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5.5.08

इंतज़ार

कर पाओगी इंतज़ार.....

कर पाओगी इंतजार उस वक्त का,
जब सूरज टंग जायेगा
एक खूंटी पर तुम्हारे कमरे के,
जब तुम कसमसाओगी,
कि चल के देखूं तो बिना बैसाखी के
जब तुम्हारी पत्थर जैसी आंखे,
रोटी और चूल्हे के उस पार देखेंगी
जब तुम्हारे जन्मों से सिले होंठ,
बुदबुदाने के लिये तडपेंगे,
सोचो तो.......
कर पाओगी इंतज़ार......उस वक्त का

.......आलोक

4 comments:

VARUN ROY said...

बहुत अच्छी कविता आलोक जी .
भगवान् का शुक्र है कि अब हमारे
देश की महिलायें भी रोटी और चूल्हे से इतर
देखने लगी हैं.
वरुण राय

डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...

आलोक भाई,बड़ी ही गरिष्ठ किस्म की साहित्यिक कविता है लेकिन अक्सर पुष्टिकारक चीजें गरिष्ठ होती है.....

Anonymous said...

अलोक जी,
अच्छी है, भाव भी बेहतरीन है और सच है
कि इन्तेजार ..........
कोन करेगा.
जो भी हो अच्छी बन पड़ी है.

अबरार अहमद said...

बहुत गहरे तक ले गए आलोक भाई आप तो। बधाई