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17.7.10

भारत में एक सपने देखने वाला कवि मुख्यमंत्री- रमेश पोखरियाल निशंक

भारत में एक सपने देखने वाला कवि मुख्यमंत्री- रमेश पोखरियाल निशंक
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रमेश पोखरियाल निशंक यानि खुद के जीवन को खुद में परिभाषित करते हुए। अपने जीवन के यात्रा को एक नया मोड़ देने वाला व्यक्ति। आखिर हो क्यों ना क्यों वह... भाजपा शासित प्रदेशों में शायद सबसे कम उम्र के मुख्यमंत्री हैं। पौडी गढवाल जिले के पिनानी गांव से निकलकर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बनने तक का उनका सफर काफी चौंकाने वाला रहा है। चौंकाने वाली बात यह भी है कि मुख्यमंत्री की शपथ लेने तक निशंक राज्य सरकार से मान्यता प्राप्त पत्रकार भी थे और उनके अखबार को उनके तमाम राजनीतिक संपर्कों के बावजूद कोई खास विज्ञापन आज तक नहीं मिले हैं। यह सब यह भी इसलिए ख़ास है कि 33 साल की उम्र में वे पहली बार उत्तरप्रदेश विधानसभा के लिए कर्ण प्रयाग से चुने गए। 2002 में उन्होंने चुनाव क्षेत्र बदला और हार गए, पर जिद्दी इतनी कि अगला चुनाव भी 2007 में उसी क्षेत्र से लडा और जीते। निशंक कवि भी हैं और इस नाते वे कवि प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी के सच्चे राजनीतिक वंशज कहे जा सकते हैं। राजनीति निशंक के लिए जीवन-मरण का प्रश्न नहीं है, पर उत्तराखंड की राजनीति में जब एक बेदाग छवि व कुटिलता से दूर रहने वाले नेता की जरूरत थी, तो निशंक को चुना गया। वरना, वे तो प्रतियोगिता में भी नहीं थे। यहां बात थोड़ा पिछे की करती हैं,यानि 1989 की तब निशंक संघ से जुडे थे। हिंदी के प्रसिद्ध कवि बाबा नागर्जुन उत्तराखंड में खटिमा घूमने गए थे। खटिमा हिंदी कालेज में हिंदी के विभागाध्यक्ष वाचस्पती के घर बाबा ठहरे थे और कविताएं सुनाते रहते थे। बाबा नागार्जुन के शब्दों में "रमेश निशंक नामक एक लडका अकसर अपनी कविताएं सुनाने आया करता था। बाबा ने इस बालक को कविता-शिल्प के कई ज्ञान दिए। बाबा ही कहते थे कि यह लडका बहस बहुत करता था, पर सारी बहस साहित्यिक होती थी, राजनीति उसे नहीं आती"। मुझे ऐसा लगता है कि शायद यह कम लोग ही जानते होगें कि निशंक के कई कविता-कहानी संग्रह और उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं और कई और प्रकाशित होने वाले हैं। उनकी एक कविता के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने, दूसरी के लिए डॉ. शंकरदयाल शर्मा ने और तीसरी के लिए एपीजे अब्दुल कलाम ने राष्ट्रपति भवन में उन्हें सम्मानित किया। ये देशभक्ति की कविताएं थीं। कोलंबो विश्वविद्यालय उन्हें डॉक्टरेट दे चुका है। कई यूरोपीय विश्वविद्यालय सम्मानित कर चुके हैं और कई विश्वविद्यालयों में उनके साहित्य पर पीएचडी हो चुकी है या हो रही है। देश-विदेश के अनेक विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में उनकी रचनाएं शामिल की गई हैं। रमेश पोखरियाल निशंक दरअसल साहित्यकार हैं और शायद यही वजह है कि राजनीति में उन्हें चालबाजियों की दुनिया के बावजूद बहुत हद तक निरापद माना जाता है। और हां यही वजय भी हैं की आज उन्हीं के कुछ आदरणीय और कुछ उन्हीं के पत्रकार-कवि मित्र उन्हें उनकी विकास यात्रा के लिए रोकना चाहते है...उनके कलम को तोड़ना चाहते है...लेकिन क्या यहां इन लोगों के समझ में आएगा की आखिर यह सब करने और कराने के किसकी विकास यात्रा रुकेगी और कौन पिछे की ओर जाएगा...यह देखने वाली बात होगा...लेकिन इनता जरूर हैं कि निशंक अपनी विकास यात्रा में निरंतर चलना जानते है। उन्होंने खुद की भूमिका को जिस तरह पहाड़ के परिवेश से जोड़े रखा है...वह हर हाल में उन्हें इसमें विजयी बनायेगी...ऐसा मुझे लगता है....क्योंकि वह सिर्फ उत्तराखंड में ही नहीं बल्कि, भारत में एक सपने देखने वाले कवि मुख्यमंत्री भी है, जो विकास को कविता से जोडे रखे हुए निरंतर आगे बढ़ रहे है।
- जगमोहन आज़ाद

2 comments:

डॉ० डंडा लखनवी said...

भाई श्री जगमोहन जी ।
श्री निशंक जी का साहित्यक योगदान अतुलनीय है। आपके द्वारा दी गई जानकारी अति महत्वपूर्ण है......साधुवाद।


सद्भावी -डंडा लखनवी

DEEPAK BABA said...

निशंक जी प्रचार से अक्सर दूर ही रहते हैं, संघ के प्रचारको की तरह. आपने उनके बारे में जानकारी दी. आभार.