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19.4.08

आप बात बात में लोगों को नौकरी से निकालने की धमकी देते हैं....(एक मीडियाकर्मी का त्यागपत्र)

विषयः त्याग-पत्र

प्रति,

श्री अरूण आनंद,
कार्यकारी संपादक
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस,
1बी-, रावतुला राम मार्ग,
नई दिल्ली-110022ण्


महाशय,
कल रात दिनांक 10 मार्च 2008 को डेस्क प्रभारी संजीव स्नेही जी का फोन आपके हवाले से आया कि मैंने कहीं अन्य जगह नौकरी कर ली है। उन्होंने आपके हवाले से यह भी कहा कि मैं इस्तीफा दूं। इस बावत मुझे कार्यालय से नोटिस भेजे जाने की भी तैयारी हो रही है। मेरे बीमार पड़ने से और छुट्टी पर जाने से नये लोगों पर नकारात्मक असर पड़ेगा। संजीव जी से कल रात 10-15 मिनटों की बात के कुछ मुख्य बातों में से यह बातें सार हैं।

बीमार पड़ने पर कुछ दिनों की छुटि्टयां लेकर घर में आराम करने से किसी को नौकरी मिल जाती हो तो मेरे ख्याल से हम और आप सभी बीमार पड़ते रहे हैं। आपको भी कुछ समय पहले कमर में दर्द था और आपने छुट्टी की थी तो क्या आप भी कहीं नौकरी का प्रयास तो नहीं कर रहे थे! कोई पत्रकार इतना संवेदनाविहीन कैसे हो सकता है! खैर, आपने मुझसे इस्तीफे की मांग की है। मैं आपकी इस मांग को पूरा कर रहा हूं और त्याग-पत्र भेज रहा हूं।

मैंने इंडो-एशियन न्यूज सर्विस की हिन्दी सेवा में लगभग सवा तीन महीने काम किए परंतु दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि मुझे इस दौरान कभी भी आपके संस्थान में काम करने का उचित माहौल महसूस नहीं हुआ। हिन्दी सेवा के कार्यकारी संपादक अरूण आनंद को अपने साथ काम करने वाले पत्रकार कर्मचारियों के साथ कभी भी मुफीद (उचित) व्यवहार करते हुए मैंने नहीं पाया। कार्यकारी संपादक का स्वभाव बहुत हद तक व्यापारिक मानसिकता से ग्रस्त है। वह अपने साथ काम करने वालों को एक ग्राहक की तरह देखते हैं और उनसे ऐसा ही वर्ताव करते हैं। उन्हें खबरों की गिनती का बहुत शौक है। आप खबरों की गिनती में विश्वास करते हैं न कि गुणवत्ता में। साक्षात्कार के समय और नियुक्ति के कुछ दिनों बाद तक आप (अरूण आनंद) बहुत ही सहिष्णु बने रहते हैं और कर्मचारियों की नब्ज टटोलते हैं। इस संस्थान की अंग्रेजी सेवा में आपके एक जूनियर साथी की भाषा में कहूं तो कार्यकारी संपादक अपने सामने अपने कर्मचारियों को समर्पित करवाने चाहते हैं। माफ कीजिए, यह सब नौकरीपेशा में एक हदतक सभी को स्वीकार्य होता है लेकिन लंबे समय तक इस गुलाम बनाने की मनोवृत्ति को ढो पाना किसी भी गैरतमंद इंसान के लिए मुिश्कल होता है। इसके बहुत से नजीर माननीय अरूण जी के सेवाकाल में देखने को मिले हैं।

आईएएनएस से मेरी जानकारी में कुछ लोग मेरी नियुक्ति के पहले भी छोड़कर जाते रहे हैं या उन्हें छोड़कर जाने को बाध्य किया जाता रहा है। मेरे इन सवा तीन महीनों के दौरान भी चार लोगों ने इनके व्यवहार के कारण नौकरी छोड़ी है। हालांकि उन्होंने नौकरी छोड़कर जाने की कई घटनाओं के बाद अपनी शैली में परिवर्तन लाया है। यह उनकी जरूरत है। उम्मीद करता हूं कि यह नई शैली उनकी आदतों में शुमार हो जाए। यह दिक्कत श्रीमान कार्यकारी संपादक के अंदर किस कारण विकसित हुआ है, यह तो कोई मनोविश्लेषक ही बता सकता है। कार्यकारी संपादक का कहना है- ‘’journalism should flow in your blood.’’ क्या पत्रकारिता कार्यकारी संपादक की धमनी और िशराओं में बहने लगे तो उनके स्वास्थ्य पर इसका विपरीत असर तो नहीं पड़ेगा।

