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28.7.11

''अमर सुहागन''-.शत-शत नमन इन वीर नारियों को

यूँ तो भारतीय नारी का हर स्वरुप   प्रेरणादायी है पर एक शहीद की पत्नी के रूप  में   स्त्री  कितना  बड़ा  त्याग करती है सोचकर भी ह्रदय  गदगद हो जाता है और आँखें नम .इन्ही भावों को संजोये है यह रचना  .शत-शत नमन इन  वीर नारियों को -


हे!  शहीद की प्राणप्रिया
तू ऐसे शोक क्यूँ करती है?
तेरे प्रिय के बलिदानों से
हर दुल्हन मांग को भरती है.
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श्रृंगार नहीं तू कर सकती;
नहीं मेहदी हाथ में रच सकती;
चूड़ी -बिछुआ सब छूट गए;
कजरा-गजरा भी रूठ गए;
ऐसे भावों को मन में भर
क्यों हरदम आँहे भरती है;
तेरे प्रिय के बलिदानों से
हर दीपक में ज्योति जलती है.
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सब सुहाग की रक्षा हित
जब करवा-चोथ -व्रत करती हैं
ये देख के तेरी आँखों से
आंसू की धारा बहती है;
यूँ आँखों से आंसू न बहा;हर दिल की
धड़कन कहती है--------
जिसका प्रिय हुआ शहीद यहाँ
वो ''अमर सुहागन'' रहती है.
                        
                     shikha kaushik
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3 comments:

वन्दना said...

एक सच्चाई बयाँ कर दी आपने…………अमर सुहागन का सटीक चित्रण किया है………शत शत नमन है।

arvind said...

श्रृंगार नहीं तू कर सकती;
नहीं मेहदी हाथ में रच सकती;
चूड़ी -बिछुआ सब छूट गए;
कजरा-गजरा भी रूठ गए;
ऐसे भावों को मन में भर
क्यों हरदम आँहे भरती है;
...bahut hi sundar our maarmik rachna...aabhaar.

शालिनी कौशिक said...

bahut sahi varnan kiya hai aapne.