Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

6.12.08

हम एक माँ की औलाद है क्या हमारा क्या तुम्हारा है

हिन्दुस्तान का दर्द वो बेदर्द नहीं समझेगे , जिन्हें आदत है खून बहाने की ,जिनका मजहब ही नफरत है !!!अपनी कुसंगत भावनाओ को किसी के ऊपर थोपना ही आतंकवाद है लेकिन समय के साथ साथ इअका रूप भी बदल चुका है आज हिंसा की दम पर खून की नदिया बहाना की आतंकवाद का मोर्डेन रूप है भारत आतंकवाद से पीडित है ,जिस तरह से मुंबई मे खून का नंगा नाच खेला गया , बेगुनाहों को भूना गया उससे सारी जनता के दिल मे आतंकवाद के खिलाफ पल रही नफ़रत अब एक बेहद बड़ा रूप ले चुकी है !
आज हर आदमी आतंकवाद से निपटने के लिए सरकार से किसी कड़े और बड़े कदम की आशा कर रहा है शायद जनता का यह बड़ा कदम ''युद्ध'' है ! जी हां आज जनता चाहती है की अब हिन्दुस्तान और पकिस्तान की आखिरी लडाई हो , जिसमे कोई एक बचे और वो सुकून से रह सके !!लेकिन युद्ध एक अभिशाप है और जब तक न हो तो ही अच्छा है क्यों की इसके बाद देश की विकास गति मंद पड़ जाती है और देश को अनेकों मुसीबतों का सामना करना पड़ता है !! और वैसे भी हम किस्से लड़ने की बात कर रहे है पकिस्तान से जबकि मेरे ख्याल से तो हमारी l लडाई पकिस्तान से न होकर आतंकवाद से होनी चाहिए और युद्ध के बलबूते पर आतंकवाद का सफाया करने मे सक्षम नहीं हो सकते है इसलिए युद्ध सब्द का उपयोग करना भी देश को नुक्सान पहुँचाना है !आतंकवाद के विरुद्ध और देश के भ्रष्ट राजनेताओं के विरुद्ध जिस तरह से जनता का रोष नजर आ रहा है उससे लगता है की जनता की यह ज़ंग एक मुकाम तक जरुर पहुँचेगी लेकिन इसकी भी एक शर्त है की जिस तरह का जोश और उत्साह जनता मे अभी है औए आखिरी समय तक कायम रहे जब तक की हम आतंकवाद और भ्रष्ट राजनीति को उखाड़ कर फेख़ न दे !क्योंकि कभी कभी लगता है की जनता का यह रोष ,यह क्रोध उस गर्म दूध की भांति न हो जो पहेले तो गर्म होता है और बाहर निकलने का प्रयास करता है लेकिन जब उससे पानी निकल जाता है अतो उसका विरोध शांत पड़ जाता है और बह गाडा हो जाता है अर्थात माहोल के साथ समझोता कर लेता है इससे यह आशय है की इस ज़ंग मे सिर्फ वे आगे बड़े जो जीतना चाहते है, जिनमे होसला है की वे बिपरीत हालातों मे भी खड़े रह सके मतलब सीधा है की यह ज़ंग राजनीति चमकाने के लिए नहीं है इसलिए सच्चे देश भक्त ही आगे आये , दिखावा करने वालों की लिए यहाँ कुछ नहीं है !!बाहरी आतंकवाद से पहले हमारी लडाई खुद से होनी चाहिए हमें हमारी सरहदों के भीतर बिखरे आतंकवाद को कचरे के गड्डे मे दफनाना होगा , जिसे हम अपने स्वार्थी और भ्रष्ट नेताओं के भरोसे नहीं छोड़ सकते क्योंकि इन पर न तो कभी आतंकवाद का खतरा आ सकता है न ही गरीबी का इन पर सिर्फ के जिम्मेदारी होती है कुर्सी बचाने की ! अगर बच गयी तो भगी बन जाते है न और किसी और को मिल गयी तो विरोधी बन जाते है ,इसी तरह की नोटंकी महारास्ट्र मुख्यमंत्री चुनाव मे नजर आई ! जिससे साफ़ हो गया की इन नेताओं की नजरों मे अब भी कुर्सी की कीमत उन सेकडों लाशों की आबरू से जयादा है !!आज हम्हे जरुरत है की हम अपनी लडाई खुद लड़े क्योंकि युद्ध के बलबूते पर वो लडाई सेना से सेना की लडाई होगी जिसमे हमे हजारों , लाखों बेगुनहा सेनिकों को मौत के मुह मे धकेलना पड़ेगाऔर आतंकवाद फेलाने वाले सरहदों के भीतर ही जश्न मनाते रहेंगे !!इसलिए यह ज़ंग एतिहासिक हो और देश को किसी भी हाल मे नुक्सान पहुँचने वाली न हो ...युद्ध इस कसोटी पर कभी खरा नहीं उतर सकता !!!क्योंकि यह लडाई हिन्दू मुसलमान की नहीं अच्छाई और बुराई ही है !!!

ना राम हमारा है ,ना रहमान तुम्हारा है
ना bibil हमारा है ना कुरान तुम्हारा
है हम एक माँ की औलाद है
क्या हमारा क्या तुम्हारा है

संजय सेन सागर
www.yaadonkaaaina.blogspot.com

3 comments:

रंजना said...

बहुत सही और सटीक कहा आपने.सहमत हूँ.

डॉ.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...

संजय भाई,बहुत सुंदर...

Anonymous said...

सागर भाई
बढिया लिखा, एक सूत्र में पिरोने वाली माला चाहिए, और आपका लेखन एक सूत्री ही तो रहा.
आपको बधाई.