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25.6.10

कारोबारी हितों के नीचे दबा है मीडिया

हाल ही में मैंने अलग-अलग संस्थानों से आए 500 स्नातकोत्तर विद्यार्थियों की एक सभा को संबोधित किया। उनसे जब यह पूछा गया कि उनमें से कितने मीडिया (प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक) का भरोसा करते हैं। इस जवाब में दस से भी कम हाथ उठे। अगर यह सवाल अस्सी के दशक में पूछा जाता तो ज्यादा हाथ उठते। उस समय अखबारों के सकरुलेशन की तुलना में उनकी पाठकों की संख्या का जिक्र किया जाता था। पाठकों की संख्या सकरुलेशन यानी प्रसार से छह गुना ज्यादा होती थी। आज की तारीख में सकरुलेशन बढ़ी और अखबारों की बिक्री भी। लेकिन क्या पठनीयता भी बढ़ी है। बहुत से लोग अखबार खरीदते हैं लेकिन हमेशा पढ़ते नहीं। इसकी दो वजहें है। पहली- निजी सौदेबाजी या कांर्ट्ेक्ट और दूसरा पेड न्यूज। पहले का संबंध बिजनेस की खबरों से है और दूसर का संबंध राजनीतिक खबरों से। एक राष्ट्रीय दैनिक को इस नई खोज का श्रेय जाता है। मामला बेहद आसान है। कोई मीडिया हाउस उस कंपनी में हिस्सेदारी खरीदता है जो शेयर मार्केट में पहले से सूचीबद्ध है या सूचीबद्ध होने जा रही है। बदले में मीडिया हाउस कंपनी के पक्ष में कवरज करता है। कंपनी के बार में नकारात्मक खबरों को दरकिनार कर दिया जाता है।जब से संपादकीय और विज्ञापन की बारीक रखा मिटी है, निजी सौदेबाजियों ने स्वतंत्र मीडिया की अवधारणा काफी हद तक नुकसान पहुंचाया है। न्यूज स्पेस अब बिकाऊ हो गए हैं। सेबी ने 15 जुलाई , 2009 को प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को पत्र लिख कर इस प्रवृति के बार में सचेत किया था। लेकिन प्रेस काउंसिल तो कागजी शेर से ज्यादा कुछ नहीं है। करोड़ों में खेलने वाली सैकड़ों कंपनियां आजकल मीडिया फ्रैंडली बनी हुई हैं। इस एवज में मीडिया ने भी समझौतावादी रुख अपना लिया है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बार में तो जितना कम कहा जाए तो उतना अच्छा। ऐसे मीडिया के लिए एंकर इन्वेस्टर शब्द का इस्तेमाल ज्यादा प्रासंगिक रहेगा। इस समय दर्जनों विशेषज्ञ और सलाहकार पैदा हो गए हैं, जो दर्शकों को इस और उस कंपनी के शेयर खरीदने की सलाह देते रहते हैं। यहां आपको कोई द्वंद्व या विवाद नहीं दिखेगा। यह सिर्फ आपसी हितों की बात होती है।जमीनी स्तर पर तो हालात बेहद खराब हैं। प्रेस कांफ्रेंस अब लिफाफा कांफ्रेंस कही जाने लगी हैं। कंपनियां अपने पक्ष में खबर छपवाने के लिए पत्रकारों को लिफाफे में भर कर पैसे देती हैं। हालांकि हर पत्रकार के बार में ऐसा नहीं कहा जा सकता। लेकिन आप लिफाफा नहीं देते हैं तो पक्ष में खबर छपने की उम्मीद मत करिये। जब मैंने एक नामी कंपनी के अधिकारी के सामने इस पर आश्चर्य जताया तो उन्होंने कहा आप लिखने-पढ़ने की दुनिया में रमे हैं। एकेडेमिक हैं। आपको जमीनी हकीकत की जानकारी नहीं है। राजनीतिक भाषा में ऐसी खबरों को पेड न्यूज कहा जाता है। महाराष्ट्र में हाल में हुए चुनाव में पेड न्यूज के कई उदाहरण दिखे। कुछ रिपोर्टरों के दबाव व में प्रेस परिषद ने इस मामले के अध्ययन के लिए दो लोगों की कमेटी गठित की। कमेटी ने जो ड्राफ्ट रिपोर्ट पेश की उससे यह निष्कर्ष उभर कर सामने आया कि पेड न्यूज से लोकतांत्रिक मूल्य को चोट पहुंचती है। क्षेत्रीय भाषाओं की बात करें तो, वहां आपको ऐसे राजनीतक नेता मिल जाएंगे जो किसी न किसी अखबार या मीडिया हाउस के मालिक होंगे।पिछले कुछ समय से मीडिया में सुस्ती और दब्बूपन जैसी स्थिति दिखने लगी हैं। हालात दिनोंदिन और खराब ही हो रहे हैं। कुछ उदाहरणों का जिक्र करते हैं। इस देश की सबसे पुरानी और बड़ी पार्टी कांग्रेस की प्रमुख ने शायद ही किसी मीडिया हाउस को कोई इंटरव्यू दिया हो। न ही उन्होंने किसी ओपन हाउस को संबोधित किया है। यह लाइबेरिया या सोमालिया में संभव है लेकिन भारत में नहीं। लेकि न मीडिया ने इस हालात को स्वीकार कर लिया है।भोपाल त्रासदी में मीडिया ने सारा फोकस एंडरसन पर किया हुआ है। लेकिन केशब महिंद्रा के बार में क्या क हेंगे? केशब महिंद्रा को इस त्रासदी के बाद महत्वपूर्ण पद दिया गया था। लेकिन उनके साथ कोई इंटरव्यू नहीं हुआ। उनके बार में कोई बात नहीं हुई। भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड के फैक्टरी इंस्पेक्टरों का क्या हुआ। उस समय जो मंत्री और उद्योग सचिव प्रभारी थे, उनका क्या हुआ। मीडिया का फोकस कुछ इस तरह से है, मानो एंडरसन ही अकेल अमेरिका से फैक्ट्री चला रहा होगा। भ्रष्ट नौकरशाह और राजनीतिक नेताओं को बेनकाब करना चाहिए। लेकिन मीडिया इस मामले पर चुप्पी साधे हुए है।हाल में बिहार और पश्चिम बंगाल में तूफान से सैकड़ों लोग मर। लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया चुप रहा क्योंकि उसका सारा ध्यान आईपीएल स्कैंडल में था। कुछ अखबारों ने इन आपदाओं को अपने पन्ने पर बहुत कम जगह दी। अमेरिका और यूरोप में कुछ अखबार आर्ट, ओपेरा, थियेटर और म्यूजिक की खबरं छाप कर अप-मार्केट बने। लेकिन हमार यहां पेज 3 छाया हुआ है। मीडिया भारत को एक सभ्यता नहीं बल्कि एक बाजार मानता है। भारत में लाखों कार बिकती है। जिस दिन यह आंकड़ा चीन में कारों की बिक्री से एक भी ज्यादा हो जाएगा, उस दिन भारत का मीडिया जश्न मनाएगा। मीडिया में काम करने वाले कुछ लोग वास्तव में इस भारत के नागरिक ही नहीं हैं। होना तो यह चाहिए कि जब वे भारत की सुरक्षा पर लिखें और बोलें तो एक डिस्क्लेमर लगाना चाहिए। पारदर्शिता के लिए उन्हें इतना तो करना ही चाहिए।

