो उन्हें किसी को समझने के लिहाज से जरूर सबके सामने लाया जाना चाहिए।

यहां मैं यह भी बताना चाहूंगा, खासकर बेनामी अनामी महोदय को कि पुण्य प्रसून पर एक और पोस्ट भड़ास पर डाली गई थी... क्या लालू यादव से डायलागबाजी के चलते निकाले गए पुण्य प्रसून। इसमें उन सारी बातों को शामिल किया गया था जिसके चलते पुण्य प्रसून के बाहर जाने के हालात बने। हो सकता है कि अंदरखाने और आफिस की पालिटिक्स की कुछ बातें छूट गई हों लेकिन हम आपकी पोस्ट डालकर यह बताना चाहेंगे कि भड़ास चापलूसों का मंच कतई नहीं है। ... जय भड़ास, यशवंत))


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[भड़ास] New comment on पुण्य प्रसून के सहारा समय छोड़ने के निहितार्थ.

Anonymous has left a new comment on your post "पुण्य प्रसून के सहारा समय छोड़ने के निहितार्थ":

मुझे समझ नहीं आता ये भड़ास है या चमचों का चबूतरा जहां कभी भई कोई आता है और मक्खन मलना शुरू कर देता है । पुण्यप्रसून की आपने जिस तरह ठकुर सुहाती की है वो बदकिस्मती है पत्रकारिता की । आप जैसे लोग क्या पत्रकारिता करते होंगो पता नहीं । जिस पुण्य प्रसून को आप मिलस सार बताते हैं जमाना जानता है कि वो बेहद घटियापन की हद तक अहंकारी है । अपने दफ्तर में काम करने वाले लोगों की नमस्ते का जवाब नहीं देना और जिसका चाहे मान मर्दन करना पुण्य की पहचान है । और सहारा से अगर वो बाहर कर दिए गए तो इसीलिए कि उन्होंने अपने अहंकार का परिचय देते हुए अपने ही पत्रकार भाईयों को मूर्ख और अनाडी बताने की कोशिश की ।वो लोगों को क्या पत्रकारिता सिखाएंगे पहले खुद तहजीब सीख लें । उनके स्टाइल के अलावा उनके पास कुछ नहीं है । वो भी उन्होंने स्वर्गीय एसपी सिंह से चुराया है। खुद को सरे आम हिंदी न्यूज का अमिताभ बच्चन कहने वाले पीपी को विनम्रता का पाठ सीख लेना चाहिए वर्ना लोग उनका नाम तक भूल जाएंगे ।

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Posted by Anonymous to भड़ास at 29/3/08 11:33 PM

3 comments:

डा०रूपेश श्रीवास्तव said...

दादा,वैसे भी हम लोग तथाकथित मुख्यधारा की पत्रकारिता पर धार मार चुके लोग हैं तो इन सज्जन या सजनी(लिंग निर्धारण करना कानूनन जुर्म है)ने सही कहा कि हम लोग पत्रकारिता क्या खाक करते हैं। लगता है कि पीपी भाई ने इनकी तुतुहरी बजा दी होगी तभी चटपटा रहे हैं। हम भड़ास पर मक्खन मलें या मूत्र इन्हें क्यों पेट्रोल लग रहा है और अगर जले भुने बैठे हों तो आ जाएं इन्हें बरनाल लगा देंगें

रजनीश के झा said...

dada, doctor saab ne sahi kaha ki patrakarita par logon ke hisaab se prashnchinh to hai magar inki vyaktigat ranjish ka karan samajh main nahi aaya, waisai bhi PP ji ko inke certificate ki jaroorat to nahi honi chahiye or hai bhi nahi. magar in mahasay ke lekhan se to lag raha hai ki PP bahiya ne jaroor inki chadddhi kholi hogi hi hi hi hi hi hi hi.

Anonymous said...

धन्यवाद बेनामी अनामी की तरफ से । माफी चाहूंगा भड़ास को चमचों का चबूतरा बताने के लिए क्यों कि यहां पर वो ही नहीं लिखते जो पुण्यप्रसून जैसे घमंडियों को मिलनसार बताते हैं । आपने बड़े शब्द दिये अपनी सफाई देने के लिए । उससे भी ज्यादा जो पीपी की आदतों को बताने में नहीं लिखे गए थे । मैं चाहता हूं पीपी जिंदा रहें पर वो पीपी जिंदा रहें जो गरीबों से जुड़े मुद्दे उठाते और उन्हें आगे बढाते रहे हैं । उन्होंने सहारा को जो सूरत दी थी वो आज के माहौल में खली बलियों को चुनौती देने वाली थी । पर उसी सहारा में एक कर्ज में डूबे गरीब कर्मचारी ने जब पीपी से लगभग गिड़गिड़ाते हुए पीएफ के खाते में लोन दिलाने की गुहार लगाई तो जवाब था - तुमने बैक की किश्ते ( हाऊसिंग लोन की ईएमआई) नहीं चुकाई तुमको तो जेल में होना चाहिए था । गरीबों के इस 'रहनुमा' ने ये भी नहीं सोचा कि तीन साल से इस गरीब की तनख्वाह में चार आने नहीं बढाए गए जेल तो उनकों जाना चाहिए था जिन्होंने ये हालात बनाए । पर कैमरे के सामने फूंफां करना पीसीआर का सारा स्टाफ इसलिए बदल देना क्यों कि कैमरा उनके ऊपर ज्यादा न होकर गेस्ट के उपर ज्यादा था । किस किस तरह सहारा के दफ्तर में अनिल गुप्ता जैसे वरिष्ठ पत्रकार के सहारा परिवार में स्वागत करने पर पुण्य प्रसून ने उनका अपमान किया सब जानते हैं । सहारा से विनोद दुआ भी गए थे लेकिन इसलिए गए थे क्यों कि वहां के मालिक ने पत्रकारों को कमीना कहा था । वो इसलिए गये थे क्यों कि मालिक के सामने पत्रकारों के मुकाबले सम्मान का मामला रखा । विनोद दुआ ने सुब्रत रॉय को एसएमएस किया -' आप अहंकारी है , इतना गरूर ठीक नहीं ' इसके बाद उन्होने वो एयर टिकट फाड़ दिए जो कंपनी ने दिये थे और अपने पैसे से यात्रा कर वापस लखनऊ से दिल्ली आए । पीपी तो खुद ही अहंकारी हैं वो क्या पत्रकारों के सम्मान की बात करेंगे । मुकेश कुमार ने सहारा छोडा तो इसलिए कि ऑन एयर सहारा प्रणाम करने का चमचागिरी का आईडिया उन्हें एक पत्रकार की आजादी पर अतिक्रमण लगता था । पुण्य तो काला कोट पहन कर पूरे न्यूज रूम में इतराते फिरते थे । हर चमकने वाली चीज सोना नहीं होती और पुण्य का हर प्रसंशक चमचा नहीं होता हां अग्यानी जरूर हो सकता है