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24.5.08

गिफ्ट में यारों से प्यार लेते हैं।

हास्य गजल
मिले जहां से भी इनको उधार लेते हैं
मज़े में उम्र ये सारी गुजार लेते हैं
हमें तो समझा है मजदूर अफसरों ने सदा
सनक में आते ही हमको पुकार लेते हैं
न आयी गिनती कभी सैंकड़े के बाद इन्हें
अजीब बात है कसमें अक्सर हजार लेते हैं
कमाल के हैं खुले हैल्थ क्लब वतन में मेरे
जो पहलवानों की चमड़ी उतार लेते हैं
चबा के सूबे को नेताजी ब्रेकफास्ट करें
डिनर में पूरे वतन को डकार लेते हैं
अनावरण तो सुबह हँस के मूर्तियों का करें
परी की शाम को इज्जत उतार लेते हैं
प्रसाद भेजा जो भक्तों ने सूटकेसों में
उसी से पीढ़ियां सातों ये तार लेते हैं
पुजारी प्रेम के नीरव तमाम उम्र रहे
हमेशा गिफ्ट में यारों से प्यार लेते हैं।
पं. सुरेश नीरव
( डॉ.रूपेश श्रीवास्तव, वरुण राय,अंकित माथुर,अविश्री, रजनीश के.झा,अबरार अहमद, और बंधु अनिल भारद्वाज आपकी आत्मीय टिप्पणी के लिए शुक्रिया,धन्यवाद। )

3 comments:

डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...

पुजारी प्रेम के नीरव तमाम उम्र रहे
हमेशा गिफ्ट में यारों से प्यार लेते हैं।
हम तो चिरकुट ठहरे भीषण भरकम
बात भी कर ले गर कोई तो पूरा वेतन उधार लेते हैं।
पेले रहिये महाराज इसी तरह से ... क्या आप ब्लागर कैम्प की शोभा बढ़ाने नहीं जा रहे हैं?

KAMLABHANDARI said...

अनावरण तो सुबह हँस के मूर्तियों का करें
परी की शाम को इज्जत उतार लेते हैं
sach me bahut kadwa hai yah sach.
sacchai ko pesh karne ka andaaj khub hai .isi tarha lege rahiye aur ,nakaab poso ke nakaab uttarte rahiye hum aapke saath hai .ya yu kahu ki hum saath-saath hai.

रजनीश के झा said...

प्रसाद भेजा जो भक्तों ने सूटकेसों में
उसी से पीढ़ियां सातों ये तार लेते हैं
"दिन में पूजा रात में दारू और मुर्गा उतार लेते हैं."

पंडित जी प्रणाम.
भाई वाह आनंद की कड़ी इसी तरह पेले रहिये.

जय जय भडास