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8.9.10

खोखली है जिंदगी

खोखली है जिंदगी , खोखले आदर्श सब ।
खोखली बातों के संग , जी रहे है लोग सब ।

जो नहीं खुद को पसंद , वो चाहते औरों से हम ।
जो नहीं कर पा रहे , कह रहे शब्दों में हम ।



घट रहा जो भी यहाँ , चलचित्र सा लगता कभी ।
एक ही सुर ताल पर , जब डोलने लगते सभी ।

मर चुकी संवेदनाये , पत्थर के हैं इन्सान ज्यों ।
इंसानियत की चाह में , फिर जी रहें है लोग क्यों ?



हाथ में पत्थर नहीं , पर शब्द पत्थर से ना कम ।
मासूम सा चेहरा मगर , दिल जालिमो से है ना कम ।

जो नहीं कह पा रहे , लिख रहे शब्दों में हम ।
खोखली है जिंदगी , खोखले हो चुके हैं हम ।
 

5 comments:

मनोज कुमार said...

मर चुकी संवेदनाये , पत्थर के हैं इन्सान ज्यों ।
इंसानियत की चाह में , फिर जी रहें है लोग क्यों ?

विचारोत्तेजक रचना।

देसिल बयना-खाने को लाई नहीं, मुँह पोछने को मिठाई!, “मनोज” पर, ... रोचक, मज़ेदार,...!

कविता रावत said...

मर चुकी संवेदनाये , पत्थर के हैं इन्सान ज्यों ।
इंसानियत की चाह में , फिर जी रहें है लोग क्यों ?
...sach mein bahut baar yahi lagta hai....

वन्दना said...

हाथ में पत्थर नहीं , पर शब्द पत्थर से ना कम ।
मासूम सा चेहरा मगर , दिल जालिमो से है ना कम ।

sahi kaha.

AlbelaKhatri.com said...

वाह....
सही कहा

सटीक कहा .

आभार !

Manish Singh गमेदिल said...

मर चुकी संवेदनाये , पत्थर के हैं इन्सान ज्यों ।
इंसानियत की चाह में , फिर जी रहें है लोग क्यों ?

खूबसूरत ओजस्वी प्रस्तुति के लिए धन्यवाद