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20.4.08

अख़बार बनाम किरयाने की दुकान

भड़ास पर यह मेरा पहला लेख है


आजकल अख़बार किरयाने की दुकान की भूमिका मे हैं आऔर् मीडिया कर्मी सेल्स मैंन की तरह अब आप सोचेंगे की मैं नकारात्मक सोच का हूँ । अपने दिल से पूछो की आप क्या हैं ? क्या निस्पछ पत्रकारिता रह गई है ? अगर काम से मौका न मिले तो जरा बोथ्रूम मे जाकर सोचे । आज स्थिति यह है की विज्ञापन के हिसाब से रिपोर्ट छप रही है यह किसी एक अख़बार की बात नही है बल्कि छोटे - बड़े सभी अख़बार इसमे शामिल है । एक बार मैं किरयाने की दुकान पर लैफ्बोय साबुन खरीदने चला गया, लाला से बोले लैफ्बोय साबुन दे दो, लाला ने दुकान मे काम करने वाले लड़के से बोले, बाबु इन्हे साबुन दे दो । लड़का लैफ्बोय साबुन के जगह लक्स साबुन ले आया, लाला की आँखे लाल पीली हो गई । लाला बोले पैसा लिया है ततो लैफ्बोय साबुन ही दो । अब आप कहेंगे की लाला के दुकान की लैफ्बोय साबुन आऔर् अख़बार से क्या सम्बन्ध ? बहुत बड़ा सम्बन्ध है मेरे भाई । जरुरत है ततो सोचने की , सोचो ........... मैं माफी चाहूँगा की अभी भड़ास पर मुझे हिन्दी ठीक से लिखना नही आया है , धीरे - धीरे सीख जाऊंगा .......


sethjournalist007@gmail.com

1 comment:

rohit sidhu said...

kya khub kahi mahabir seth ji. ap ne patrkarita ke marm ko kya khub jana hai. sach mai hum kush bi likne ka daba to karte hai lekin hume lala ki lal ankhe dikha kar rok diya jata hai hum cah kar bi kush apni mrgi se nai likh sakth. bohi likhna hoga jo lala chahte hai. samacharpatra sahi mai kiryane ki dukan se jyada kush nai rahi hai.