Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

6.3.09

शाकाहार के समर्थन में मेरा एक विनम्र निवेदन


विनय बिहारी सिंह

रोज मेरे घर के सामने से कुछ कसाई बकरियों का झुंड ले जाते हैं। मैं कोलकाता में रहता हूं। सुबह- सुबह ये बकरियां जिस तरह चिल्लाती हुई जाती हैं, वह विलाप से भी बदतर लगता है। साफ है कि बकरियां जानती हैं कि उनकी हत्या की जाएगी। यह वही समझ सकता है जिसने बकरियों का यह चित्कार सुना हो। मैं रोज यह चित्कार सुन कर हिल जाता हूं। इन बकरियों का मांस खा कर हम कौन सी नियामत पाते होंगे, मेरी समझ से बाहर है। मुझे यह चित्कार कभी नहीं भूलती। सचमुच जो लोग कहते हैं कि मांस खाना अपने पेट को कब्र में तब्दील करना है, वे गलत नहीं कहते। शाकाहार के तो अनगिनत फायदे हैं। आप पहले वे चित्कार सुनें, फिर मांसाहार पर गौर करें। यह चित्कार कोलकाता में ही नहीं, हर कहीं सुनाई दे सकता है। पौधों और पेड़ों के फल व सब्जियां तोड़ना उनकी हत्या नहीं है। अगर आम आप नहीं तोड़ेंगे तो वह स्वतः ही पक कर गिर जाएगा। संतों ने तो कहा ही है-वृक्ष कबहुं न फल भखै, नदी न संचै नीरपरमारथ के कारने, साधुन धरा शरीर। शाकाहार ही मनुष्य के लिए श्रेष्ठ है। ऐसा श्रेष्ठ पोषक तत्व विग्यानियों ने कहा है। (मैं तकनीकी कारणों से ग्य ही लिख पा रहा हूं। इसके अलावा शाकाहार से मन शुद्ध और शांत होता है। शाकाहार सचमुच हमें फर्स्ट हैंड ऊर्जा देता है। यह सही है कि सूर्य हमारी ऊर्जा का पहला स्रोत है और वह सीधे वनस्पतियों के जरिए हमें मिलता है। शाकाहार के फायदे के बारे में जितना भी लिखा जाए कम ही है।

1 comment:

डॉ. जेन्नी शबनम said...

बहुत अच्छा लिखा है आपने | बेजुबानों की पीड़ा समझाना और शाकाहारी भोजन को सही साबित करने का कितना भी प्रयास किया जाये, कोई भी मांसाहारी इसे नहीं समझ सकता | आपके लेख को पढ़ कर एक भी इंसान इनके दर्द को महसूस कर सके, और जानवरों के प्रति रहम कर सकें, मेरी शुभकामनायें...