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26.12.09

इस दर्द को ज़िंदा रखना...

19 साल का इंतज़ार... टीस ऐसी कि उस मासूम को ये ज़िंदगी भारी लगने लगी... दर्द ऐसा कि घरवालों... जाननेवालों का ढाढस हिम्मत न दे सका... अगस्त 1990 में हुआ वो हादसा उसकी हिम्मत तोड़ता गया... और हर पल वो मरने लगी थी... ऐसे में ज़िंदगी बेमानी लगने लगी और रुचिका ने 1993 में ज़िंदगी से नाता तोड़ लिया... रुचिका का वो दर्द एक बार फिर ज़िंदा हो गया है... और अब वो दर्द रुचिका के लिए इंसाफ मांग रहा है... वो दर्द अब भारत के हर एक नागरिक की आंखों से बाहर निकल रहा है... वो दर्द अब पत्थर की शक्ल लेकर इस सिस्टम पर भी पड़ रहा है... वो दर्द बार-बार एक ही गुहार लगा रहा है...
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