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27.4.08

आई पी एल - मनोरंजन या साजिश?

आख़िर वही हुआ जिसका डर मुझे तब से सता रहा था जबसे आई पी एल नाम का तमाशा शुरू हुआ था । मेरा शुरू से ही ये मानना रहा है कि आई पी एल का ढांचा तैयार ही किया गया है भारतीयों के बीच दरार पैदा करने के लिए । पहले भी भड़ास पर कई लोगों ने ऐसी आशंका जतायी है। हरभजन और श्रीशांत के बीच जो हुआ , वह इस आशंका का एक छोटा सा नमूना है। कुछ और नमूने भी लोगों ने देखे होंगे । द्रविड़ जैसे सम्मानित खिलाड़ी के चौके पर उनके घरेलू मैदान के आलावा कहीं ताली तक नहीं बजती है, सहवाग जैसे लोकप्रिय खिलाड़ी के तूफानी अर्धशतक पर स्टेडियम में सन्नाटा छाया रहता है, अनुरोध करने पर भी एक ताली तक नहीं बजती है । खेल इतना स्वार्थपरक तो कभी नहीं था। दरअसल ये स्वार्थपरता नहीं बल्कि क्षेत्रीयता का जहर है जो लोगों के दिलों में इतने गहरे उतार देने की साजिश है जिसमें एक देश एक लोग का जज्बा घुट कर दम तोड़ दे । मेरी बात अभी कुछ अजीब सी लग सकती है परन्तु इसपर गहरे सोचने की जरूरत है। अब, हरभजन-श्रीशांत का ही मामला लें । किसकी गलती है किसकी कितनी गलती है यह बहस का मुद्दा हो सकता है परन्तु घटना के बाद की प्रतिक्रियाएं सोचनीय हैं । केरला क्रिकेट संघ द्वारा हरभजन को सजा देने की मांग और मुंबई इंडिंयंस द्वारा हरभजन के सपोर्ट में खड़े होना कुछ अच्छा संकेत नहीं है। आई पी एल को डिजाईन ही इस तरह से किया गया है कि इससे क्षेत्रीयता को बढ़ावा मिले। लोग किस खिलाड़ी के लिए ताली बजा रहे हैं यह मुख्य नहीं है , वो सिर्फ़ अपने क्षेत्र के लिए ताली बजा रहे हैं , यह मुख्य भी है और चिंतनीय भी। एक राज ठाकरे काफी नहीं था जो आठ-आठ राज ठाकरे देश को बांटने के लिए कमर कसे खड़े हैं । और हम हैं कि अधनंगी लड़कियों को देख कर ताली बजाने में मशगूल हैं। क्योंकि हम विकसित हो रहे हैं ।

वरुण राय

6 comments:

डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...

वरुण भाई,आपका कहना मुझे तो एकदम ही सत्य लगता है ये खेल बस जनता को मूलभूत समस्याओं से ध्यान हटा कर मनोरंजन प्रिय बना रहे हैं और क्षेत्रीयता को बढ़ावा दे रहे हैं।
फुद्दुन का कब्भौं चेतना न आई जनाए पड़त है....

rakhshanda said...

ये खेल नही,खेल का मजाक है,कुछ पैसों वालों के दिमाग की खुराफात है,क्या कर सकते हैं,जब पब्लिक ही पागल हो रही है तो कौन रोक सकता है?

रजनीश के झा said...

