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29.11.08

परमहंस योगानंद



विनय बिहारी सिंह
योगी कथामृत (आटोबायोग्राफी आफ अ योगी) के विख्यात लेखक और महात्मा गांधी को क्रिया योग की दीक्छा देने वाले परमहंस योगानंद एक महान संत थे। योगी कथामृत दुनिया की सारी भाषाओं में अनूदित है। उर्दू में भी। परमहंस योगानंद ने सन १९२० में यूरोप और सारी दुनिया में क्रिया योग की जानकारी दी। उन्होंने अपना मुख्य केंद्र अमेरिका को बनाया। भारत में उन्होंने योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया के नाम से और अमेरिका में सेल्फ रियलाइजेशन फेलोशिप के नाम से उनके द्वारा स्थापित संस्थाएं आज सारी दुनिया में आध्यात्म का प्रकाश फैला रही हैं। योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया (वाईएसएस) में क्रिया योग बताया जाता है जिसे महान संत श्यामा चरण लाहिड़ी ने सबसे पहले सिखाना शुरू किया। लाहिड़ी महाशय को उनके गुरु महावतार बाबा जी ने क्रिया योग की दीक्छा दी थी। लाहिड़ी महाशय ने क्रिया योग की दीक्छा स्वामी श्री युक्तेश्वर जी को दी। स्वामी श्री युक्तेश्वर ने इसे अपने दिव्य शिष्य परमहंस योगानंद को सिखाया और उनसे कहा कि पश्चिमी देशों के लोगों को इससे लाभान्वित करो। शुरू में परमहंस योगानंद जी कोई भी संगठन बनाने के पक्छ में नहीं थे। उनका कहना था कि संगठन बनाने से आरोप ही ज्यादा मिलते हैं। तब स्वामी श्री युक्तेश्वर जी ने कहा कि क्या आध्यात्मिक मलाई तुम अकेले ही खा लेना चाहते हो? परमहंस योगानंद जी ने गुरु की बात मानी और वाईएसएस और सेल्फ रियलाइजेशन फेलोशिप की स्थापना की। आज ये संगठन नहीं होते तो लाखों लोगों को क्रिया योग की दुर्लभ दीक्छा कैसे मिलती? स्वामी श्री युक्तेश्वर जी ने कहा- पश्चिम में समृद्धि तो है लेकिन आध्यात्म शिक्छा की कमी है। स्वामी श्री युक्तेश्वर जी ने बाइबिल और गीता में अनेक समानताओं के बारे में एक पुस्तक लिखी है- कैवल्य दर्शनम। यह पुस्तक वाईएसएस के केंद्रों में हिंदी, अंग्रेजी, बांग्ला और अन्य भाषाओं में उपलब्ध है। सन १९५२ में जब उन्होंने अमेरिका में अपना शरीर छोड़ा तो उनका शरीर शव गृह में एक महीने तक रखा रहा। लेकिन उसमें कोई विकृति नहीं आई । अमेरिका के शव गृह के इंचार्ज ने तब लिख कर दिया था जो आज भी वहां रखा हुआ है। शव गृह के इंचार्ज ने लिखा है कि यह अद्भुत उदाहरण है। एक महीने बाद भी शव का तरोताजा रहना, आश्चर्यजनक है। लेकिन यह सत्य है। मरने के बाद भी महान संत परमहंस योगानंद ने अपने शव के जरिए आध्यात्म का संदेश दिया। उन्होंने कहा- सिर्फ शुद्ध और सच्चा प्रेम ही मेरी जगह ले सकता है। परमहंस योगानंद ने अनेक पुस्तकें लिखी हैं। क्रिया योग में दीक्छा लेने के इच्छुक लोगों को वहां अपना नाम दर्ज कराना पड़ता है। तब उन्हें हर महीने ध्यान करने संबंधी एक लेसन या अध्याय डाक से भेजा जाता है। साल- डेढ़ साल के बाद अगर व्यक्ति ने लेसन में पूछे गए सवालों का ठीक ठीक जवाब दे दिया तो उसे क्रिया योग की दीक्छा के लिए अधिकृत कर दिया जाता है।

2 comments:

राजन् said...

वहां का पता ?

अमीत तोमर said...

is blog pr jakr dekh lijiye mene puri jankari de rakhi he http://www.bharatyogi.net/p/blog-page_03.html