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22.8.08

अब झेलिए मेरी भड़ास को

वो दिन कितने अच्छे थे। गांव में सब रहते थे। कभी नहीं सोचा था कि गांव एकदम से छूट जाएगा। बहुत पीड़ा होती है। कितना अपनापन था। रंजीत नन्ना के घर में सीधे चौके में जाकर बड़ी अम्मा से खाना मांगना। कोई शर्म नहीं आती थी। नेकर और बनियान पहनकर पढ़ने जाना। लौटते वक्त हंगामा करते आना। पूरी टोली के साथ खूब खेलना। गर्मी के दिनों में तालाब और तलइया में डूबे रहना।
सर्दियों में तालाब किनारे उबले हुए सिंघाड़े मिर्च की चटनी के साथ खाना। और बरसात के दिनों में डोंगे में बैठकर तालाब में जाना...कितना रोमांच... मीलों लंबा तालाब...जहां तक देखो पानी ही पानी...और मस्ती में आकर छलांग लगा देना। डुबकी मारकर छुआ-छुआवल खेलना...।
शाम को घरों के बाहर निकलकर नीर-छीर खेलना। लुका-छिपी खेलना और न जाने क्या-क्या..। सावन के महीने में नीम की डाल पर घाले गए झूले का आनंद लेना। और भी न जाने-क्या-क्या। मेरा गांव मटौंध। मुझे बहुत याद आता है। बहुत याद आता है। याद आते हैं। भाऊ, प्रधानजी, मुखिया साहब, लीला, सोमा, लल्ला, स्वामीजी, मंगल भैया, नरेश, सीताराम, सुभाष... और अपना वह घर,,,जो अब अपना नहीं रहा। कितना अच्छा था माटी का घर। हम सब वहीं सुख-दुख में रहते थे। शहर आए तो सबकुछ छूटता चला गया। शुरू में तो गांव जाने का सिलसिला बना रहा। बाद में सबकुछ खत्म हो गया।
याद आता है वह दिन जब गांव में पहली बार बिजली आई थी। खूब जश्न मना था। हम सब लड़के बजरिया तक देखने गए थे कि बिजली कैसी होती है। बहुत अच्छा लगा था। तब हमारे घरों में लालटेन या डिब्बी होती थी। उसी की रोशनी में हम लोग पढ़ते थे। खेतों में जाकर चने के बिरवा तोड़ना भी बहुत भाता था। मेले ठेले तो लगे ही रहते थे। आसपास चार मेले लगते थे। गनेश पहाड़ी का मेला। भद्रकाली का मेला। और दो छोटे-छोटे मेले। सचमुच पूरे प्राण बसते थे इन मेलों में। जीवन के मेले अद्धभुद थे। काश हम उन्हीं दिनों में लौट आएं


बंधन
बंधन टूट नहीं सकता था
बंधन जैसा बंधन होता
घर होता तो छत भी होती
तुलसी बिरवा आंगन होता
पता ठिकाना क्या दें अपना
हम बंजारों जैसे हैं
विषधर बनकर लिपटे होते
बदन जो तेरा कंचन होता
बंधन टूट नहीं सकता था
बंधन जैसा बंधन होता

(प्रिय खालिद और बॉबी के लिए
मानिकपुर के जंगलों
के बीच जरवा फार्म से )


जीत जाएंगे...
सुना है साहिलों में आग भड़की है तबाही की
मगर हमने भी ठानी है बहर के पार जाएंगे
अभी तो मुट्ठियों तक तेग का पानी नहीं उतरा
फिर कैसे कह दिया की बाजी हार जाएंगे

( प्रिय बाबी और वीरेंद्र के लिए)


संदर्भः लैला मैजनूं- टूटेगी धारणा
लैला न काली थी, न कलूटी थी। वह कोई युवती भी नहीं थी। तब फिर कौन थी वह? आखिर कैस उसका इतना दीवाना क्यों था?

