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24.5.08

क्या आप अनुभव माथुर को जानते हैं...

इस सवाल का जवाब ज्यादातर लोग न में ही देंगे, वजह वही पुरानी अनुभव कोई सेलेब्रिटी नही है..मेरा दोस्त है..और हमारी पीड़ी के उन प्रतिभा शाली लोगों में से है..जिन पर एक गर्व करने की कई वजहें हैं...वैसे इन जनाब का थोड़ा परिचय देते चलूँ...देश के बेहतरीन मीडिया संस्थान..आई आई ऍम सी के अंग्रेजी पत्रकारिता के प्रमुख और अपने समय के प्रतिभाशाली पत्रकारों में से एक प्रदीप माथुर साहब के सुपुत्र है और जामिया मिल्लिया से पत्रकारिता में डिग्री होल्डर हैं..जिन प्रदीप माथुर सर की एक कॉल पर नौसिखिये पत्रकारों की नौकरी लग जाती है और दिग्गज पत्रकार जिस इंसान के पैर छूकर ख़ुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं..उस इंसान का बेटा होने के बावजूद अनुभव ने कभी अपने पिता से ख़ुद को नौकरी दिलाने के लिए एक शब्द नही बोला..पत्रकारिता अपनी शर्तों पर करना चाहता था येः इंसान और बेहतर करने के लिए पत्रकारिता में आना चाहता था...जज्बा देखिये इस इंसान का की पिल्पिले पत्रकारों की फौज का हिस्सा बन जाने की बजाय अनुभव ने नए पत्रकारों को पदाने का फ़ैसला किया आज इस इंसान के खाते में देश के टॉप ५० कॉलेज में पदाने का अनुभव है और इस समय अनुभव मलयेसिया के प्रमुख कॉलेज के पत्रकारिता विभाग के छात्रों को तैयार करने में जुटे है...येः तोः रहा अनुभव के अनुभव का छोटा सा इतिहास....
दरअसल अनुभव का जिक्र करने के पीछे वजह सिर्फ़ इतनी है की आज देश की पत्रकारिता के हाल पर बस यूँही दो आंसू बहाने का मन कर रहा था ...तोः सोचा इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है पत्रकारिता के दुर्भाग्य का....की एक बेहतरीन पत्रकार का मन पत्रकारिता के सूरत-ऐ-हाल से इस कदर उचाट हुआ की उसने इस पेशे को दूर से ही सलाम करना बेहतर समझा...दरअसल यही त्रासदी मेरे कई नौजवान और काबिल साथियों की है...सबको पता है की उनके आने से पत्रकारिता का भला होगा...कुछ बेहतर लोग आयेंगे तोः यकीनन पत्रकारिता का वर्तमान रूप बदलेगा..लेकिन त्रासदी यही है की अनुभव और उस जैसे तमाम योग्य नौजवान पत्रकारिता की मौजूदा हालत से इस कदर दुखी हैं की वोः अच्छे पत्रकार के सारे गुन होने के बावजूद पत्रकारिता के पेशे को नही अपनाना चाहते..सच येः भी है की अच्छे पत्रकार चाहिए किसको...मुझे बहुत अच्छी तरह याद है आज के सबसे नामी पत्रकार की बेहद अक्षम और अयोग्य बहन के साथ काम करने का दुर्भाग्य...कैसे वो महान महिला ख़बरों की माँ-बहन करती और चैनल हेड से लेकर हर कोई खबरों को लेकर उस वीरांगना की सोच पर सर पकड़कर बैठते थे आज वही वीर महिला अपने भाई के साथ ख़बरों की दुनिया में कमाल दिखा रही है....ये हाल हर कहीं है...काबिल लोगों ने या तोः पलायन कर दिया है या फिर ख़बरों की दुनिया में उनकी दिलचस्पी न के बराबर है...किसी ने मुझसे कहा था की पत्रकार बन
जाने के लिए बहुत योग्यता की जरूरत नही होती...आज उस इंसान की बात बेहद सही लगती है...पर इन सब के बीच अनुभव तुम्हारी याद बहुत आ रही है दोस्त...फ्रेम को लेकर..आइडिया को लेकर और ख़बरों को लेकर तुम्हारी समझ का मैं तोः क्या कोई भी कायल होता..आज तुम पत्रकारिता में होते तोः वाकई देश को एक बेहतरीन टी वी पत्रकार मिला होता ..पर अफ़सोस तुम जैसे काबिल इंसान की जरुरत हमारे यहाँ नही है...तुम मेरे दोस्त थे इस नाते इतना सब नही कहा मैने....सिर्फ़ अफ़सोस इस बात पर होता है की अगर तुम होते तोः वाकई टी वी देखने में मजा आता...यार मीडिया से तुम्हारा मन इतना उखडा की तुमने देश ही छोड़ दिया..तुम जरूर वहाँ बेहतर कर रहे होगे और जल्द ही तुम अमेरिका में पत्रकारों को प्रशिक्षित करोगे जैसा की तुम्हारी यौजना है लेकिन इस बीच हम क्या खोयेंगे और टी वी क्या खोयेगा इसका दर्द मुझसे बेहतर कौन जान सकता है दोस्त...मुझे मालूम है की तुम्हारे बारे में कोई नही जानता..लेकिन मैं जानता हूँ..अपनी जमात में तुम्हारे न होने का मतलब...मेरे पास सिर्फ़ अफ़सोस के कुछ नही है...बस तुम्हारा होना इतना दिलासा देता है की..एक दिन तुम दुनिया घूमकर आओगे और मीडिया तुमसे बहुत कुछ लेने के लिए तैयार खड़ा होगा....और तुम उसी बेसाख्ता हँसी के साथ हाथ फैला दोगे अपने नए दायित्य को गर्मजोशी के साथ सीने से लगाने के लिए...वोः दिन आएगा...जल्द ऐसी उम्मीद मुझे है..येः उम्मीद ग़लत भी तोः नही है मेरे दोस्त...फिर हम नई जे जे और सोनू के पीछे लगेंगे और नए आइडिया खोजेंगे...
तुम्हारा नालायक दोस्त
हृदयेंद्र
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2 comments:

डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...

आओ ठाकुर,बड़े दिनो बाद आये हो लेकिन अकेले नहीं आये साथ में जय को लाये हो बीरू किधर है... :)

रजनीश के झा said...

भैये हृदयेंद्र,
ये ही तो त्रासदी है हमारे मीडिया का, साले चवन्नी छाप लोग लालाओं को तेल लगा कर ऊँचे ऊँचे ओहदे को कब्जा बैठे, तेल लगाने की हुनर इतनी ज्यादा की पत्रकारिता की चध्ही तक खोल कर फेंक दी और बड़ा ही गोर्वान्वित महसूस करते हैं की ये ठुके हुए पत्रकारिता के सरताज हैं. सालों छोरो अपनी जगह क्योँकी तुम्हारे पैबंदों को सीने के लिए युवा तुर्कों की फौज तैयार है और इन्हें विरासत में अपनी तेल लगाने की हुनर से मत नवाजो.
जय जय भडास