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24.5.08

मेरा पहला साक्षात्कारः और मैं हारे हुए जुवारी की तरह दफ्तर से निकल आई

प्रतिभा कुशवाहा पत्रकार हैं, बड़ा पत्रकार बनने का सपना लेकर दिल्ली आई हुई हैं, स्ट्रगल कर रही हैं, दिल्ली को सीख रही हैं, दिल्लीवालों समझ रही हैं, तरह तरह के खट्टे- मीठे अनुभवों के जरिए अपनी सोच समझ को विस्तार दे रही हैं।

वे उन आम हिंदी पत्रकारों की तरह ही हैं जिनका पत्रकारिता में कोई गाडफादर नहीं है, कोई चाचा, पापा काका या भाई संपादक नहीं है।

जो कुछ करना है, खुद से करना है। जो कुछ पाना है, खुद की मेहनत से पाना है। सेल्फ मेड हैं प्रतिभा।

उन्होंने मुझे एक मेल भेजकर इस रचना को भड़ास पर डालने का अनुरोध किया है। वे इस रचना को व्यंग्य रचना बताती हैं पर मुझे तो ये हिंदी पत्रकारिता का सच नजर आता है। पढ़िए और प्रतिभा का साहस बढ़ाइए ताकि दिल्ली के दुखों को जल्द पारकर एक ठीकठाक मुकाम तक पहुंच जाएं।

-यशवंत

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मेरा पहला साक्षात्कार
-प्रतिभा कुशवाहा-

पत्रकार बनने का भूत सवार हुआ। सभी ने मुझे बहुत समझाया-पत्रकारिता में क्या रखा है, भूखे मरने की नौबत आ जाएगी। लेकिन मैने पूरे जोश से पैरोकारी की समाज सेवा की दुहाई दी। बड़े से बड़े पत्रकारों के नाम लिए लेकिन सब बेकार आखिर मैने भी मूढ़ लोगों की बात न मानते हुए बगावत का बिगुल बजा दिया और झटपट पत्रकारिता के क्षेत्र में टांग अड़ा दी।

पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी करने के बाद जंगे मैदान में आ डटी। मैने अपनी कलम चारों दिशाओं में भांजी और कहा अब समाज के दुश्मनों की छुट्टी हो जाएगी और पूरे जोश के साथ पत्रकारिता के मदिंरों (समाचार पत्र के दफ्तरों) में माथा टेकने लगी। प्रसाद और आर्शिवाद की उम्मीद लिए मुझे कही-कही दर्शन मिलना भी मुश्किल हो गया।

परेशान होकर मैने अपने कुछ पत्रकार मित्रों (जो अब तक पत्रकार रूपी जीव बन गए थे)से सम्पर्क साधा, पूछा- बंधुवर! ये बताइए कि मुझे कब इन समाचारायल में प्रवेश मिलेगा?

मेरी बात सुनकर वे थोड़ा मुस्कराएं, फिर सगर्व बोले- तुम्हारी कोई जान पहचान है?

इस प्रश्न पर मुझे आश्चर्य कम गुस्सा अधिक आ रहा था क्योकिं मेरी पुश्तों में किसी ने पत्रकारिता का नाम तक नहीं सुना था और ये परिचय की बात कर रहे हैं। अत: मैने ‘न’ में सिर हिलाया।

इस सिर हिलाऊ उत्तर पर उसने भी फिल्मी डाक्टर की तरह आजू-बाजू सिर हिलाकर बोले-‘तब तो तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता’। और मै मनमोहन सिंह की तरह खून का घूट पी कर रह गयी।

खैर, इस घटना के बाद मै बिल्कुल निराश नहीं हुयी और एक राजनीतिक पार्टी की भातिं मैने तुरंत दावा किया कि इस बार मेरी ही सरकार बनेगी। और पूरे जोशोखरोश के साथ अपने अभियान में लग गयी। आखिर एक दिन मोनालिसा की मुस्कान मेरे चेहरे पर आ गयी क्योंकि काफी जद्दोजहद के बाद मुझे एक मंदिर में दर्शन के लिए बुला लिया गया। मै पूरे साजो-सामान के साथ सम्पादक महोदय के सामने उपस्थित हुई और तुरंत ही अपनी सरकार बनाने का दावा पेश किया।

मैने कहा, ‘श्री मन् मैं लिखती हूं, जो थोड़ा बहुत यहां-वहां छपता रहता है’ यह कहते हुए मैने अपने कार्य कौशल की थाथी उनके मेज पर खिसका दी।

लेकिन यह क्या?

