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29.5.08

अगर तुम्हें जेल की पथरीली दीवारों के अंदर रख दिया जाए जो एकदम बहरी होती हैं, और एक फुसफुसाहट तक भीतर नहीं आने देतीं, तब भी तुम्हें कुछ फर्क नहीं पड़ेगा

सबद...


मेरे दोस्त और युवा लेखक-पत्रकार अनुराग वत्स ने एक बहुत अच्छा ब्लॉग बनाया है । मैंने रिल्के पर राजी सेठ की की यह टिप्पणी वही से उठाई है । आप भी पढिये , मजा आएगा और हाँ , ऐसी चीजें और पढ़ना चाहें टू अनुराग ब्लॉग का चक्कर लगाएं -http://www.vatsanurag.blogspot.com/


हरे प्रकाश उपाध्याय



रिल्के पर राजी
(सबद उन लेखकों के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करता है जिन्होंने इसे अपनी रचनाओं के प्रकाशन के लिए उपयुक्त स्थान माना और शीघ्रता से अपनी रचनाएँ उपलब्ध कराई। लेखकों की रचनाओं के प्रकाशन की शुरुआत हमने वरिष्ठ कवि कुंवर नारायण की कविताओं से की थी। अब इसी क्रम में हमें हिन्दी की वरिष्ठ कथाकार राजी सेठ का सहयोग प्राप्त हुआ है। राजी का रिल्के प्रेम जग ज़ाहिर है। उन्होंने जितनी लगन और काव्यात्मक सूझबूझ से महान जर्मन कवि रिल्के को हिन्दी में गृहस्त बनया है वह अपने-आप में प्रतिमान सरीखा है। उनका रिल्के के पत्रों का अनुवाद पुस्तकाकार प्रकाशित-प्रशंषित हो चुका है। यहाँ हम रिल्के पर लिखा उनका लेख पहली दफा छाप रहे हैं।)
अंतरालों का अन्वेषक - रिल्के
एक अच्छी कविता लिखने के लिए तुम्हें बहुत से नगर और नागरिक और वस्तुएं देखनी-जाननी चाहिए। बहुत से पशु और पक्षी ...पक्षियों के उड़ने का ढब , नन्हें फूलों के किसी कोरे प्रात: में खिलने की मुद्रा , अज्ञात प्रदेशों ...अनजानी सड़कों को पलटकर देखने का स्वाद। अप्रत्याशित से मिलन। कब से अनुमानित बिछोह। बचपन के अनजाने दिनों के अबूझ रहस्य , माता-पिता जिन्हें आहत करना पड़ा था , क्योंकि उनके जुटाए सुख उस घड़ी आत्मसात नहीं हो पाए थे। आमूल बदल देनेवाली छुटपन की रुग्नताएं। खामोश कमरों में दुबके दिन। समुद्र की सुबह। समुद्र ख़ुद। सब समुद्र । सितारों से होड़ लगाती यात्रा की गतिवान रातें। नहीं , इतना भर ही नहीं । उद्दाम रातों कि नेह भरी स्मृतियाँ ...प्रसव पीड़ा में चीखती औरत । पीली रोशनी । निद्रा में उतरती सद्य: प्रसूता । मरणासन्न के सिरहाने ठिठके क्षण । मृतक के साथ खुली खिड़की वाले कमरे में गुजारी रात्रि और बाहर बिखरा शोर ।
नहीं, इन सब यादों में तिर जाना काफी नहीं ; तुम्हें और भी कुछ चाहिए ....इस स्मृति -सम्पदा को भुला देने का बल । इनके लौटने को देखने का अनंत धीरज .....जानते हुए कि इस बार जब वह आएगी तो यादें नहीं होंगी । हमारे ही रक्त ,मुद्रा और भाव में घुल चुकी अनाम धप-धप होगी , जो अचानक ,अनूठे शब्दों में फूटकर किसी घड़ी बोल देना चाहेगी , अपने आप ।
