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25.4.08

पं. सुरेश नीरव की एक चुलबुली गजल

(सभी भड़ासियों से स्वास्थ्य पर इसका बड़ा आयुर्वेदिक असर पड़ेगा)
किसी के हुस्न का जादू जगाने का इरादा है
सभी कुछ दांव पर अब तो लगाने का इरादा है
है मिसरी-सी जुवां तेरी,शहद टपके हैं बातों से
तुम आफत हो बड़ी कितनी बताने का इरादा हैसहमकर शाम को तनहा मिलोगी जब बगीचे में
तुझे नाजुक शरारत से सताने का इरादा हैकभी फूलों की घाटी से,कभी पर्वत की चोटी से
तुझे दे-देकर आवाजें थकाने का इरादा है
मुहब्बत की शमा दिल में हुई रौशन न सदियों से
तेरे जलवों की तीली से जलाने का इरादा है
तुझें लहरों की कलकल में,तुझे फूलों की खुशबू में
तुझे भंवरों की गुनगुन में बसाने का इरादा है
फटाफट तुम चली आओ,मेरी उजड़ी हवेली में
तुझे टूटे खटोले पर सुलाने का इरादा है
ठिठुरकर शाम ने ओढ़ा है देखो शॉल कोहरे का
तुझे जलते अलावों पर बुलाने का इरादा है
हँसी देखी है जोकर की, न देखे आंख के आंसू
हजल से आज नीरव को हँसाने का इरादा है।

1 comment:

रजनीश के झा said...

पंडित जी,
ये भडास का ही कमाल है की आपने इसे सुधार दिया, मेरी समझ इतनी तो है नही की बरीकियौं को पकड़ सकूं मगर भावंश कमाल के हैं, एक बार फ़िर से बधाई ।