उन्होंने किसी अछूत कन्या की तरह मेरी फाइल को हाथ तक नहीं लगाया और सीधे सवाल दाग दिया। ‘आपने अभी तक क्या सीखा है?’

मैं भी कहां चुप रहने वाली, एक भाट की तरह अपने सारे छोटे-बड़े गुणों का बखान कर दिया।

लेकिन यह क्या? आफताब शिबदसानी की तरह उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं आए।

उन्होंने मुझसे दूसरा सवाल किया, ‘आप किस बीट पर काम करना चाहेगी।’

मैंने तुरंत ही कहा, समाजिक एवं सांस्कृतिक।

‘तब तो आप ऐश-अभिषेक की न्यूज ला सकती है’ उन्होंने पूछा।

मैने कहा, श्रीमन्! यह तो किसी के निजी जीवन में दखलंदाजी है।

उन्होंने तीसरा प्रश्न किया, ‘आप कोई स्टिंग आपरेशन कर सकती है।’

मैने कहा, नहीं! श्रीमन्, यह झूठ और फरेब पर आधारित है, सच्ची पत्रकारिता के विरूद्घ है।

‘आप शिल्पा-गिरे जैसे प्रकरण की फोटो ला सकती है।’ उन्होंने चौथा प्रश्न किया।

मैने कहा, श्रीमन्! ‘यह कैसे हो सकता है? यह तो आप के पालिसी के विरूद्घ है।’

इस पर वे आंखे निकालते हुए बोले, अब तुम हमें हमारी पालिसीज के बारे में बताओगी। महोदया! आप में पत्रकार वाले एक भी गुण नहीं है। जाइए, पहले कुछ सीखिए, फिर आइए।

और एक हारे हुए जुआरी की तरह मै दफ्तर से निकल आयी। बाहर आने के बाद मैने अपनी हार का ठीकरा अपने पत्रकारिता इंस्टीट्यूट के ऊपर फोड़ दिया। जहां हमें गलत तरीके की शिक्षा दी गयी थी। अत: अब मैने दफ्तरों के चक्कर लगाने बंद कर दिए है। मै अब ऐसे इंस्टीट्यूट की तलाश में हूं जहां मुझे सच्चा पत्रकार बनने के वास्तविक गुणों की शिक्षा दी जाए।

11 comments:

KAMLABHANDARI said...

pratibhaji aajkal har jagha bas rah gaya hai to dikhawa .kare to kya kare ?agar sach par chale to roti ke laale padenge aur jhut par chale to apne par sarmindagi hogi .aatmasammaan or roti dono hi jaruri hai .par dekha jaaye to bhale hi aaj roti ke laale rahe par kabhi to sach ka suraj khilega hi so date rahiye jeet aapki hi hogi.

op tiwari said...

lage rahiye jeet ek din aap ki hogi. nirash hone ki bat nahin hai. apne aas pas dekhiye india to aise hi chal raha hai.

डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...
This comment has been removed by the author.
डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...

