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4.10.11

नागरिक उवाच

* ग्लानी इस बात की है कि मुझे गुस्सा तब आया जब गुस्सा करने की उम्र नहीं रही । #

* वह दिन दूर नहीं जब फेस बुक की भाषा में लोग हिंदी में " व्यंग्य " को " व्यंग " लखने लगेंगे ! #

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