अगर आपसे मैं कहूं कि लैला और मजनूं का इतिहास में कोई जिक्र नहीं है तो आप कहेंगे कि कोई सिरफिरा बेवकूफी की बात कर रहा है। मगर यह सच है। अस्सी के दशक में इलाहाबाद के कुसुम प्रकाशन से छपने वाली अपराध साहित्य की पत्रिका नूतन कहानियां या अपराध साहित्य की सच्ची कहानियां ने पेज नंबर २९-३० में लैला-मजनूं शीर्षक से विशेष प्रतिनिधि के हवाले से कथा छापी थी। यह विशेष प्रतिनिधि मेरे मित्र और बड़े भाई इरशाद अनवर थे। तब पत्रिका के संपादक अशोक शुक्ल बने थे. इसके छपने के बाद काफी हंगामा बरपा था।
इससे पढ़कर साफ होता है कि इस नाम के कोई पात्र हुए ही नहीं है। आप भी देखिए। पत्रिका के तीसरे पैराग्राफ से शुरू करते हैं- प्राचीनतम अरबी साहित्य का अध्ययन करने से पता चलता है कि करीब १३५० साल पहले अरब देश के नजफ शहर में लगभग ३०-३५ वर्ष का एक खूबसूरत युवक पागलों जैसी हालत में लैला-लैला चीखता हुआ दौड़ता-फिरता था। यह युवक एक कबीले के सरदार का इकलौता बेटा कैस था, जो अपने पिता के विरोध की परवाह न करते हुए इस्लामी लश्कर में शामिल होकर जंग में गया। उसके बाद अपने घर नहीं लौटा। उस समय यह अनुमान लगाया गया कि यहूदियों के खिलाफ जंग करते हुए उसने शहादत का जाम पी लिया।....आठ-दस बरस बाद एक दिन कैस अपने शहर लौटता है। उसकी हालत देख नाते-रिश्तेदारों का कलेजा फटा सा रह गया। वह पागलों जैसी अवस्था में था। सोते-जागते हर पल लैला शब्द उसके मुख से फूटता था। तमाम इलाज कराने के बाद कबाइलियों ने कैस को उसके हाल पर छोड़ दिया। अनपढ़ कबाइलियों को लैला का अर्थ नहीं मिला। हालांकि लैला अरबी भाषा का शब्द है। जिसका आशय किसी काली वस्तु या रंग से होता है। कैस की दीवानगी का हाल यह था कि वह अपना नाम मैं जुनूं कहता था। इसका अर्थ होता है मैं दीवाना हूं। कालांतर में मैं और जूनूं ने सिर्फ मजनू की शक्ल अख्तियार कर ली है। कैस के बार-बार मैं जुनूं-मैं जुनूं कहने से लोगों ने उसके साथ लैला को जोड़कर यह निष्कर्ष निकाला कि कैस काली रंगत वाली किसी युवती के इश्क में नाकाम होकर पागल हो गया है। उसके बाद कबाइलियों ने कैस को प्रेम-दीवाना घोषित कर रेतीले टीलों में भटकने के लिए छोड़ दिया।...और कैस एक नखलिस्तान के किनारे अपने लैला-लैला का जाप करने लगा।
जो लोग लैला को युवती समझते हैं, उन्हें भ्रम है। दरअसल इस्लाम धर्म की बुनियाद उसका पहला कलमा है,-ला-इलाहा इल्ललाह मुहम्मदर्रसूल अल्लाह। इसे इस्लाम धर्म का मूलमंत्र भी कहा जा सकता है। जिसका अर्थ है कोई नहीं है माबूद सिवा अल्लाह के और मुहम्मद उसके रसूल हैं। यदि इस कलमे के पहले भाग ला-इलाहा का धारा प्रवाह जाप किया जाए तो एक ऐसी स्थिति आ जाती है कि मुख से स्वतः लैला-लैला निकलने लगता है, ठीक उसी तरह जैसे मरा-मरा जपने से राम-राम। कहने का तात्पर्य यह कि कैस किसी षोडसी के प्रेम में असफल होकर मजनू नहीं बना था, वह जेहाद से लौटकर घर नहीं आया, बल्कि किसी अग्यात स्थान या गुफा में जाकर घोर तपस्या करते हुए उक्त कलमे को सिद्ध कर लिया था। यही कारण था कि उसके मुख पर लैला शब्द चस्पा हो गया। किन्तु विवेकहीनों ने कैस को प्रेम-दीवाना समझकर शहर से बाहर निकाल दिया था।
कालांतर में एक अरबी लेखक इब्न अब्दुल्ला ने कैस के दीवानेपन को जेहन में रखते हुए लैला-मजनू नामक काल्पनिक पात्रों का सृजन कर एक प्रेम-कथा लिखी जो देश-विदेश के पाठकों द्वारा इतनी पसंद की गई कि उसने तात्कालीन ब्रिकी के पिछले सारे रिकार्ड तोड़ दिए। अरबी के अलावा सैकड़ों भाषाओं में अनुदित होकर वह रचना विश्वभर में प्रकाशित हुई। परिणामस्वरूप लैला-मजनू की काल्पनिक प्रेम-कथा ने युवा पीढ़ी के मन-मष्तिक पर इतना प्रभाव डाला कि सच्चाई का दम टूट गया। अरबी साहित्य में इस तथ्य का स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि कैस ने खुदा की इतनी इबादत की थी कि उस पर हर पल अल्लाह व उसके रसूल से इश्क की मस्ती सवार रहती थी। वह बस्ती-बस्ती-सहरा-सहरा लैला-लैला की आवाज लगाता रहता था। नखलिस्तान में एक बबूल के पेड़ से टिककर तपस्या करने लगा। और धीरे-धीरे यह बबूल का पेड़ सूख गया। मजनू के शरीर को रेत और मिट्टी ने ढांप लिया। दीमकों ने घर बना लिया। पास से देखने में भी कोई नहीं कह सकता था कि यहां कि कोई इंसान है। ...और हुआ यह कि एक रोज एक लकड़हारा सूखी लकड़ियों की तलाश में इसी नखलिस्तान में जा पहुंचा और सूख चुके बबूल के ठूंठ पर कुल्हाड़ी से वार कर दिया। जैसे ही कुल्हाड़ी का धारदार फल ठूंस से टकराया, खून का फौव्वारा उबल पड़ा। नीरव वातावरण का सीना चीरती हुई एक कर्णभेदी चीख गूंजी-लैला$$$$$$ टकराया कैस का सिर दो टुकड़ों में बंटकर कंधों पर झूल गया।