प्रतिभा बहन,आत्मसम्मान जैसी चीज कोई चायनीज तो है नहीं कि जिससे पेट भर जाए। इसलिये पत्रकारिता के क्षेत्र में इस घटक को तलाशना उचित नहीं क्योंकि सफल पत्रकारों के मुताबिक अब ये पत्रकारिता नहीं "न्यूज बिजनेस" है। अगर आपको यशवंत दादा के माध्यम से भी कहीं पेशेवर पत्रकार के तौर पर स्वीकार लिया गया तो यकीन मानिये कि आत्मसंतोष से कोसों दूर ही रहेंगी बस वेतन और सुविधाएं उगाह पाएंगी,जो एक सामान्य जीवन के लिये अनिवार्य हैं... शेष आपके ऊपर है यदि चाहें तो जीविकोपार्जन हेतु नौकरी के लिये लिखिये और आत्मसंतोष के लिये भड़ास पर.... आपको सफलता मिले ऐसी प्रार्थना है ईश्वर से...
जय जय भड़ास

अनिल भारद्वाज, लुधियाना said...

Pratibha Dont worry Be Happy. Best of luck. You will be no long jobless. Bhadas will help you to acheive your goal. You can ring me on 09417487280 for help.

seth said...

partibha ji negetive bilkul nahi sochne ko. maine 5 year pahle yeh sab jhela hai. Humne bina kisi God Father aour kisi ke sahyog ke bina print media me pair jamaya hai. postive sochhe sab achha hoga. Jab man Udas ho to Geeta ke 3 line ko jarur yad karen. kyonki 1 year tak maine geeta ki inhi 3 line ko yad kar kai daftrow ke chakkar kate. dunia me sabhi editor & log ek jaise nahi hote hain. yeh duniya badi matlabi hai. bade magarmachh aapko milenge. lekin kabhi ghabrana nahi hai.

abhishek said...

pratibha ji aapne apni haar ka theekra apne institute ke sir phoda hai jo galat kyonki inst. me to hamen theory aur sirf apne field ke baare me bataya jata hai. jabki is line me aane ke baad sachai ka pata lagta hai. yahan kai bhedie hain jo sher ki khal pahne hain. aap is field me aa gayi hain ab dheere dheere aap samajh jayengi. baaki haar na maante hue apni chune hui manjil ki taraf badte jaaye. aasmaan aapka hai to maariye udaari.

abhishek said...

pratibha ji aapne apni haar ka theekra apne institute ke sir phoda hai jo galat kyonki inst. me to hamen theory aur sirf apne field ke baare me bataya jata hai. jabki is line me aane ke baad sachai ka pata lagta hai. yahan kai bhedie hain jo sher ki khal pahne hain. aap is field me aa gayi hain ab dheere dheere aap samajh jayengi. baaki haar na maante hue apni chune hui manjil ki taraf badte jaaye. aasmaan aapka hai to maariye udaari.

rajendra said...

prtibhji, me bhi ptrakar hu, lekin aapana bhi koi god father nahin hai. so 14 sal se ptrakarita kar raha hu, fir bhi me apne aap ko safal nahin manta. koi ristedar pahale se ptrakar hota, to kam ekdam aasan ho gaya hota. han, ab tak ke anubhavon ke aadhar par yah jaroor kah sakta hun ki ek din aapko safalta jaroor milegi. meri sabhi bhadasi bhaiyon sahit subh kamnayen. par nirash mat hona

रजनीश के झा said...

प्रतिभा,
आप बस सतत अपने प्रयास में लगी रहें. आपको आपकी मंजिल मिले हम ये दुआ करते हैं.
वैसे रुपेश भाई ने सही कहा है सो पत्रकारिता और व्यावसायिकता के फर्क को पहचानते हुए आप अपने कार्य को अंजाम दें.
जय जय भड़ास

VARUN ROY said...

महत्त्वपूर्ण ये है प्रतिभाजी कि आप इन मानसिक प्रताड़ना से हतास होकर उनकी शर्तों पर पत्रकारिता करने को तैयार हो जाती हैं या उन्हें अपनी काबिलियत मनवा कर अपनी शर्तों पर यह काम करती हैं. आपके चरित्र की असली पहचान तभी होगी. मेरी शुभकामना आपके साथ है और ऐसी अपेक्षा भी कि नौकरी के लिए आप अपने जमीर को मरने नहीं देंगी.
वरुण राय