यह रिल्के है। इन पंक्तियों को जब पढ़ा था तो यह बात ज्ञात नहीं थी। किसी पत्रिका में छपे एक लेख में एक उद्धरण कि तरह ये पंक्तियाँ पढ़ने में आई थीं। पंक्तियों ने इतना उद्वेलित किया था कि लगभग अभिमंत्रित-सी स्थिति में मैंने इसका बरबस अनुवाद कर डाला था। एक आंतरिक लय जैसी अनुवाद में स्वत: गुंथती चली गई थी। तब यह भी ज्ञात नहीं था की यह के रिल्के एकमेव उपन्यास का कोई खंड है, कविता नहीं । उसी समय याद आया कि एक बार पहले भी ऐसे अनुभव से गुजरना हो चुका है। रिल्के के शब्दों की टंकार ऐसी ही प्रतिक्रिया जगा चुकी है। वर्षों पहले किसी यात्रा में सहयात्री द्वारा पढी जाती गुजरती पत्रिका और उस लेख में अंग्रेजी में उधृत ये पंक्तियाँ जिसका अर्थ कुछ-कुछ ऐसा था कि धीरे-धीरे डूब रहा हूँ अपने ही घाव में जो कभी नहीं भरते, इसलिए खड़ा रहता हूँ अपने ही रक्त में। रक्त स्नात यातना में...पंक्तियों का क्रम उतना याद नहीं, प्रतिक्रिया याद है। लगा था, संवेदन की सघनता ने आवेग को इतना प्रवाही बना दिया है कि पाठक के मन में प्रवेश कि सुविधा एकाएक उपलब्ध हो गई है।
दोनों उद्धरणों को साथ रख कर देखने में एक अजीब विरोधी-सी अनुभूति हुई थी। एक में अनुभव की समावेशिता का इतना निरंकुश आग्रह, दूसरे में अपने ही घावों में डूबे रहने की आत्मरत नियतिबद्ध पीड़ा। कौन-सा रिल्के सच है ? तब इस बात पर ध्यान नहीं गया था कि पंक्तियाँ नहीं पकड़ रहीं (क्योंकि पंक्तियाँ तो लेखक के पास अनंत होती हैं और उनमे से 'कुछ' में सारा सत्वा समाया नहीं होता), पंक्तियों के पीछे की उत्कटता पकड़ रही है, जो रिल्के का अकाट्य यथार्थ है। उत्कटता रिल्के के लिए अनिवार्य है। वही उसकी सघनता का आत्मीय आयाम है। वह जब भी कुछ कहने को उद्हत होता है, उसी मनाग्रता को छूने के लिए लपकता है, जहाँ आवेग अपनी सृष्टि का पूरापन रच सके। अपनी ऊर्जा से उसका आदि-अंत ढूंढ ले। उसका बाहरी यथार्थ से कोई संबंध हो या न हो. शायद इसीलिए यथार्थ की वास्तविकता यहाँ अलग किस्म की है।
अपने यथार्थ की विराटता का भी हमें ज्ञान होना चाहिए। अब तक की अजानी लगभग हर चीज को उस ज्ञान में शामिल होना चाहिए। अंतत: हमें अपने भीतर इसी प्रकार के साहस की ज़रूरत है - अजनबी, असाधारण, अव्याख्येय अनुभवों का सामना करने का साहस। जीवन को समझने के लिए लोगों की तंगदिली ज़्यादा बाधक होती है।
रिल्के के आतंरिक रुझानों की बात तब ज़्यादा स्पष्ट हुई जब रिल्के की एक छोटी सी पुस्तक पढने का अवसर मिला। पुस्तक का नाम था- लेटर्स टू अ यंग पोएट। इस पुस्तक ने रिल्के की संवेदना के चरित्र को अदबदाकर खोल दिया। यह पुस्तक रिल्के के दस पत्रों का संकलन है जो मिलिट्री अकादमी (जहाँ स्वयं रिल्के की दीक्षा हुई थी), में दीक्षारत एक युवक फ्रान्ज़ जेवियर काप्पुस को लिखे गए थे। वस्तुतः काप्पुस कवि बनने का आकांक्षी था और अपनी कविताओं पर कवि की राय जानना चाहता था। इस सन्दर्भ में पत्राचार चार वर्षों (१९०३-१९०८) तक का लंबा सिलसिला चल निकला। उन दोनों की भेंट कभी नहीं हो पाई थी। यह बात