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24.10.11

....क्योंकि फूल हूँ मैं .



कभी प्रेयसी की  केश रश्मि पर, खुद को इठलाता पाता हूँ . 
कभी प्रियतम  को रिझाने, खुद प्रेम सेतु बन जाता हूँ.
कभी प्रेयसी के मुख मंडल की ,खुद से तुलना पाता हूँ .
कभी चाहत बनकर दौ दिलों की ,अमर साक्षी बन जाता हूँ .

कभी ईश्वर की आराधना में ,खुद को समर्पित पाता हूँ .
कभी देव प्रतिमा के गले पर ,खुद को संवरता पाता हूँ .
कभी निराकार के मस्तक पर ,खुद को चढ़ता पाता हूँ 
कभी युगल कृष्ण के महारास का ,अमर साक्षी बन जाता हूँ  

कभी वीरों के संग समरांगन में ,खुद को विजयी पाता हूँ .
कभी शहीदों के संग चढ़ चिता पर ,धन्य धन्य हो जाता हूँ.
कभी देशद्रोही नेता की शोभा बन  ,खुद को शर्मिंदा पाता हूँ 
कभी देश प्रेमी के कर कमलों का ,अमर साक्षी बन जाता हूँ 

सुख दुःख सहता रोज निरंतर , खुद को समभाव में पाता हूँ 
शादी ,उत्सव या मरघट में ,खुद को सहज सरल ही  पाता हूँ 
जन्म ,मृत्यु या प्रेम पंथ में ,खुद को निर्विकार ही पाता हूँ 
कर्म भाव में पल पल जी कर ,अमर साक्षी  बन  जाता हूँ 

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