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18.6.10

रूको नहीं तुम बढ़ते जाओ-ब्रज की दुनिया

रूको नहीं तुम बढ़ते जाओ,
उत्तुंग शिखर पर चढ़ते जाओ.

आयेंगे अभी कई चौराहे,
बंद गली वाली कई रहें;
खोजो राह या राह बनाओ
रूको नहीं तुम बढ़ते जाओ,
उत्तुंग शिखर पर चढ़ते जाओ.

जीवन है यह अति संक्षिप्त,
रहो सदा कर्त्तव्य में लिप्त;
जिनका नहीं कोई संगी-साथी
उनको मित्र तुम मित्र बनाओ
रूको नहीं तुम बढ़ते जाओ,
उत्तुंग शिखर पर चढ़ते जाओ.

2 comments:

डा. हरदीप सँधू said...

जिनका नहीं कोई संगी-साथी
उनको मित्र तुम मित्र बनाओ....
प्रेरनादायक पंक्तियाँ...
अगर कोई दिल से सोचे....

बहुत खूब लिखा है जी आप ने ।

अरुणेश मिश्र said...

प्रोत्साहित करने वाली रचना ।
प्रशंसनीय ।