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20.11.08

आप सुन रहें हैं ना पापा...

प्रिय पापा,
आज आपको इस दुनिया से गए तेईस साल हो गए। मैं नहीं जानता अब आप कहां होंगे, लेकिन अभी भी ऐसा महसूस होता है कि आपका वजूद हमसे अलग नहीं हुआ है। आपको गए लम्बा अरसा बीत चुका, लेकिन आपकी यादों से हमारा दामन ज़रा भी नहीं छूटा। आज मैं उम्र की उस पर मंजिल पर हूं, जहां मेरी गिनती न बच्चों में होती है और न ही युवा मानकर समस्त जिम्मेदारियों का भार मुझे सौंपने का जोखिम उठाया जा सकता है। हालांकि परिवार से मिलने वाले लाड़-दुलार का कोई अभाव नहीं है, लेकिन आप के मार्गदर्शन की कमी सदैव महसूस होती है। हमेंशा यहीं लगता है कि आपका स्नेहिल हाथ सिर पर होता तो शायद खुशियां दोगुनी रफ्तार से ज़िन्दगी में प्रवेश करती। आज जब इतना वक्त गुज़र चुका है तो भी एक पिता, एक संरक्षक की कमी मन को सदैव कचोटती रहती है कि आप होते तो शायद ज़िन्दगी का एक और खूबसूरत रूप देखने को मिलता।
इसे मेरा दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि बचपन का वह सुनहरा दौर यूं ही गुज़र गया जब बच्चे पिता की अंगुली थाम कर चलना सीखते हैं। बदमाशियों पर डांट खाने, अच्छे अंक हासिल करने पर प्यार भरी थपकी, बड़े भाई-बहनों से झगड़ने पर आपके द्वारा अपने सीने में छिपा लिए जाने के एहसास से मैं बिल्कुल महरूम रह गया। आज आपकी तस्वीर को देखते ही आंखों से आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है। हर उस मौके पर आपकी यादें पल-पल जीवंत हो उठती है, जो पिता-पुत्र से जुड़ा होता है। जब भी किसी बेटे को अपने पिता से किसी चीज की ज़िद करते देखता हूं तो जुबां खामोश और आंखें नम हो जाती है। जब कोई पिता अपने बेटे से यह उम्मीद करता है कि वो बुढ़ापे के दिनों में उसका सहारा बनेगा तो सोचता हूं कि आखिर क्यूं भगवान ने मुझे यह मौका नहीं दिया।
पापा, अकेला मैं ही नहीं पूरा परिवार आपकी यादों को सीने से लगाए है। दादी आंसुओं से भरी हुई सूनी आंखों से एकटक आपकी तस्वीर को देखते हुए बताती थीं कि किस तरह पूरे शहर और गांव में आपका यश कायम था। पापा, आपकी वह कामयाबी आज भी गर्व से मेरा सिर ऊंचा कर देती है। जब लोग बड़ी इज्ज़त के साथ कहते हैं कि यह 'वकील साहब' का बेटा है। उस समय, वक्त थम सा जाता है और साथ ही जीवन में कुछ करने की असंख्य प्रेरणाओं से लबरेज हो जाता है। हालांकि आपकी मौत के हादसे ने सही-गलत की अच्छी परख कराई। आपके चले जाने से घर का आय-अर्जन का साधन भी खत्म हो गया था। सच यह भी है कि उन हालातों ने घर के सभी सदस्यों को दुनियादारी के असली मायने सिखा दिए। वक्त के साथ ज़िन्दगी ढर्रे पर आई। आज मैं धीरे-धीरे ज़िन्दगी के अनुभवों से सीख रहा हूं। समय ने हम सबको समय से पहले परिपक्व बना दिया। अब हर एक छोटी घटना भी सबक देती प्रतीत होती है। कई बार एक भावनात्मक तूफान दिल को चीरता हुआ निकलता है और मुझसे यह सवाल करता रहता है कि क्या आप होते तो ऐसा होता..? , आप होते तो शायद वैसा नहीं होता...
अब धीरे-धीरे हालात संभल रहे हैं। पापा, काश आप देख पाते कि अब सब कुछ व्यवस्थित हो रहा है। मैं भी उच्च अध्ययन कर रहा हूं। यह आपके आशीर्वाद का ही नतीजा था कि विषम परिस्थियों के बावजूद हमारे कदम डगमगाए नहीं। हालांकि सभी की पूरी कोशिश होती है कि हमें आपकी कमी महसूस न हो। लेकिन अतीत के लम्हे वर्तमान पर दस्तक देकर आंखों को भिगो देते हैं। पापा, मैं उम्र और अनुभव में बहुत अधिक बड़ा तो नहीं लेकिन मैंने यह संकल्प लिया है कि आपका यश और ज्यादा प्रसारित करूंगा। आपका यह बेटा आपका सहारा बनने का सौभाग्य तो प्राप्त न कर सका, लेकिन आपकी इज्ज़त, आपकी पहचान जरूर बनेगा। मैं श्रद्धांजलि इन्हीं शब्दों के माध्यम से आप तक पहुंचाता हूं कि जाने वाले तो कभी लौट कर नहीं आते। लेकिन उनके सपनों को पूरा करके उन्हें अपने दिल के करीब रखा जा सकता है। मैं जानता हूं पापा, आप हम लोगों से बेहद दूर चले चले गए हैं और आपकी कमी को कोई भी पूरा नहीं कर सकता। ऐसे में हमारा फर्ज़ बनता है कि आपके आदर्शों और मूल्यों को सहेज कर रखा जाए। आपके ख्वाबों को सफलता का शिखर दिखाया जाए। बस अब ईश्वर से यही गुजारिश है कि मैं आपके अरमानों की कसौटी पर खरा उतर पाऊं और परिवार को भी उसी मार्ग का अनुसरण करने के लिए प्रेरित कर पाऊं।
-आपका बेटा

4 comments:

amitabh budholiya said...

कुछ खोकर पाना है, कुछ पाकर खोना है...
जीवन का मतलब तो पाना और खोना है....
परछाईयाँ रह जाती, रह जाती निशानी है...
जिन्दगी और कुछ भी नही...

Bandmru said...

sahi hai...........

अंकित माथुर said...

I yesterday commented when I wasnt logged in but this one is a nice read. Good One!!

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) said...

बेहतरीन है मित्र, बधाई आपको.
संवेदना को जो संयमित वेग के साथ आपने सामने रखा है, बस आत्मसात करने को जी चाहता है.
आपको साधुवाद