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31.3.10

विडंबनाओं से भरा देश

विश्व के सबसे धनी उद्योगपतियों और भूख से मरते लोगों के बीच टूटे सूत्रों को जोड़ रहे हैं महीप सिंह
भारत बड़ी तेजी से आर्थिक विकास की सीढि़यां चढ़ रहा है। संसार के दस सबसे धनवान व्यक्तियों में तीन भारत के हैं। हमारे देश के भगवान भी संपन्नता में किसी से पीछे नहीं हैं। संसार में शायद ही कोई ऐसा धर्मस्थल हो जो तिरुपति स्थित बालाजी मंदिर का मुकाबला कर सके। इस मंदिर में समृद्ध भक्तजनों द्वारा जो चढ़ावा चढ़ाया गया है, उसका मूल्य 30 से 50 हजार करोड़ रुपये है। पिछले वर्ष कर्नाटक के पर्यटन मंत्री और बेल्लारी खदानों के मालिक जी. जनार्दन रेड्डी ने इस मंदिर में 42 करोड़ रुपये मूल्य का हीरो-मोतियों से जड़ा मुकुट चढ़ाया था। इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। भारत में आज भी लगभग 40 करोड़ लोग गरीब हैं जिनकी आय 50 रुपये रोजाना भी नहीं है। इस देश के आधे से अधिक लोग कुपोषण के शिकार हैं। विश्व खाद्य कार्यक्रम के अनुसार संसार में भुखमरी की शिकार कुल आबादी का एक-चौथाई भारत में हैं। भारत गेहूं और चावल के उत्पादन में संसार में दूसरे स्थान पर है। सरकारी गोदामों में पांच करोड़ टन अनाज सदा जमा रहता है। इतने विशाल खाद्य भंडार के बावजूद भूख से मरने वालों के समाचार आए दिन समाचार पत्रों में आते रहते हैं। ताजा समाचार यह है कि आदिवासी बाहुल्य बस्तर संभाग के बीजापुर जिले से काम की तलाश में आंध्र प्रदेश गए पांच आदिवासियों की रास्ते में भूख-प्यास के कारण मौत हो गई। भूख से मरने वालों के ऐसे समाचार उड़ीसा, बिहार, आंध्र प्रदेश, बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों से यदा-कदा आते रहते हैं। क्या यह विडंबना नहीं है? एक ओर अमेरिका के बाद सबसे अधिक अरबपति भारत में हैं और दूसरी ओर संसार के सबसे अधिक गरीब और कुपोषण के शिकार भी इसी देश में हैं। यदि कुछ लोग भूख-प्यास से दम तोड़ दें तो इससे बड़ा कलंक और अपराध कोई हो ही नहीं सकता। इस देश में न कभी धन की कमी रही न धान्य की। मध्य एशिया के कबाइली आक्रांता सदैव इन दो चीजों को लूटने के लिए इस देश में आते थे। विदेशी आक्रमणकारी या तो यहां के छोटे-बड़े राजाओं को लूटते थे या मंदिरों को। अकूत धन इन दोनों के पास होता था। आज भी स्थिति लगभग वैसी ही है। देश का सारा धन तीन स्थानों पर केंद्रित है उद्योगपति, राजनेता और मठ-मंदिर। सामान्य जनता पहले भी लुटती थी, आज भी लुटती है। केंद्र सरकार में एक मंत्रालय है- गरीबी उन्मूलन मंत्रालय। प्रश्न यह है कि क्या इस मंत्रालय की योजनाएं उन क्षेत्रों तक पहुंच रही हैं जहां आज भी गरीबी सबसे बड़ी व्याधि बनी हुई है। यह असंतुलन कैसे दूर होगा? यह सही है कि अच्छी चिकित्सा सुविधाओं और स्वास्थ्य संबंधी बढ़ती जागरूकता के कारण देश के लोगों की औसत आयु बढ़ी है। किंतु क्या ऐसी सुविधाएं और जागरूकता उन लोगों तक भी पहुंच रही हैं, जिनकी गणना 40 करोड़ से