उल्लेखनीय है कि तब रिल्के की आयु सत्ताईस वर्ष और काप्पुस की बाईस वर्ष थी। उस आयु में जैसी तीव्र परिपक्व विराटोन्मुख तड़प के दर्शन हुए हैं, वह असाधारण है। रचनात्मक साहित्य के प्रारूपों में जो समानुभूति रुक-रुक कर व्याख्या करते उद्घाटित होती है, वह यहाँ सीधे प्राप्त हो गई है। इसका एक कारण तो पत्र विधा की हार्दिकता है। दूसरा, इस पुस्तक में काप्पुस के पत्र शामिल नहीं हैं, अतः रिल्के की मानसिकता का शुद्ध रूप पाठक को उपलब्ध हो गया है। यह निर्बाध उद्वेलन उसके निहायत जटिल, दुरूह और उद्दीप्त रचानारूपों से अलग किस्म का नहीं है। इनसे गुजरते समय ऐसा लगता है कि संदर्भ का सहारा पाते ही रिल्के अपने आप से बोलने लगता है। प्रश्न का छोटापन उस संबोधन में पिचक कर रह जाता है। उत्प्रेरित रचना की एक स्मृति चित्त में रह जाती है जो अपनी उत्कटता के चलते पवित्र और खरा प्रभाव छोड़ती है। इन पत्रों में रिल्के अपने ही रक्त की रिसती बावड़ी में खड़ा दिखाई देता है। चूँकि सृजनात्मकता का मुद्दा केन्द्र में है, इसलिए वह उस आत्यान्तिकता तक गया है।
एक ही काम है जो तुम्हें करना चाहिए - अपने में लौट जाओ। उस केन्द्र को ढूंढो जो तुम्हें लिखने का आदेश देता है। जानने की कोशिश करो कि क्या इस बाध्यता ने तुम्हारे भीतर अपनी जड़ें फैला ली हैं ? अपने से पूछो कि यदि तुम्हें लिखने की मनाही हो जाए तो क्या तुम जीवित रहना चाहोगे ?...अपने को टटोलो...इस गंभीरतम ऊहापोह के अंत में साफ-सुथरी समर्थ 'हाँ'' सुनने को मिले, तभी तुम्हें अपने जीवन का निर्माण इस अनिवार्यता के मुताबिक करना चाहिए।
या फिर
अगर अपना रोज का जीवन दरिद्र लगे तो जीवन को मत कोसो। अपने को कोसो। स्वीकारो कि तुम उतने अच्छे कवि नहीं हो पाए कि अपनी रिद्धियों-सिद्धियों का आह्वान कर सको। वस्तुतः रचियता के लिए न दरिद्रता सच है, न ही कोई स्थान निस्संग। अगर तुम्हें जेल की पथरीली दीवारों के अंदर रख दिया जाए जो एकदम बहरी होती हैं, और एक फुसफुसाहट तक भीतर नहीं आने देतीं, तब भी तुम्हें कुछ फर्क नहीं पड़ेगा। तुम्हारे पास बचपन तो होगा...स्मृतियों की अनमोल मंजूषा...एकांत विस्तृत होकर एक ऐसा नीड़ बनाएगा, जहाँ तुम मंद रोशनी में भी रह सकोगे।
यह सब कह कर रिल्के उद्गमों की जांच-पड़ताल और शुद्धता की बात करता है।लेखन कर्म में जुड़ी मंशाओं की आत्मलोचक चीर-फाड़। यह निर्ममता रिल्के में खूब है। जो कुछ उसने इस पुस्तक के माध्यम से कहा है वह आज से पहले कभी इतना ज़रूरी नहीं लगा क्योंकि छपने के साथ- साथ अमरता की महती इच्छा लेखकों की बड़ी जमात को ग्रस चुकती है। पर ऐसा लगता है, इन पत्रों में रिल्के सृजनकर्म की आध्यात्मिक सरहदों को टटोल रहा है।आध्यात्मिक शब्द का इस्तेमाल आज के बौद्धिक समाज में खतरे से खली नहीं है। हाल ही में एक आलोचक ने साहित्य में आध्यात्मिकता की बात उठाकर सुधी जनसमूह को बर्रे की छत की तरह छेड़ दिया था, पर आध्यात्मिकता भी और सब शब्दों की तरह एक शब्द है - एक निर्मूल्य वाहक। वह हर क्षेत्र को उपलब्ध है।