मेरी पुस्तको...।
मैं किन शब्दों में तुम्हारा शुक्रिया अदा करूं, मेरी किताबो।
कि जमाने की कटुताएं और हृदय की कुण्ठाएं
मैं तुम्हारे पृष्ठों की पवित्र गंगा में डुबो देता हूं
और हल्का हो जाता हूं।
तुमने मेरे दिनों को उजाला दिया है, मेरी पुस्तको
कि वे सब चीजें जो सूरज के उजाले में नहीं देखी जा सकती
तुम्हारे उजाले ने मुझे दिखाई हैं।
तुम्ही ने मेरे असंतोष को संदर्भ दिए हैं
मेरे संघर्ष को परिप्रेछ्य दिया है,
मेरे विद्रोह को इतिहास दिया है।
मेरी थकी-टूटी दिनचया$ की तल्खियों से भरी शामों को
अरब के रेगिस्तान, लेबनान की फलों से लदी घाटियां
और तुर्की के बंदरगाह दिए हैं।
अमेरिका के खेतों के फैलाव और रूस की खानों की गहराइयां दी हैं।
तुमने मेरी रातों के सपनों को व्यापकता दी है, मेरी किताबो।
उन्हें रोजी-रोटी, परिवार और नारी-शरीरों की परिधि से बाहर निकाला है।
तुम मेरे क्रूर परिवेश की कारा में बनी हुई वे खिड़कियां हो
कि जिनसे
बेहतर जिंदगी और आशा और विश्वास की पवित्र हवा
मुझ तक पहुंचती है
तुम वे द्रवण-नलियां हो, मेरी पुस्तको।
जिनसे तुम्हारे महान लेखकों की आत्माएं वास्पीभूत होकर
मेरी आत्मा के छुद्र पात्र में द्रवित हो जाती हैं,
और मैं उनकी सुगंध से परिपूर्ण हो उठता हूं।

