Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

Loading...

: जय भड़ास : दुनिया के सबसे बड़े हिंदी ब्लाग में आपका स्वागत है : 888 सदस्यों वाले इस कम्युनिटी ब्लाग पर प्रकाशित किसी रचना के लिए उसका लेखक स्वयं जिम्मेदार होगा : आप भी सदस्यता चाहते हैं तो मोबाइल नंबर, पता और प्रोफाइल yashwantdelhi@gmail.com पर मेल करें : जय भड़ास :

23.1.10

एक शाम ..नदी के किनारे

शाम की छायायें
लम्बी हो धुंधला गयीं थी,
नदी के शान्त जल पर ।
नृत्य करती मछलियां
उछलती थी यकायक
और चीलें समेट कर पर अपने
चली जाती थी वृक्षों के कोटरों में ।
आकाश में कतरा भी न था बादल का
नीली चादर सा चमकता था वो ।
लोगों से भरी एक नाव
चली जाती थी नदी में
तालियाँ बजा कर गाते थे वे मस्त ।
और कहीं से गाय के रम्भाने की
आवाज सुनाई देती थी ।
शाम बिखेरती थी अपनी गन्ध धीमे धीमे,
गेंदे के फूलों की एक माला
बही जाती थी नदी में
सोने सी चमकती,
ढलते सूरज की रोशनी में ।
कितने सुन्दर हैं सब
और जीवन से कितने परिपूणॅ
नदी, चीलें, वृक्ष और लोग ।

0 comments: