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25.9.11

वो ३२/-खर्च नहीं कर पाता और तुझे कम पड़ते हैं ..........?


वो ३२/-खर्च नहीं कर पाता और तुझे कम पड़ते हैं  ..........?

संसद सदस्य भी भर पेट खाने के बाद भी ३२/- दिन भर में खर्च नहीं कर पाता है ,यह कटाक्ष नहीं है ,कटु सत्य है .भारतीय सत्य को स्वीकार करते हैं परन्तु पचा नहीं पाते और जोर शोर से धमाचोकड़ी मचा देते हैं .इसी योजना आयोग की गूढ़ बात का भावार्थ जानने जब मैं तत्व मर्मज्ञ के पास गया तो उसने कुछ ध्यान लगाया और बोला ,बेटा ये योजना आयोग की बात मैं दम है और तुम जैसा ब्लॉग में बक बक करते हो वो बड़े आदमी की तौहीन करना है .तेरे पास कोई डिग्री है ?
मैं बोला - नहीं है सा'ब.
तेरे पास वातानुकूलित ऑफिस है ?
मैं बोला - नहीं है सा'ब .
तेरे साथ सरकार है?
मैं बोला - नहीं है सा,ब .
तभी तो कहता हूँ की तेरी बात मैं आक्रोश ज्यादा ,तथ्य कम रहता है .अगर तुम्हे ३२/-में भरपेट खाना चाहिए तो बेटा एक काम कर ,जनता की सेवा करने का ढोंग सीख ले .
मैंने पलटकर पूछा ,सा,ब ३२/- में शानदार दिन गुजारने और जनता की सेवा का ढोंग सीखने में आपसी ताल्लुक क्या है ?
वो बोले -वाचाल !तथ्य मर्मज्ञ मैं हूँ या तु?
मैं बोला-वो तो आप ही हैं इसलिए तो ३२/- में शानदार रहीसी दिन गुजारने का रहस्य समझने आपके पास आया था लेकिन आप तो बात को घुमाने लगे .
वो बोले -बेअक्ल !मैं बात घुमा नहीं रहा हूँ .तथ्य परक सत्य समझा रहा हूँ .तुम यदि आम आदमी के हित की बात के लिए ज़रा बत्तीसी हिला दोगे ,सेवा का ढोंग रच दोगे ,आसमानी सपने बुन दोगे तो तुम पर कोई पहाड़ नहीं टूट पडेगा .ये भावुक भारतीय तुम्हे  सर आँखों पर बिठा लेंगे और विधायक या सांसद बना देंगे ....
मैं उनकी बात काट कर बोला -मैं आपके पास सांसद बनने के गुर सीखने नहीं आया .सांसद बनने के गुर तो  "राजकुमार" को किसान के घर प्याज रोटी खाते देखकर ,खुली छत के निचे  खटिया पर सोते देखकर खुद ही सीख लूंगा मेरा मकसद तो योजना आयोग के हलफनामे के गूढ़ अर्थ को समझने का था लेकिन 
शायद आप इस पहेली का अर्थ नहीं बता पायेंगे .........
वो बोले -बच्चा ,तुम्हारे में धीरज की कमी है ,मेरी बात समझने के पहले ही अपनी बात धुनना चालु कर 
देते हो ये मेरी अंतिम चेतावनी है .ठन्डे दिमाग से बात को समझो.यदि आम भारतीय ने तुम्हे सांसद 
बना दिया तो तुम संसद में पहुँच जाओगे .......
मैं बोला -चलो ,मैं आपकी बात की कल्पना कर लेता हूँ की मैं सांसद बन गया हूँ अब मुख्य बात 
३२/-में अमीरी के साथ दिन गुजारने पर आ जाईये .
वो बोले -मैं तुझे तेरी बात का सही उत्तर देने के लिए ही समझा रहा हूँ ,तुम जब सांसद बन जाओगे तो संसद जाओगे और देश सेवा का मेवा जेब के हवाले करना मगर खाना संसद की केन्टीन में ही खाना .संसद की केन्टीन में चाय मलाई मार के ०१/-में, रोटी पर घी लगा के १/- में ,दाल १.५०/-में ,बढ़िया चावल २/-में,डोसा ४/-में,बिरयानी ८/- में मिलती है .तु ज्यादा से ज्यादा चार रोटी ,एक प्लेट दाल,एक प्लेट चावल खा लेगा .अब बता कितने का बिल बना ?
मैं होंठो को जीभ से चाटते हुए बोला -७.५०/ - 
वो मुस्कराते हुए बोले -दोनों समय का कितना हुआ ?
मैं मिमयाते हुआ बोला -पंद्रह रूपये .
वो बोले -योजना आयोग ने  तेरे एक दिन में कितना खर्च दिखाया ?
मैं बोला -जी, ३२/-
वो बोले -फिर भी तुम योजना आयोग को कौस रहे हो ?अरे! सरकारी केन्टीन में खाया होता तो तेरे को
 ३२/-की कीमत मालुम होती .जा ,फुट ले अब .या तो सांसद बन जा या योजना आयोग में काम कर ,
तभी तेरे कु रूपये की कीमत समझ आएगी .आम आदमी बनने की जरुरत की तो ३२/- का तीन गुणा भी
 कम पडेगा .              
  

1 comment:

ajit gupta said...

बहुत सशक्‍त व्‍यंग्‍य। वैसे अब अधिकारियों और राजनेताओं की सुविधा के लिए बने सर्किट हाउस और संसद के भोजनालयों की कीमतों पर पुनर्विचार होना चाहिए। क्‍योंकि इनकी कीमते पूर्व में इसलिए कम थी कि ये जनता के सेवक थे। लेकिन अब तो सभी को बहुत ही अच्‍छा वेतन मिलता है।