यह कविता हिंदी के चर्चित और सोवियत नेहरू पुरस्कार प्राप्त कवि डा. रणजीत की है। यह रचना वर्ष १९८२ में पंडित जवाहर लाल नेहरू डिग्री कालेज बांदा (उत्तर प्रदेश) की वार्षिक पत्रिका विकल्प के पेज नंबर १० में छपी है। इसका पेज मेरे पास अभी तक है। न जाने क्यों यह कविता मुझे भाती है। मैं इसे सैकड़ों बार पढ़ने के बाद भी लगातार पढ़ता हूं। बाद में डा. रणजीत मित्रों की कतार में शामिल हो गए। कानपुर में हुए जनवादी लेखक संघ के पहले सम्मेलन में मैं उनके साथ गया। वहां से लौटने के बाद उन्हों जनवादी लेखक संघ के सचिव का दायित्व सौंपा। डा. रणजीत से बहुत कुछ सीखने को मिला। काफी समय तक संवादहीनता बनी रही। वह बांदा छोड़कर सीतापुर चले गए। मैं भी रोजी-रोटी की तलाश में शहर-दर-शहर बदलता रहा। बड़ी मुश्किल से उनका फोन नंबर मिला। बरेली के साथी विवेक सेंगर के माध्यम से। तब वर्ष २००६ में उनसे बात हो पाई।



टुकड़े-टुकड़े होकर बिखरता चांद
चांद के टुकड़े-टुकड़े बटोर-बटोरकर प्रकृति के विरुद्ध रात को दिन और दिन को रात की तरह जीने की मिसालें दिसंबर ने साल २००५ में अजीब शक्ल में पेश की हैं। देह के साथ खेली जा रही तिजारत ने सूरज के उजाले में सवालों की सलाखें सभ्य समाज की पीठ में दाग दी हैं। लड़कियों के समलैंगिक विवाह ने आदम भूख की गढ़ी परिभाषाओं को तार-तार कर दिया है। मांसल आकर्षण का जुमला झूठा लगने लगा है। राजशक्ति, सत्ताशक्ति और धनशक्ति के सरमाएदार इससे भौचक्का हैं।
हाल ही में सुर्खियां बनीं घटनाओं ने आचार्य चतुरसेन शास्त्री के कृत वयं रछामः में वर्णित तरुण और तरुणी संवाद के संकेतों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। कथा सम्राट प्रेमचंद ने प्रतिग्या के पृष्ठ १३५ में लिखा है-स्त्री हारे दरजे की दुराचारिणी होती है। अपने सतीत्व से अधिक उसे संसार की और किसी वस्तु पर गर्व नहीं होता, न ही वह किसी चीज को इतना मूल्यवान समझती है। प्रेमचंद की प्रतिग्या की झलक इस्मत चुगताई की जब्तशुदा कहानी लिहाफ में मिलती है। इस समय समाजसुधारकों को जवाब देना चाहिए कि भारतीय समाज में ऐसे विवाह क्यों हो रहे हैं। समाज विग्यानियों को इस पर कोई ठोस राय देनी चाहिए।
इलाहाबाद के संगम में एक-दूसरे का वरण करने वाली कुलीन तबके की युवतियों ने लोक-लाज की परवाह न करते प्यार के अलावा स्त्री-पुरुष संबंधों से होने वाली संतुष्टि से इतर नए मौन संबंधों की स्थापना की है। ठीक इसके बाद पंजाब के अमृतसर से आई खबर ने तो और भी चौंका दिया। सहेलियों की शादी को पति बनी लड़की के घरवालों ने स्वीकार कर अदम्य साहस का परिचय दिया।
३० दिसंबर २००५ की आधी रात का वक्त, पंचकूला (हरियाणा)


