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18.12.10

कब तक

कब तक बस यूँ ही
चलते जाना है?

अमूल्य मानव जीवन
के बेशक़ीमती पल
बीत रहे बेमकसद,
क्या हमारा लक्ष्य
सब कुछ खो कर बस
'हाथ का मैल' पाना है?

कब तक बस यूँ ही
चलते जाना है?

कौन मित्र कौन शत्रु
सबके इतने सारे चेहरे
असलियत जान पाना मुश्किल,
आस्तीन के साँप कई यहाँ
कब तक इंसानियत के नाम पर
सबको गले से लगाना है?

कब तक बस यूँ ही
चलते जाना है?

आधुनिकता के दौर में
ग्लोबल नेटवर्क से तो
संपर्क सदा अटूट है,
बहुत से मसले खुद से हैं
थोड़ा समय मिले तो
अपने आप से बतियाना है.

कब तक बस यूँ ही
चलते जाना है?

हौसले हो जब बुलंद
और इरादे हो मजबूत
समय लेता इम्तिहान बड़े,
ईश्वर का खेल तो देखो
आग वहीं लगती है
जहाँ 'दीपक' का आशियाना है.

कब तक बस यूँ ही
चलते जाना है.

4 comments:

shikha kaushik said...

bilkul sahi kaha aapne -himmat ke sath aage badhte jana hai .yahi to tareeka jeevan me aage badhne ka .badhi sunar lekhan ke liye .mere blog ''vikhyat 'par aapka hardik swagat hai .

Dr Om Prakash Pandey said...

beautiful!

sangeeta modi shamaa said...

nice...

deepakyk said...

dhanyavaad shikha ji, om prakash sir aur sangeeta ji.