वरुण भाई ,
मुझे इसमें साजिश नही लगती, अगर हमारा मनोरंजन हो रहा है तो जरूरी नही की मुकाबला दो देशों के बीच ही हो, और फूटबाल की तरह इस तरह की प्रति स्पर्धा से खेल का मनोरंजन के साथ साथ वैश्वीकरण होना तय है, अगर आपको शिकायत है की फलां को सपोर्ट नही मिलता और फलां को ताली नही मिलती तो भाई ये खेल है और यहाँ सिर्फ़ खेल को सबकुछ मिलता है और मिल रहा है,
लोगों को खेल और मनोरंजन, खिलाड़ी को पैसा, और पैसे का आदान प्रदान हमारे तंत्र को भी दे ही रहा है सो कृपया कर के हमारे सड़े हुए संस्कार की दुहाई ना देकर अगर सकारात्मक पहलू को लेकर चलें तो ये बेहतरीन है।
और भाई रही बाटने की बात तो वह तो हम ख़ुद विभाजित हैं क्यूंकि भारत वर्ष में लोगों में भारतीयता बाद में आती है पहले अपना प्रान्त ही याद आता है।
सो मेरी तो मीडिया से इतनी ही दरखास्त है की भाई इमानदारी से लिखो जो सच हो किसी के चुत्ड में मत घुसो, मगर आदत से लाचार ये घुस के ही मानते हैं, आख़िर इन्हें संडास सूंघने की जो आदत पड़ी हुई है ।
जय जय भडास.

VARUN ROY said...

वही तो मैं कहना चाहता हूँ रजनीश भाई . अगर खेल को ही सबकुछ मिलना है तो कल तक जो सहवाग और द्रविड़ के चौकों पर ताली बजाते नहीं थक रहे थे वे आज इनके चौकों पर खामोश क्यों हो जाते हैं अगर ये खिलाड़ी उनके क्षेत्र की टीम से नहीं खेल रहे होते हैं. और हमारे संस्कार सड़े-गले नहीं हैं, उन्हें सड़ा गला बनाकर पड़ोसा जा रहा है ताकि कुछ निहित स्वार्थों की सिद्धि हो सके . साकारात्मक बात तो ये होती कि क्रिकेट को क्रिकेट रहने दिया जाता, हर अच्छे शॉट पर ताली बजती और हर चौके-छक्के के बाद अधनंगी बालाओं का पिछुआरा नहीं दिखाया जाता. क्रिकेट तो ख़ुद मनोरंजन का बाप है . उसे इन अधनंगी स्टेप्नियों की कहाँ जरूरत है.
वरुण राय

रजनीश के झा said...

वरुण भाई,
देखिये ये तो देखने का नजरिया है, वैसी भी व्यावसायिकता ने सब जगह कब्जा कर रखा है, और खेल को मनोरंजक बनाकर और लोकप्रिय बनाये जाएं तो ये ग़लत नही है, और मुझे तो बड़ा आनंद आ रहा है।
सोचो भाई अगर पत्रकारिता में व्यावसायिकता ना आया होता तो कहाँ से लाते ये आप-धापी जो आज है, सो इसे तो आने दो, और भाई अगर क्रिकेट मनोरंजन का बाप होता तो इसकी जरूरत ही नही आन पड़ती, ये तो समय का चक्र है की पहले टेस्ट मैच फ़िर एक दिनी ने लोगों को बोर करना सुरु किया, ये तो समय की मांग है और अगर लोगों को पसंद है तो किसी को क्या परेशानी विशेष कर मीडिया को,
शायद मीडिया का काम ही है खुजाना , हो तो भी ना हो तो भी।
भज्जी को हीरो भी मीडिया ने बनाया और अभी विलेन भी मीडिया ने ही।
भाई खेल को खेल रहने दो लुत्फ़ उठाओ बड़ा मजा आएगा, मगर उसमें घुस कर लुत्फ़ उठाना चाहोगे तो खुजली वाला बनना ही पडेगा ।

जय जय भडास

Arpit said...

Bhaiyaa sab paise ka khel hai.. Cricket jaisa kuch bacha nahi hai.
Kehne ko to team ke naam main kolkata aur chennai jaise waors use kiye hain, par aap hi bataaiye ki kya ye teams kissi state ko represent kar rahi hi?
Bhai hum to wo knight raiders ko support kar rahe hain, kyonki unke gaane main shahrukh ne accha dance kiya hai...

IPL jaise tournament cricket ke naam pe ek gira hua mazak hai.. Ab ye game bat aur ball ka nahi hai... game paise ka hai..