पत्र-पत्रिकाओं की अकाल मौत
आज का परिवेश बिलकुल बदला हुआ है। पढ़ने को कुछ नहीं बचा है। जो बचा है, उससे भूख शांत नहीं हो पाती। धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, बिलट्ज, सारिका, वामा, माधुरी, माया, दिनमान, रविवार, सत्यकथा, मनोहर कहानियां, चौथी दुनिया, संडे आब्जर्वर, प्रतिप&, असली भारत, अ&र भारत, आदि को बंद हुए लंबा अरसा गुजर गया है।
धर्मयुग को बंद हुए कितना लंबा समय गुजर गया है। बचपन में जगदीश भैया के घर से धर्मयुग लाकर पढ़ते थे। हर हफ्ते हर तरह की भूख शांत होती थी। धर्मवीर भारती के नेतृत्व में हर पन्ना चट कर जाते थे। धर्मयुग ( टाइम्स आफ इंडिया, मुंबई ) ने इस देश को कई बड़े नाम दिए हैं। इनमें से एसपी (सुरेंद्र प्रताप सिंह) इस समय हमारे बीच नहीं हैं। मुंबई से कोलकाता पहुंचकर उन्होंने रविवार के माध्यम से पत्रकारिता को जो दिया है, वह किसी से छुपा नहीं है। पंडित जी ( उदयन जी), राजेश रपिरया, कुरबान अली, संतोष भारतीय, राजीव शुक्ल, अनिल चमडिया, लल्लाजी आदि अनगिनत नाम हैं, जिन्होंने पूरे देश के पत्रकारिता जगत को प्रभावित किया है। विजय भास्कर तो बिहार में धूनी रमाए हैं। बहरहाल धर्मयुग की अलख अलग-अलग जगह जल रही है। बुंदेलखंड के महेश अवस्थी हमीरपुर में जमे हैं। नटवरलाल (राजू मिश्र ) लखनऊ के होकर रह गए हैं। नटवर की आदतें अब बदल गई हैं। चित्रकूट के टिल्लन रिछारिया अब एक चैनल में हैं।
साप्ताहिक हिंदुस्तान के ज्यादातर साथी हिंदुस्तान में देखने को मिल जाते हैं। इसकी कई कहानियां बहुत चरिचत हुई हैं। बिलटज तो अद्भुत अखबार था। बड़े-बड़े दिग्गज कांपते थे। इस अखबार ने अपने समय पूरी पीढ़ी को प्रभावित किया है। उपेंद्र शुक्ल की एक खबर बांदा के पूरे पुलिस की नौकरी खा चुकी है। खबर थी हथकड़ी के साथ पुलिस लाइन से आदमी फरार। यह खबर घटना के डेढ़ माह बाद छपी थी। उन दिनों में बांदा में फरजी मुठभेड़ें होती थीं। इसके अलावा बांदा में पुलिस मध्ययुग के संपादक सुरेश गुप्त की हत्या कर चुकी थी। वह मामला भी गरमाया हुआ था। इसीलिए इस आदमी को पकड़ा गया था। इस अखबार ने आपातकाल के समय साईंबाबा को खबरें बनाकर अपना उल्लू सीधा किया। आरके (आरके करंजिया) की फौज और भी बहुत कुछ करती रही है।
सारिका कथा जगत की एकमात्र अच्छी पत्रिका रही है। उसका बंद होना मुझे लगातार खल रहा है। इसके कई अंक मैंने सहेज कर रखे हैं। जब कभी मन भटकता है तो उसकी कहानियां पढ़कर संतोष मिलता है। टुकड़ा-टुकड़ा संबंध-अनीता मनोचा की कहानी आते हुए लोग शीर्षक के तहत छपी थी। इस कहानी ने मुझे बहुत प्रभावित किया। इस पत्रिका के बहुत से लेखक आज मेरे मित्र है। अनीता तब मेरठ में पढ़ती हैं। आजकल शायद आकाशवाणी में हैं। नवनीत मिश्र की कहानियां भी हलचल मचाती थीं। विजय किशोर मानव को गजलकार के रूप में सारिका ने ही स्थापित किया है। सारिका के विशेषांक बेहद लोकप्रिय हुए हैं। वामा मृणाल पांडे के नेतृत्व में अच्छी निकली थी। बाद में टाइम्स इंडिया इसे खा गया। यही हाल माधुरी का था। इसके संपादक विनोद तिवारी रहे हैं। यह फिल्म की बहुत साफ-सुथरी पत्रिका थी। इसे भी टाइम्स ने निगल लिया।
