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30.9.09

फज्र की नमाज़ पर महबूब चचा की चाय-----


पुराने शहर की तंग गलियों के बीचोबीच बसा मोहल्ला रोहली टोला।रोहिला नवाबों के नाम पर रखा गया नाम। जिसकी शान बढ़ाता हुआ बीचोबीच बना पुराना हवेली नुमा मकान बब्बन साहब का फाटक।जो इस मुहल्ले की शान हुआ करता था। नवाबों की नवाबियत की तरह इसकी भी दीवारें अब दरकने लगी हैं। और रही सही कसर पूरी कर दी कुछ भू-माफियाओं ने। जिनकी पैनी नज़र इस हवेली नुमा मकान की सैकड़ों साल पुरानी लकड़ी से लेकर फाटक के लोहे के गेट तक पर टिकी है। नये पुराने इस दौर के बीच की कड़ी हैं महबूब चचा। पुरानी ज़मीन जायदाद के साथ-साथ सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान भी चलाते हैं। अपने दौर के चिकन-चंगेजी से लेकर आज के दौर के चाउमीन तक के किस्से हैं उनके पास। चचा के पास बैठना आसान नहीं है। मोहल्ले के हर बुजुर्ग और बच्चों को तालीम का लम्बा पाठ पढ़ाते हैं। और सर सय्यद के किस्से तो ऐसे सुनाते हैं कि जैसे ए०एम०यू० इन्होंने खड़े होकर बनवाया हो। मोहल्ले के ज्यादातर लोगों के बच्चे ज़री का काम करते हैं और कुछ एक मकान धोबियों के भी हैं मोहल्ले में। चचा का कहना है कि सालो तुम से तो अच्छे धोबी हैं कम से कम साफ कपड़े तो पहनवाते हैं प्रैस करे हुए। तुम लोग तो न कल्ब से साफ हो, न दिमाग से, न जिस्म से। पढ़ाई-लिखाई तो तुम लोगों से होने से रही। कम से कम साफ-सुथरी बातें ही कर लिया करो। अबे डॉक्टर-मास्टर न बनाओ, न सही, कम से कम स्कूल तो भेजो बच्चों को। साफ-दिल चचा की साफगोई को हर कोई जानता है। चचा कहते हैं कि अबे अगर मर जाऊं तो जनाज़े में साफ सुधरे कपड़े पहनकर आना और सुनो। पहले धोबी मेरा जनाज़ा उठाएंगे और हां जनाज़े के पीछे साफ-साफ कलमा पढ़ना। कहीं बातें मत करने लग जाना कि तीजे में कोरमा बनेगा या बिरयानी सूतेंगे। धोबियों में भी बड़ी मक़बूलियत है चचा की। साठ साल तक शादी नहीं की चचा ने। मोहल्ले के कुछ हम उम्र लोगों ने फैसला किया कि चचा की शादी करा दी जाए। पहुंच गये सब इशां की नमाज़ के बाद फरियाद लेकर। चचा नमाज़ियों को देखते ही बोले, आ गये फिर शैतान बरगलाने। अबे लीचड़ो-ज़लीलो तुम्हीं लोगों की वजह से नहीं जाता हूं मस्जिद में नमाज़ पढ़ने। तो यह भी गवारा नहीं है तुम लोगों को। मेरे पीछे कहते फिरते हो चचा की राशन की दुकान हिन्दु मोहल्ले में है। चचा जागरण में जाते हैं, तिलक लगवाते हैं, लाला बनारसी चचा के जिगरी दोस्त हैं। होली में गुजिये खाते हैं और पता नहीं क्या-क्या शिर्क करते हैं चचा। तौबा-तौबा अल्लाह मआफ करे। अबे सालो सब जानता हूँ मेरे पीछे घर की रखवाली के बहाने आते हो और छुट्टन नौकर से चाबी लेकर खूब मज़े ले-लेकर गुजियें खाते हो और कम्बख्तो पानी भी मेरे फ्रिज का ही पीते हो। अब जब चचा का फ्रिज है तो क्या ज़रूरत है मोहल्ले में दूसरे फ्रिज की। चचा ने अपने लाल सुर्ख चेहरे पर त्योरियां चढ़ाकर कहा, बोलो कम्बख्तो, किस काम से आये हो जल्दी बको। चंदे के लिये आए होगे। या मस्जिद की पानी की टंकी या लाइट खराब हो गयी होगी या लाउडस्पीकर का मुंह फिर बंदरों ने हिन्दुओं की तरफ मोड़ दिया होगा। अबे इत्ते चंदे से तो मोहल्ले के दो-चार लौंडे