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18.10.08

ग़ज़ल

कौन पीता है लड़खडाने को,
हम तो पीते हैं आज़माने को।
कुव्वाते-मय को देखने के लिए,
हम चले आते हैं मयखाने को।
बुज़दिलों में शुमार होता है,
वो जो पीते हैं ग़म भुलाने को।
आए खुंदक तो यार चुप रहिए,
ख्वाब बेहतर हैं बडबडाने को।
मकबूल बोतल निचोड़ दी हमने,
खाली ढक्कन हैं खड़खडाने को।
मकबूल

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