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25.8.10

पत्रकारिता


गुजारि है उन पत्रकारों से जिनके ले, पत्र तो बिकते ही है साथ में वो अपनी भी बोली गा देते है |
उन्ही पत्रकारों को समर्पित ये पंक्ति
एक था भरोषा प्रेस पर निर्भीक थी पत्रकारिता ,
बेबाक लेखन की जहाँ उस वक़्त थी प्रतिबद्धता ,
एक था समय तलवार को झुकाती रही पत्रकारिता ,
पर आज वह भी लोभ में है कह रही चाटुकारिता|

पत्रकारों !,स्वक्ष पत्रकारिता का मोल है ,
जो बंद आंखे ख़ोल दे वह पत्रिका अनमोल है,
है
उसूलें पत्र-लेखन की उसे तू ध्यान कर,
उस
पीट पत्रकारिता के दुष्प्रभाव से तनिक तो डर|


हम जानते
है पत्र-लेखन एक कठिन कर्म है,
जो जड़ को चेतन में बदल दे पत्र का वो धरम है,
वैसा ही गुरुतर कर्म निष्ठां से करे वह लाल है ,
अन्यथा जो लोभ-लालच से करे वह दलाल है|

आज पत्रकारिता की जड़ समझ आती नहीं ,
पत्र में सच्ची सब बातें जगह तो पाती नहीं,
आज
ही एक पत्रिका में धरम को देखा छिपा,
बालबा और बलात्कार को पाया प्रमुखता से छपा |

धन्य है वो प्रेस है वह धन्य पत्रकारिता,
है बढ़ावा मिल रहा जिससे यहाँ दुश्चरित्रता,
पत्र के मालिक बहले पत्रों से माला-माल है,
पर यहाँ की संस्कृति सच बिगड़ कर कंगाल है|

प्रदीप्त मिश्र(9334864231)

1 comment:

Akhtar Khan Akela said...

bhaayi jaan aapne to hmare munh ke shbd chin liye aek kdve or nnge sh ko ji saahsik triqe se aapne ujagr kiyaa he usse dil baag baag ho gyaa he . aapka aek aek alfaaz khubsurt or nirbhiktaa se bhraa he bdhaayi ho. akhtar khan akela kota rajsthan