पत्रकारिता का लेना, देना केवल पैसों, नियुक्ति दे सकने का सामथ्र्य रखने, महज कुछ समर्थ लोगों से अपने संबंध बेहतर बनाकर रखने या खबरों की गिनती रखने से नहीं होता है। भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में पत्रकारिता की नींव रखने और उसे सींचने वाले लोगों का मन शायद इन क्षणिक महत्व रखनेवाली बातों में कभी नहीं गया था। पत्रकारिता को सींचने वाले लोगों में संवेदनाएं कूट-कूटकर भरी हुई थीं। कार्यकारी संपादक में इसका सर्वथा अभाव है। हमारे कहने से, लिखने से और संस्थान छोड़ देने से उनका हृदय परिवर्तित हो जाएगा, मैं ऐसा नहीं मानता हूं। माननीय कार्यकारी संपादक को इसके लिए बहुत मेहनत की जरूरत होगी ठीक उसी तरह जिस तरह मुझे अपनी कॉपी बेहतर से बेहतर बनाने के लिए कहा जाता रहा है। शायद इससे भी ज्यादा मेहनत की जरूरत होगी। मैं आपके व्यवहार के कारण बहुत पहले ही संस्थान छोड़ देता लेकिन मैं भागने वालों में से नहीं हूं। मैं आपसे मेेरी अपनी कॉपी के लिए अच्छे रिमार्क्‍स देने को मजबूर करवाना चाहता था। मेरी कॉपी के लिए आप ‘excelent copy’ कह चुके हैं। मैं अपनी चुनौतियों से पार पा गया हूं। अनुवाद विशेषकर खबरों का मेरे लिए नया काम था। नये काम में समय लगता है, सो मुझे भी लगा।

‘original copy’ आपके हिसाब से मैं बहुत अच्छी लिखता हूं। ऐसा डेस्क प्रभारियों ने भी कई मौकों पर कहा है। खैर, इसके लिए मुझे आपके प्रमाण-पत्र की जरूरत नहीं है। आपके साथ काम करते हुए मुझे दो बड़े संस्थानों ने आईएएनएस से बेहतर पगार और पद की पेशकश की थी लेकिन मैं अपनी चुनौतियों से पीछे नहीं हटना चाहता था। सो, मैंने इन प्रस्तावों को तव्वजो नहीं दी। आपने नियुक्ति के समय senior-sub editior की पेशकश की थी और बाद में जब नियुक्ति पत्र देने की बात आई तब आपने मेरा पद कम करके sub-editor कर दिया। अपनी बात से पीछे हटना आपकी फितरत है। नियुक्ति के समय 10-12 खबरों का अनुवाद तथा 8 घंटे काम करवाने की बात आपने की थी लेकिन दो हफ्तों के बाद आपने अपने काम करवाने की परिभाषा ही बदल डाली और मेरे एक सहकर्मी से कहा-``पत्रकारिता में कार्यालय आने का समय होता है लेकिन कार्यालय से जाने का कोई समय नहीं होता है।´´ मुझे लगता है कि कार्यकारी संपादक को working journalist act जरूर पढ़ लेना चाहिए।

आप बात-बात में लोगों को यह धमकी देते हैं कि यहां से नौकरी से निकाले जाने के बाद कहीं नौकरी नहीं मिलेगी। यह एक किस्म का फतवा है। आपने जिन लोगों को आईएएनएस से बाहर का रास्ता दिखाया है या बाहर का रास्ता देखने को मजबूर किया है, माफ कीजिए वे सारे लोग देश के नामी-गिरामी संस्थानों में अपनी बेहतर सेवा दे रहे हैं। कुछ लोग पत्रकारिता में व्यवहारिक होकर नौकरी खोजकर संस्थान छोड़कर चले गए। मैं नौकरी और भविष्य की चिंता किए बगैर आपकी नौकरी से इस्तीफा दे रहा हूं। पत्रकारिता में कुछ साल या बहुत साल बिताने से पत्रकारिता और मानवीयता की समझ नहीं आ जाती है। जिसको पत्रकारिता और मानवीयता की समझ आनी होती है उसे कुछ समय में ही आ जाती है। शायद मैं अपनी बात आपको समझा पाया हूं। इसी उम्मीद के साथ।


आपका शुभेच्छु
स्वतंत्र मिश्र
11 मार्च 2008
सी-1/118, मुस्कान अपार्टमेंट सेक्टर-17, रोहिणी, दिल्ली-110089, मो,-09868851301

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(कारवां से साभार)

3 comments:

kaushal said...

वाह स्वतंत्र जी आपने तो कमाल कर दिया... आपका इस्तीफा काबिलेतारीफ है... हर संस्थान में जूनियरों का खून चूसा जाता है .. लेकिन इसके खिलाफ कोई आवाज नहीं उठाता... आपने ऐसा करके एक मिसाल कायम की है ... एक और बात हर संस्थान में ये कहा जाता है कि यहां आने का टाइम होता है जाने का कोई टाइम नहीं होता ... हम चाहेंगे कि इस ब्लॉग से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार अपने मातहत से ऐसा व्यवहार न करें ...

डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...

स्वतंत्र भाई,आपने नाम को चरितार्थ कर दिया है, गुलामी स्वीकार्य नहीं है और पत्रकारिता हो या कोई अन्य पेशा मानवीय पक्ष से अलग रख कर नहीं देखा जा सकता, आप आज़ाद होकर हल्का महसूस कर रहे होंगे मैं तो ये बिगुल कब का अपने सीनियर्स के कान में फूंक कर उन्हें सता चुका हूं और अब मुक्ति के गीत गा रहा हूं और आप सब की सेवा में हूं अब पत्रकारिता और मेडिकल एजुकेशन मेरे लिये आय का स्रोत नहीं हैं...
जय जय भड़ास

रजनीश के झा said...

swatantra bhai ki jai ho, jai jai ho,

dost aap sahi main sahasee ho, or bahadur bhi,

waisai bhi agar hum apna egoism hata len to bahot sare logon ka kalyan ho jaye. ye aapke hi nahi sabhi ke feild main hota hai ki igo budhhon pe havee rahti hai.

Appko bahot badhai.

Jai Jai Bhadaas