माया शुरू फिल्म से हुई बाद में राजनीतिक बन गई। इंदिरा गांधी हत्याकांड के समय इस पत्रिका ने गजब काम किया। तब यह साढ़े आठ लाख छपी। फोटोस्टेट बिकी। इस पत्रिका ने एक जोड़ी बनाई। अजय-अशोक। मध्यप्रदेश से स्वामी त्रिवेदी का काफी हल्ला हुआ करता था। इस जोड़ी का गजब का रुतबा रहा है। निशीथ जोशी, राजीव सक्सेना, आदि बहुत से नाम स्थापित हैं। इसके संपादक बाबूलाल जी अब एक सरकारी पत्रिका में हैं। सुरेश सिंह जी का अता-पता नहीं। पटना से विकास कुमार झा की स्टोरी भी चरचा में रहती थी। कैमूर की पहाडियों का राजा-मोहन बिंदु ऐसी ही आवरण कथा थी। बाद में मोहन बिंदु मार डाला गया। यह वीरप्पन या ददुआ से कम नहीं था।
दिनमान साप्ताहिक भी बहुत अच्छा होता था। जवाहर लाल कौल, त्रिलोक दीप, महेश्वर दयाल गंगवार, रामसेवक श्रीवास्तव, कन्हैया लाल नंदन आदि नाम अब भी जेहन में गूंजते हैं। इसमें हर बार अंतिम पन्ने में एक विदेशी रचनाकार की कविता अनूदित होकर छपती थी। उसका आज तक कोई मुकाबला नहीं हो पाया है। संयोग से मेरी पत्रकारिता की शुरुआत यहीं से एक फ्रीलांसर को तौर पर हुई। इसके बंद होने पर मुझे किसी प्रिय के निधन जैसी पीड़ा भुगतनी पड़ी है। और आज भी होती है। मित्र प्रकाशन की अपराध पत्रिताओं ने एक समय युवा पीढ़ी के दिलों में राज किया है।
साप्ताहिक चौथी दुनिया संतोष भारतीय के संपादकतत्व में निकला। इस अखबार के मालिक कमल मोरारका थे। इसका मकसद चंद्रशेखर जी को प्रधानमंत्री के रूप में स्थापित करना था। और वही हुआ । चंद्रशेखर को गद्दी मिलते ही यह अखबार बंद हो गया। तब संपादक सुधेंदु पटेल थे। वैसे इस अखबार ने उन लोगों को स्थापित किया है, जिन्हें वाकई मंच की जरूरत थी। उनमें एक नाम अरिवंद कुमार सिंह का है। भाई माफ करना। आप तो इस समय संपादक हैं। आप और हम एक जगह एक साथ छपते रहे हैं। वीरेंद्र सेंगर भी यहीं से स्थापित हुए हैं। इस समय कहां हैं, पता नहीं। अंबानी के संडे आब्जरवर को उदयन जी ने ही निकाला था। इरान-ईराक यद्ध के दौरान इस साप्ताहिक ने दैनिक की भूमिका निभाई, मौके से भेजी गई सईद नकवी की रपटों ने देश के मठाधीश अखबारों की बोलती बंद कर दी। प्रतिप& जार्ज और असली भारत चौधरी चरण सिंह का अखबार था। राजनीतिक मकसद के लिए निकाले गए और बंद हो गए। हालांकि इन्होंने भी नए लोगों को अच्छा मंच दिया। उनमें से कुछ नाम स्थापित हो चुके हैं। अजय सिंह तो वीपी के साथ मंत्री भी थे। जार्ज तो दिग्गज नेता हैं। अ&र भारत गांव की परिकल्पना को लेकर निकला गया था। जो अपने मकसद को पूरा करने से पहले बंद हो गया।
बहरहाल दोस्तो, एक अखबार या पत्रिका की मौत बहुत दुखद होती है।....उम्मीद है, अब किसी के सपने नहीं मरेंगे। अखबार और पत्रिकाएं बंद नहीं होंगी।

4 comments:

ई-हिन्दी साहित्य सभा said...

मुकंद जी, इसे भड़ास में आपने भले ही पोस्ट किया है, पर अपका यह लेख साहित्य की नजर से काफी महत्व रखता है। - शम्भु चौधरी

डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...

शम्भु...शम्भु... हरे... हरे..
आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि भड़ास पर साहित्य नहीं पेला जा सकता है :)

Kumar sambhav said...

baap re baap yea aap ki bhadas thi kripa lekhani ko chota rakhe.

indscribe said...

Mukund sahab
aapne bohat umda mazmoon qalam-band kiya hai. mubaarakbaad.