Source: आर वैद्यनाथन
Published: Wednesday, June 23,२०१०


साभार:- बिजनेस भास्कर

4 comments:

मनोज कुमार said...

बहुत सारी तथ्यात्मक जानकारी के बदौलत इस विचारोत्तेजक आलेख मॆं आज की मीडिया जगत की वस्तविकता को दर्शाया गया है।

Vivek Rastogi said...

यही तो हमें भी लगता है परंतु लेख पढ़कर आँखें खुल गईं।

वित्तीय स्वतंत्रता पाने के लिये ७ महत्वपूर्ण विशेष बातें [Important things to get financial freedom…]

केवल नामांकन ही बीमा पॉलिसी के लिये क्यों पर्याप्त नहीं है [ Why nomination only is not enough in Insurance ?]

सतीश कुमार चौहान said...

सौ बात की एक बात प्रजातंत्र के इस चौथे खम्‍बे में दलाली का घून सबको नजर आ रहा हैं इसके खोखलेपन पर अब कोई आश्‍चर्य भी नही , और समाज भी अब इसके साथ नही दिखता अखबार तो गली नुक्‍कड पर तब्‍बू लगाकर शाही दवाखाना बनकर मर्दानगी बेचने बाले पम्‍पलेट के समान ही लगता हैं न्‍यूज चैनल के बाजीगर दीपक चौरसिया और उनकी टीम राम जेठमलानी के खिलाफ क्‍यो नही सप्‍ताह भर चीख सके जो अपनी अग्रजी गालियो के साथ इयरफोन मुंह पर फैंक कर चले गऐ ...बहुत कम समय बचा हैं मीडिया को संम्‍भलने के लिऐ नही नेता और मीडिया एक कतार में खडे करके गरियाऐ जाऐगें....सतीश कुमार चौहान भिलाई

सतीश कुमार चौहान said...

सौ बात की एक बात प्रजातंत्र के इस चौथे खम्‍बे में दलाली का घून सबको नजर आ रहा हैं इसके खोखलेपन पर अब कोई आश्‍चर्य भी नही , और समाज भी अब इसके साथ नही दिखता अखबार तो गली नुक्‍कड पर तब्‍बू लगाकर शाही दवाखाना बनकर मर्दानगी बेचने बाले पम्‍पलेट के समान ही लगता हैं न्‍यूज चैनल के बाजीगर दीपक चौरसिया और उनकी टीम राम जेठमलानी के खिलाफ क्‍यो नही सप्‍ताह भर चीख सके जो अपनी अग्रजी गालियो के साथ इयरफोन मुंह पर फैंक कर चले गऐ ...बहुत कम समय बचा हैं मीडिया को संम्‍भलने के लिऐ नही तो नेता और मीडिया एक कतार में खडे करके गरियाऐ जाऐगें....सतीश कुमार चौहान भिलाई