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29.10.09

अमेरिका का सांस्कृतिक आतंकवाद

एक मार्क्सवादी विचारक ने कहा है कि '' संकट यदि आर्थिक संकट है या सत्ता का संकट है तो सत्ताए उसे भी सांस्कृतिक संकट में बदल देती है। '' अमेरिका के बजट का चौथा हिस्सा कल्चरल इकोनोमी का है । अमेरिकी कहते है कि अब हम किसी मुल्क में तोप लेकर नही घुसते है । हम अब सिर्फ़ अपनी संस्कृति ले जाते है , भाषा ले जाते है । और उस पर भारतीय मीडिया , पाश्चात्य सांस्कृतिक उद्योग को संभावना में बदल रहा है । भारत की सारी संभावनाए सिर के बल खड़ी है । भारतीय अख़बारों में अमेरिका की खबरें मुख्य पृष्ट पर छपनी शुरू हो चुकी है । इंतजार कीजिए ,शीघ्र ही अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव की खबरें ऐसी छपेंगी जैसे आप को ही वोट देने जाना है । यह अनौपचारिक साम्राज्यवाद का सबसे धूर्त और खतरनाक उदाहरण है । आपने सैनिकों की खंदकें देखी होंगी , उनकी पोशाकें देखी होंगी । उनकी पोशाकें फूल से मिलती है , पत्तों से मिलती है , मिटटी में वे बैठे रहते हैं , कभी कभी पेडो की पत्तियां भी खोस लेते है । क्या यह एक सैनिक का प्रकृति प्रेमी हो जाना है । बिल्कुल नहीं , इसका एक मात्र मकसद यह है कि दुश्मन उसे देख न सके और वह दुश्मन को लाश में तब्दील कर दे । अमेरिका का सांस्कृतिक आतंकवाद भी ठीक इसी प्रकार का है । कुछ ही समय में केवल दो भाषा होगी , एक मातृभाषा और एक इंग्लिश भाषा ।
मीडिया ने समाज को बाँटने का कार्य किया है । जो मीडिया विचार बेचने का कार्य करता था अब वह बस्तु बेंचने का कार्य करता है । केवल सी .एन.ई.बी. न्यूज़ और एन.डी.टी.वी. समाचार बेंचते है । बाकि सब क्या बेचते है मालूम नही !

मेरा ब्लॉग है - annapurnaabhi.blogspot.com

1 comment:

शंकर फुलारा said...

abhishek ji aapne ekdam sahi pahchana par is sab ka hal kya ho sakta hai...? mere vichar se svami raam dev ka yaugik rashtrvaad va antarrashtravaad hi iska hal hai.unhen dekh va sun kar va unke abhi tak ke karyon ko dekh kar vishvas bhi hota hai. mera blog tensionpoint.blogspot.com