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24.5.08

खरी-खोटी दोहों की जुबानी-2

- कुमार शैलेन्द्र

दिल छलनी, मन बैठता, घायल जब अहसास,
तब कुछ कर दिखलाएगी, निकली हुई भड़ास।

भारत साठों साल से तीन टांग पर हुंह,
चौथा खंभा लोक को लगे चिढ़ाता मुंह।

महंगाई की आग में घी, डीजल-पेट्रोल,
मुंह मिट्ठू सरकार की खुल जायेगी पोल।

थपकी अपनी पीठ पर, कानों में दे तेल,
राजनीति की कुर्सियां, करें घिनौना खेल।

चिन्दी चिन्दी हो रहा गांव, गरीब, गंवार,
पांच साल उपलब्धि के, गिना रही सरकार।

गांधीजी के बंदरों, मत कर भ्रष्ट मिजाज,
कसमों-सपनों की जरा, कुछ तो रख लो लाज।

पैसा जब से हो गया, इस युग का भगवान,
स्वर्ग नर्क सा हो गया, मनुज बना हैवान।

ऊंचे-ऊंचे हो रहे शहर अमीर-अमीर,
गांव-गरीबी द्रौपदी, झोपड़ियां है चीर।

लेने में आता मजा, मुट्ठी में कानून,
हिंसक कुत्ते चाटते, भारत मां का खून।

सत्ता सुख में तैरना, सच या बड़ा कमाल,
खोल पाता आंख भी, मुंह खोले घड़ियाल।

2 comments:

डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...

मिथिलेश भाई,भड़ास के नवकबीर को हमारी तरफ से आदर दीजिये...

रजनीश के झा said...

कुमार शैलेन्द्र को बधाई.