अधिक है और जो उन भागों में रहते हैं जहां विकास का प्रकाश पहुंचने में लंबा समय लग रहा है। सरकार को एक घोषणा तुरंत करनी चाहिए कि इस देश में किसी को भूख से मरने नहीं दिया जाएगा। इसके लिए दंड विधान होना चाहिए। जिस भी क्षेत्र में किसी व्यक्ति की मृत्यु भूख-कुपोषण के कारण होती है तो वहां के जिलाधिकारी के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। देश के गोदामों में आज भी पांच करोड़ टन अनाज भरा हुआ है। यह भी आशा जताई जा रही है कि इस वर्ष अनाज की भरपूर पैदावार होगी। सरकार की ओर से यह चिंता व्यक्त की जा रही है कि इस भरपूर पैदावार को कहां रखा जाएगा क्योंकि सरकारी खाद्यान्न भंडारों में इतना स्थान नहीं है। यह भी कैसी विडंबना है कि एक ओर करोड़ों व्यक्ति अनाज के अभाव में भूखे हैं और दूसरी ओर गोदामों में अनाज भरा पड़ा है। कई बार तो अच्छे रख-रखाव के अभाव में बड़ी मात्रा में यह सड़ जाता है। क्या इस देश की सार्वजनिक वितरण प्रणाली में कही बहुत बड़ा दोष है? क्या इस क्षेत्र में फैला भ्रष्टाचार इतना व्यापक है कि थोड़े से अनाज के लिए त्राहि-त्राहि करते लोगों तक वह पहुंच नहीं पाता। मेरे मन में प्रश्न उठता है कि क्या हमारे देश के अरबपति और अत्यंत समृद्ध धर्म-स्थल देश के असंख्य लोगों की विपन्नता दूर करने में कुछ नहीं कर सकते? संकट यह है कि सभी करोड़पति और अरबपति मूलत: व्यापारी हैं। एक व्यापारी धन खर्च नहीं करता, वह धन का निवेश करता है। जहां कहीं भी वह दान करता है, वह आशा करता है कि भगवान उसकी सेवा से प्रसन्न होकर उसकी समृद्धि में और बढ़ोतरी करेगा। जिस व्यक्ति ने बालाजी के लिए 42 करोड़ रुपये का मुकुट भेंट किया, उसके पास कितना धन होगा, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। किंतु वह भी संसार के गिने-चुने अरबपतियों में अपनी गणना करवाना चाहता होगा। उसका विश्वास हेागा कि तिरुपति के बालाजी की एक अनुकंपा भरी दृष्टि उसे गन्तव्य तक पहुंचा सकती है। जी. जनार्दन रेड्डी ने इस अनुकम्पा को पाने के लिए 42 करोड़ रुपये का निवेश कर दिया। जिस भगवान के संबंध में हम बचपन से सुनते आए हैं उसे दरिद्रनारायण कहा जाता है। यदि आज बालाजी के पास पचास हजार करोड़ की संपत्ति है तो क्या उसका उपयोग दरिद्रों और गरीबों के लिए नहीं होना चाहिए? उसे अनेक सुरक्षा कर्मियों की बंदूकों की छाया में बंद रखने की क्या आवश्यकता है? गरीबी उन्मूलन में स्वयंसेवी संगठन भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। लगता है कि इस देश की प्राथमिकताओं में कुछ गड़बड़ है। हम 25 करोड़ रुपये की लागत से अयोध्या में भव्य राम मंदिर अवश्य बनाना चाहते है किंतु यदि कुछ राम-भक्त भूख से तड़पते हुए मर जाएं, तो वह हमारी चिंता का विषय नहीं है। (लेखक जाने-माने साहित्यकार हैं)

1 comment:

शंकर फुलारा said...

लेखक को बोलो बाबा रामदेव जी का कपालभाती करें और उनके विचारों को बढ़ने का प्रयत्न करें तो कुछ सार्थक होगा केवल लेख लिखने से शायद कुछ न हो