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15.5.08

इंसानों का नहीं , इंसानियत का क़त्ल-ऐ-आम


इंसान को बोलने वाला जानवर कहा जाता है. लेकिन जो खूबी(गुण) इंसान को मख्लूकों में अशरफ (जानदारों में सर्वश्रेष्ठ ) यानी अशरफुलमख्लूकात बनाती है और फरिश्तों से भी अफ़ज़ल (श्रेष्ठ) करार देती है वो है गुनाह की हिस रखते हुए भी गुनाह करने की ताक़त .

सच तो ये है कि इंसान अगर ख़ुद को पूरी तरह काबू (कंट्रोल) में रखे तो उस से ज्यादा ताक़तवर कोई नही.

लेकिन बड़े अफ़सोस की बात है कि यही इंसान आज बेकाबू है और इसी खराबी ने उसे बे इन्तेहा कमज़ोर कर दिया है .तह्ज़ीबी अखलाकी गिरावट ने उसे ज़लील--ख्वार कर रखा है कि कभी कभी तो उसकी स्याह (काली) करतूतों के सामने दरिंदों या वहशी जानवरों की मिसाल (उदाहरण) देना जैसे उन बेजुबानों की तौहीन(बेईज्ज़ती ) महसूस होती है।

क्या कर रहा है इंसान?

अपने ही जैसे इंसानों को खाता जा रहा है. जयपुर में जो कुछ हुआ वो तो महेज़ (सिर्फ़) वहशतों की एक छोटी सी तस्वीर है. ऐसी खूनी तस्वीरें ,ऐसे मंज़र हर दूसरे दिन इंसान देखने और सुनने पर मजबूर है.

खुदा ही जाने कि ताबीर-ऐ-ख्वाब क्या निकले

हवा के दोष(कन्धों) पे देखा है रक्स(नाच) शोलों का

मासूम बेगुनाहों की मौत अन्दर तक आग भर देती है.दिल कहीं अन्दर से फूट- फूट कर रोता है. शायद खबरें देने वालों के लिए ये ख़बर पुरानी पड़ गई हो लेकिन उन दिलों का क्या करें जो अन्दर से खाली और वीरान हो गए हैं, उन आंखों का क्या करें जिन के आंसू थमने का नाम ही नही ले रहे।

लाशें चाहे जयपुर की हों या मुम्बई की , खून से लत पथ चेहरे मालेगाँव के हों या बनारस के .वो सारे चेहरे हिन्दुस्तान से भी पहले इंसानों के थे .

सरहदों से निकल कर देखें तो भी मंज़र वही होता है. दिल वैसे ही रोता है. झुलसे हुए वो वजूद इराक के हों या अफगानिस्तान के, बेनूर आँखें फिलिस्तीन की हों या पाकिस्तान की , चेचनिया की हों या अमेरिकन , हर लाश इंसान की होती है . हर खून इंसानियत का होता है. वो खून जिसका ना कोई मज़हब है जिसकी कोई सरहद है , कोई कौम है फिरका . खून गोरे का हो या काले का, हिंदू का हो या मुसलमान का ,हिन्दुस्तानी हो कि पाकिस्तानी, इराकी हो या फिलिस्तीनी , ये सुर्ख(लाल) ही होता है . इसका रंग एक है जो चीख चीख कर कहता है कि ये इंसानियत का क़त्ल है हम इंसान हैं तो दूसरे इंसान की मौत हमारी मौत है.
एक खुदा के सब बन्दे हैं, एक आदम की सब औलाद
तेरा मेरा खून का रिश्ता, मैं सोचूं , तू भी सोच
मैं जानती हूँ कि बहुत सारे सियासतदान इन बेगुनाहों की लाशों में भी अपनी सियासत की ठंडी पड़ चुकी रोटियाँ गरम करने की खुशबू महसूस कर रहे होंगे. लेकिन मेरी इल्तेजा(विनती) है उन लोगों से, कि खुदा के लिए इसे किसी मज़हबी या इलाकाई चश्मे से मत देखिये. अपने जैसे इंसानों की लाशों पर सियासत मत कीजिये, ये ना किसी एक पार्टी की हार है दूसरी की जीत .ये इंसानियत की हार और वहशियों की जीत है , जिस तरह इंसानियत का कोई मज़हब नही होता कोई जात नही होती उसी तरह वशियों और दहशत गर्दों का भी कोई मज़हब नही होता . उन्हें तो बस इंसानियत के खून का चस्का लग गया है. वो हमारी कमजोरी जानते हैं इसी लिए कभी जुमा के दिन इंसानों का खून बहाते हैं, कभी मंगल के दिन.

दिलों को बाँट कर हँसते खेलते मुल्क में अफरा तफरी का माहौल पैदा करना ,देश की मज़बूत जड़ें खोखली करना उनका एक मात्र मकसद होता है. उन्हें किसी मज़हब या कौम से क्या सरोकार.
अब ये हमारा फ़र्ज़ है कि हम सब एक होकर उन वशियों को ऐसी सज़ा दें कि दुबारा ये इंसानियत को दागदार करने का तसव्वुर भी कर सकें.

2 comments:

Anonymous said...

रक्षंदा जी,

बड़ा संजीदा है ये, और सच भी, हम और आप कुछ भी कर लें इंसानियत को भट्ठी बना कर उस पर राजनितिक रोटी सेंकने वाले जयपुर पहुंचने लगे हैं आगामी विधान सभा चुनाव जो करीब है. ये वो लोग हैं जिन्हें राजनीति, सत्ता, कुर्सी,पद, पैसा के अलावे कुछ दिखता ही नहीं. इंसान इनके लिए वोट देने वाली मशीन मात्र है. और लोग भी रोजमर्रा से अलग नहीं, जो हैं वो हम और आपके जैसे भडासी हैं. कसम भडास की हम अपनी जिम्मेदारियों से ना हटें और मानवता के, मानवता से जुडे मूल्यों के रक्षा के लिए एकजुट प्रयत्न करें.
परिणाम पक्ष में ही होगा.

जय जय भड़ास

डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...

मैं आपसे सजा के मामले में सहमत नहीं हूं। इस बारे में मैं पहले भी लिख चुका हूं कि क्यों हम उस ओर नहीं देखते कि दहशगर्दी का बीज क्यों पनप रहा है हर तरफ? जिन्हें इंसानियत के खून का चस्का लगा बता रही हैं आप वे पैदाइशी दहशतगर्द नहीं हैं न ही हैवान वे भी मेरी और आपकी तरह इंसान हैं। जरूरत है कि हमें ये समझने की कोशिश करें कि क्यों कोई दस साल की लड़की ए.के.४७ थाम लेती है या मानव बम बनने पर राजी हो जाती है जबकि हमें अगर एक खरोंच भी लग जाए तो रोते फिरते हैं....