वकील-डॉक्टर बन जाते। बरसों से चंदा कर रहे हैं, मस्जिद की लाइट भी ठीक नहीं करा पाए साले। बिल दोगे नहीं तो सरकार ज्यादती कर रही है मुसलमानों पर। मर्ज़ी न चली तो इस्लाम ख़तरे में। सालो तुम लोगों ने नास मार रखा है। मर जाऊंगा तो सारी जायदाद घर के पीछे के सुनार हिन्दुओं को देकर जाऊंगा। जो कम से कम एक प्याली चाय तो पूंछ लेते हैं। मस्जिद की चंदा कमेटी के हेड मिर्ज़ा जी ने डरते हुए बड़ी दबी ज़बान में कहा कि वो...... महबूब भाई ऐसा है कि हम सब चाहते हैं कि आपकी शादी हो जाए तो अच्छा है। आख़िर ऐसे कब तक ज़िन्दगी कटेगी। एक न एक दिन तो अल्लाह को मुंह दिखाना ही है। चचा तपाक से बोल पड़े, क्यूं बे क्या अल्लाह कुंवारों का मुंह नहीं देखता। नहीं...नहीं... हमारा मतलब यह नहीं है, मिर्ज़ा जी ने कहा। हम तो चाहते हैं कि चच्ची आ जाएं बस। चचा ने अपने ढीले कुर्ते की आस्तीनें ऊपर चढ़ाईं, जो कुर्ता चैकदार तहमद के ऊपर लगभग घुटनों तक नीचे आ रहा था और बोले, अबे सालो भाभी को चच्ची बोलते हो। मैं जानता हूं कि मेरे पीछे में, कभी नीबू के बहाने, कभी फ्रिज के ठंडे पानी के बहाने, कभी दूध के बहाने आकर आंखें सेकोगे। अब तक मोहल्ले के बच्चों की गेंदे ही आतीं थीं, मेरे घर में। लगता है कि अब तुम बुड्ढ़ों ने भी क्रिकेट की टीम बना ली है, जिसका निशाना मेरा घर होगा और हर शॉट मेरे घर के अंदर ही आएगा। सालो मुझसे तो फटती है...पर शादी करा दोगे तो सोचते हो चच्ची कहकर खूब घुस-घुसकर बैठेंगे चच्ची के पास। जब इण्डिया-पाकिस्तान का मैच होगा तो जाड़ों में लाइट बंद करके टीवी चलाओगे और एक ही लिहाफ में पूरा मोहल्ला बैठ जाएगा। बहुत खूब चाय चचा की पीओ और मज़े चच्ची से लो। अबे सब जानता हूं तुम बुड्ढ़ों की खुराहफात। खूब जानता हूं क्या होता है नाइट मैच देखने के बहाने। पूरे साल इंतिज़ार करते हो नाइट मैचों का। तुम्हें मतलब नहीं कौन जीते..कौन हारे। बस, रात के मैच हों और सब एक जगह मैच देखें एक लिहाफ में। और अगर रमज़ानों में मैच पड़ जाएं तो जैसे सोने पे सुहागा। सहरी भी चच्चा की। सब जानता हूं क्या-क्या करते हो मैच देखते वख़त। चचा की बेबाक झाड़ से मानो से आफत सी तारी हो गयी हो। सब के चेहरे उतर गये। आख़िर कौन मनाए चचा को शादी के लिये। कुछ पलों के लिए मानो सन्नाटा सा छा गया हो। रात से साढ़े नौ हो चले थे। चचा ने चुप्पी तोड़ी बोले.... अमा मियां जाओ अपने-अपने घरों। बड़े काज़ी बनते हो। देखो... तुम्हारे लौंडे आ गये होंगे अपने-अपने कामों से। जाओ....हिसाब लगाओ किसको कितनी दिहाड़ी मिली है आज। अबे शब्बन जो तेरा छोटा लौंडा स्कूल जाता है न.. उसको भी भेज देना कल से काम पर। कुछ और जुगाड़ हो जाएगी तुम्हारे हुक्के-पानी की। कमबख्त चले हैं चचा की शादी कराने। अपना-सा मुंह लिये सब चचा के घर से निकले और चचा पीछे से कुछ बढ़-बढ़ा रहे थे। कुछ सेकंड के फासले पर एक लम्बी और कड़क आवाज़ ने सन्नाटा तोड़ा... अबे लईक सुबह फज्र की नमाज़ में उठा दीजिओ... नमाज़ को नहीं मियां। तुम लोगों की चाय का भी तो इंतिज़ाम करना होता है रोज़ की तरह। चचा ने मुस्कुराकर कहा।

1 comment:

Dr. Sarkar Haider said...

Very beautiful sketch of chacha, one can hear him scolding!
keep up the good work huda