उसकी संदर्भवत्ता उसके इस्तेमाल में है।साहित्य में इस शब्द के इस्तेमाल से बनी लचीली विराट और निहायत निजी ज़मीन है।अतिक्रमण द्वारा जिस स्थूल और प्रकट सरहदों को हम लांघने की बात करते हैं, वह आध्यात्मिकता है।जिस अनुमानिता से लड़ते रह कर हम नए विधागत या भाषागत प्रयोगों में उतारते हैं, वह भी साहित्य की है।जिस विवेक से हम वाग्जाल में से वांगमय की तलाश करते हैं वह भी साहित्य की आध्यात्मिकता है। यह कोई धार्मिकता नहीं है कि धर्म-निरपेक्षता को परिभाषा देने के लिए दूसरे छोर की तरह काम आए। इस पहलू पर विचारणीय मात्र इतना है कि अदृश्य की परिसीमा को महसूस कर पाना क्या सृजनकर्म की अपनी ही कोई अवस्था है या लेखक के अपूर्व संवेदन का कोई असाधारण गुण ? रिल्के को लेकर यह प्रश्न हमारे सम्मुख एकदम तीव्रतम बना रहता है। एकांत और विराटता रिल्के जैसे रचनाकार के लिए एक ही सीध में खड़े हैं। एकांत नकारात्मक नहीं, विराट और समावेशी है। वह अकेलापन या निस्संगता भी नहीं, अपने चैतन्य का गहरा आभास है।अपनी पूर्णता को पाने के लिए अनुपस्थिति का विराट अनुभव : एकांत को अपने भीतर ज़ज्ब होने दो फ़िर कभी तुम्हारे जीवन से नहीं होगा। एक सतत सुनिश्चित अंतर्वाह की तरह तुम्हारे भीतर प्रवाहित रहेगा जैसे हमारे रक्त में घुल-मिल चुका हमारे पुरखों का रक्त...रिल्के का एकांत एक ऐसे निर्दोष,सक्रिय,शांत असीम को पाने का है जहाँ उन चीजों का दखल न हो जो बनते हुए विजन को छोड़ सकें। उसकी हर चिंता, चिंतन के दौरान दूर जाते हुए उसी एक अनिवार्यता तक लौटती दिखती है।प्रेम की परिभाषा भी यहाँ इस रूप में है : जहाँ दोनों एकांत सुरक्षित रहते हुए भी एक-दूसरे का अभिनन्दन कर सकते हों।
शायद यही कारण रहा हो की रिल्के का अपना एकांत सबंधात्मक जीवन सदा तनाव में रहा।१९१० में क्लैरा से उसका विवाह दो वर्ष से अधिक नहीं चल पाया।एक निस्संग साधक और उत्कट प्रेमी उसके भीतर विरोधी स्थिति में मौजूद रहे।यों देखा जाए तो रचनाधर्मी के लिए यह प्रश्न आज भी उतना ही अनिर्णीत है।इतने छोटे कलेवर में इतनी सघन बातों का संदर्भ बार-बार इसी के निकट ले जाता है कि इन्हें लिखनेवाला आत्मसंबोधन की किसी हार्दिक स्थिति से गुजरता हुआ अपने कर्म की सत्ता और सार्थकता को तलाश रहा है।रिल्के, केवल ५१ वर्ष जिया (१८७५-१९२६, जन्म : प्राग)।उसका बचपन अवसादमय था और उसे आर्थिक संगर्ष भी झलने पड़े।बाद के दिनों में वह अद्वितीय शिल्पी रोदां का घनिष्ठ बना।आजीवन रिश्तों और रचनाओं के बीच लहुलुहान होता रहा।उजाले की हर सतह को छेदती उसकी रचनात्मकता, विराट को मनुष्य की भासा में छू लेने की उसकी उत्कटता...यह सब उसे उस पाए का रचनाकार बनता है जिसका अवतरण भाषा में कभी-कभार ही सम्भव हो पता है।

1 comment:

रजनीश के झा said...

हरे दादा,
बेहतरीन है, अनुराग भाई को बधाई.