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16.8.10

बड़ा अखबार, छोटे अखबार और अखबारी लड़ाई पर कार्टून



आदरणीय यशवंतजी,

मैं आपका ध्यान एक ऐसे कार्टून के बारे में आकर्षित कर रहा हूं जिसमें राजस्थान पत्रिका ने आज ही प्रकाशित किया और उसके माध्यम से यह बताने की कोशिश की है कि मध्यम या लघु श्रेणी के समाचार पत्र फर्जी है। दर असल यहां के डीपीआर, अतिरिक्त डीपीआर, डीएवीपी, बीकानेर पीआरओ समेत कई जनों के खिलाफ बीकानेर की एसीबी ने मुकदमा दर्ज किया है। राजस्थान पत्रिका के एक आग्रह को डीपीआर ने नहीं माना था, इसलिए पत्रिका बेवजह तूल दे रहा है।
मामला यह था:
जैसा एसीबी ने प्राथमिकी दर्ज की है उसके मुताबिक बीकानेर से प्रकाशित राजस्थानी चिराग, राजस्थान प्रदीप और क्रांति बिगुल ने गलत प्रसार संख्या बताकर ऊंची दरों पर सरकारी विज्ञापन जारी करवा लिए।
जबकि प्रसार संख्या आरएनआई जारी करता है, उसके बाद डीएवीपी विज्ञापन की दरें तय करता है, जो समाचार पत्र डीएवीपी से दरें प्राप्त कर लेते हैं उस दर को राज्य सरकार भी यथावत स्वीकार कर लेती है। बीकानेर के इन अखबारों की रेट भी दिल्ली से तय हुई है, उसमें डीपीआर का क्या लेना-देना। चूंकि पत्रिका के हित नहीं सधते दिखाई दिए तो वह डीपीआर ही नहीं मध्यम व लघु समाचार पत्रों को फर्जी बताने की कुचेष्टïा कर रहा है। इस कार्टून के बाद मध्यम व लघु समाचार पत्र के मालिकों व कर्मियों में रोष है। चूंकि पत्रिका का मामला है, इसलिए कोई भी खुलकर प्रकाशित नहीं कर सकता।

राजस्थान पत्रिका द्वारा प्रकाशित कार्टून स्कैन कर भेज रहा हूं, आपसे निवेदन है मेरा नाम गुप्त ही रखा जाए।

(बीकानेर से एक पत्रकार साथी के भेजे गए मेल पर आधारित.)

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