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24.5.08

हो चुकी है कमजोर दीवारें पलको की ...अब तो एक लहर से भी तूफ़ान का अंदेशा है


सपनों में ही जिनें वाला मन.......
मिलने कि आस मे तरसता हुआ मनसपने संजोता आंखो से बरसता हुआ मनकभी धुप कभी छांव को सहता हुआ मनपांव के छालो सा रिसता हुआ मनतनहाईयों मे खुशियो के मेले लगता मनमिलन कि आरजु मे उसके घर के फेरे लगता मनचेहरे पर ना जाने क्युं, चेहरे लगाता मनइक उसी को पाने खातीर गमों को गले लगता मनरुह को उसके आने की आहट सुनाने वाला मनखुली बंद आंखो से निहारते रहने वाला मनपलों के इंतिजार को सदियां कहनें वाल मनहर पल इक नयी गज़ल गुनगुनानें वाला मनअश्कों से गमों का दामन भिगोनें वाल मनतेरे अनकहे सवालों क जवाब खोजनें वाला मनतेरे ज़ानों मे ता उम्र की खुशी चाहनें वाला मन

2 comments:

डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...

भाई भटके हुए, ये हिन्दुस्तान को भटक-भटक कर अचानक रोमान्स की गली में घुसा ले गए... क्या बात है रूमानी हो चले हो कुछ दिनों बाद शायरी करोगे और गज़ल लिखोगे आसार नजर आ रहे हैं...

रजनीश के झा said...

दोस्त अच्छा लिखा है.